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अमंगल्त तथा दःखके वहन भस्मकर्चा हें पुनः गजसुखख सब
गणेश सकल
सुखके दानिदें अथीत् हानि वियोग राजकापादि भमंगल तेधा रुज पीडा
बरिद्वतादि इःख इनसब॒नको भरुम करिदेते हें पुनः गंज हार्थीकेसो मुख तौ भविवेकी- चाहिये हें काहेते
"रदीनहाविलेसादकर, 4०-२० ४४० ।
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ह“ँइनमें ज्ञो विरोध होतातो भागदेतहीःउपद्वेवों
भांवते: उत्तम पतिब्रताःसब्रैरहीं-
भानंद/लो एब्वीभरेपर विवित तंथा नाक नगर जो इंद्रपुरी पुनः भदि
'मुवनभरेमें मंगलंसयी ४०28४ युति प्रकटभईः
दम जल नी &27५.8०/ ७80 ५३५७० ४ २ २२ -केक४.ढं
सो तरंगसी देखाती जिमि जामॉति-
दिशि # दिशा विदिशि लवैत्न अयोष्वाजी जम लमरं र दश जललम पु भामिनी युवती बहुत भ्रंकटदोती दें पुनरः दरी|मन्विर्त में छिपिजाती भयो ताहीभाँति भहि पातालल्लोक में मे कक दलमाी नम सरिगरिकाओ के हज कम
दे राशिके नामनहीं जो 20228 /00-%%2% 3 नामघरधो
भाव स्वरूप नामधरः
| ऐलानामःघरेजपुनः सुमित्राके प्रथम पुत्रको लक्ष्मण
.. नामधेरे छोटेको'शघ्ृहत ऐसानास घरघो भर्धात् चरौनाम कैशरि चंद- नादिते पीषरके- /लिखि पूजनकरि बालकनके दक्षिण कानन में
।सबांचिआने-
काश केश महक लत पत्तारानिनकोदैदीन्हे तित्रको
'प्रेमानेदर्में मरनभई सनते सकलसुख लहे उपायड भाव परिर
पूर्ण मनोरथ पाय तनमें प्रेमकी पुलकावली भरिगई ग्राम ख्री बारमु-
: ख्याढाढ़ीं कलौंडत इत्यादि को पुरमें गान तथा देवलोंकक्रे गेधवे अप्सरा
आकाशमें विमाननपर ग्राइरहीं पुरमें निशान बाजा ढोल ताला: माँ
अरुदेगादि बाजिरदे-तथा देवता दुदुभी आदि यंजायरहे इत्पादि गान नि एब्ती में तथा आकारमें दो ऊे
तिनके से तो प्रेमानेंद वश यकटक पलारदित निरखिं रहे हैं ण दुष्ट राक्षसादि समूह ते मनते ७2९०-6/0237<
टी० ( बशिप्तजौगुरुदें तिनकेबंचननको नृपालकैसेतर्जे गुरुके बचननदी त्यागिलकेहें ताते प
रघुनन्दनको बुल्लाय रूपाल मुनिह्िं सोंपे रपागुण मित्रको वैदीन्दे ३ रुपाल मुनिहि पुत्रसोपि पुनः लेबसभासदित मुनिके प्रणामकीन्दे
को अशीश दीन्ददे मनहुँ जपतप फलपाये
मानहुं जन्मभरि जो कछु मंत्रजप 7 मु
पाये हर्षसद्दित चले २ इह्ंवशरथमद्दाराज पुत्रब्रियोगंदुःखते पंयभासु जल्न बद्याय सभातेउठे
गये बनी के बचन को-उत्तर कछु मुखते
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मंत्रके गुणकद्दत यथा यह-अग्निबाण सबको भस्म करिसक्ता बाण सबको उड़ाइ सक्ता इत्यादि .३।३४॥.. <.. मू०। मास्योबीचहिताड़काएकवाएअ्रीराम।
जाट से
) बीचसह: सिंली ताको ऐकहीवाणते' औरघुनाथजी सझोरे छाती में बाण लागतही वेहत्यागिं हषिं के अर्थात् विमान पर चंढ़िं
कृपा गुणभरेमंदिर तासब भाशाताद देतेदें
। जयजयजगदातारप्रभुहृरणघोरमहिभार । दीनवन्धुदा- क् _किलयाकतनचती रूपउदार -_१ सबगुणरूपउदारभजत कसनकादी । पावतथाहन्चरितमध्यअन्तहुनहिं कक पते राम तहत तिरमई! | २ 'आदिजन्मजड़कुक़तकरिभईशापपापनमई । त्राजुपरसिपद्पञ्रजरामसुकृतमं ३॥ ३७ ॥
दी 8 24 बोली हे प्रमु अगला जग़को 2 हक दानी तथा महि ' 290 # 'भारए्टथ्वीपर रावणादि मद्दामयंकर भारहें तिबके हरणहार आपुकी जयहोय जयहोय हेदीतबन्धु ढानव:ददनपौरूपदीन दीनजन के बन्धु समान हितकर्चा तथा दुष्टदैत्य राक्षसादि बनको भस्मकर्चा सब गुणरूप उदार रूपा दया क्षमा शीक्ष बात्सल्य सौहाई करुणादि अनन्त कल्याण गुण सदित उदाररूप याचकमात्र को परिपृर्ण दान देनहारंदो १ सबगुणको भरा जोडदाररूपदै ताको शिव शुकदेवंसनकादि इत्यांवि सब पद आपुको सेवन करते हें पुनः ४५ ; चरित आादि 333 'पूर्वकेला चरित कीन्द्रेड भर क्या करते. हों (5 क्या
त्यादि की थाद यह कोऊनहीं पावत भाव आपुंको चरित
समुद्रसमदै तामें सबभाचार्य पिपीज्षिकां सम है २ झादि
ज्ञाको झ्रापनी:द्ानि त्ञाभ तथा दुःख सुख मोहते न
यथा ज़डः भज्ञ दे भत्पन्त सूढ्स्य युक्त इएंवा चेहयोमीहात्विन्द॒तिपर वशगः रा
2555५
टी०। कर्मन पाप शापकों कठिन दुर्गरचिराख्यों
कर्मसोई बलराजाह़े ताने शापमय कठिन अतुद॒दुर्ग जो कोट 08१० र
राख्यो भावपाप शापते प्रापाणमया तन भौर कौन शुद्धकरि किले तामें मनब॒द्धि अरू चित्त महमुजों अहंकार येचारो हैं ते केले पुष्टरदे कि वस्तुनिचारूयों भघभरे अथीत् जो विषयबश्ञ इंद्विनद्ारा वाकी स्वाद ग्रहणकिया ताको .
सो मनादि में भरे ताते मटिभर घुससम पुष्ठ म्रनादि शुर | पुनः सनोरथ .र्चिंतवन बुद्धि सों बिचार अहेकार ते.
सब पुरुषस्त्री परथधन दरण परदहानि अपबाद तन
| सकलबस्तुमल जोपाप ताकी राशिढेरीताकोपाइ री भांतिकामना तथा म॒द् जाति विद्या घनादि पाई हषब्रढ्मावना: पुजाचने हेतु भ्ूठा वेष बनावना इंत्याद़ि घन बहुतसे.
को लेक सुछृत जो सत्कसे कल सत्य धर्म आचरण अर्थात् झसत् ; इंद्रिय ।
आपुभ्रभिमत फलदातार मनवांछितफंल देनदारे हो कौनभौति समदेवनको वर ओए तरुदुक्ष मो कल्पंतृक्ष ता+
... कीसमान बेस्वार्थ सहज स्वभावते मनोकामना पूर्णकरि देतेददों सन््मुख होंत दरण मात्रद्दी काहेतें सबभतमात्रके भादि कारण सबकों उपजावन .. दारेहो कम कुमति संलत्ताग मेरी मंतिकुस्सित भई' भथोत बिसाबिचारे विलमल कीन््हेंडें ताहीतें मलंपाप मेरे ल्ञागिगया ताको भांपु रूपाकारि बापछुडायदीन्देउ $ पापनिवारणकीन्देड पुंनः शुदुदं सुनि 'लंकील पावन खी सम सुनिकीपत्नी भइ ऊँ इति स्तोकिक
संच आपने किया भब पंरमार्थ हेतु वेरदीजिये मोहिं कीन' वर >> जल हे रघुनाथंजी आपुके पद कमल्नमें दिनो
है भ्रीरघुनाधजी लक मी भार सहापापे न
शिवादिको देनेमेंझगमहै नाहीं देसक्तेहें सोई वरदान :
के ल्ञायक औरंधुनाबज्ञी दें कौन भगंमवरहै जाको सुगम
ति भथौतु जो जीवनकी बुद्धि कुमारगरमें ्वमीहे ताते प्रधन
अपबाद परहानि हिंसा हुथाजीवनको दंड इत्यादि जो कुक | पूर्व असत्कर्मनकों फल वुखभोगनेकी रन
| पुनः ५22 कहते 25928 लाधुवेष भरुकम दु्टनके के कलिकलुष इत्यादि किसीके मिं: |
यु टनगरदेखनचले ३॥ ९३॥ म टीन सहित अीरघुनाथजी हर्षि आनंदद्े मुनिविद्वामित्र के मगमाहीं रास्तामें आगेको चले बन जो आपद्ीभये उपबन जो 0 32 द॒क्षलगा येते बनसमभये तहाँ स्र॒गा विदंग जो पक्षी कोकिला मोर बकोर शुक दे तथा विटप आँव अनार कदंब कचनार व्रिल्वादि दक्ष इत्यावि पूंछतजाही यथा यदकौनवनहै यहसृगकौनजातिहे यहकौन कौनदुक्षदै इत्यादि पंछेत राहमेंचल जातेदें ३ रघुनाथजी जो पूंछत ताकौउत्तर मुनि विश्वामित्रजी कदृतजातसंते सुरसरि जो गैगाजी तदाँ पहुँचे रघुराई की नाथंजी मुनिन सहित सनक पुन £ र-
4 सनक थजी सो मुनि पुराणनके इतिदास कथाकहत चंले जातस झनकपुरमें पहुँचे २ पुरके निकट पहुँचि प्रमु शीरघुनाथजी बाग तडाग नि भ्तिभले लखि सुमन बाठिकः बाग बन तथा पक्के ताल भ्रमलजल कमलफूले इत्यादि बादेरहि भत्यंत शो भादेखि हर्ष काहेते बन बागन सें खग पक्षी तथा भनेक भांतिके सुगनकी रुमाजयुतद्दे तथा तड़ागन में कमलनंपर बाटिकनमें फूलनपर मधुप भ्रमरनकी समाजयुतहै पुनः
जनकनगर देखन पुरको चले ३॥ ४३॥
|वापीसुभगसरोजयुतसरवरविविधमराल।मात्तोंगाणितमा नसरशोभादेतविशाल -$ शोभादेतविशालविमलजलसु
व कला ना लक
रमीनेआयजनुपवमानसरपायजग। लहतचारिफिलपराश
7 बावली सुंदर 7 हक ने विवि
'हिककोऊ पारनहीं' 'तिनकी घर जो भमि अर्था बड़े सहित लेई आय इहा बसी हें
चंगेरखासदान पानदान अतरदान पीकदानघरे तहां मंत्री बैठे सेवंक चमर छत्न व्यजनादि ३० -स्थाननमें 23०: ख्यादि नृत्यगान
इंदुभी 3. यथा 2 बाज्ञा विरदावली कहिरदे हें है प्रशंसा भटााजें झुंडझंड तथा युवती झाद़ि गुभगान करें संगलीक गीलगायरहीदें तित- गान सुनि देवततकी ख्री जाती हें २ लाज़ेलखि झसरा- ऐसा आस है कि सुरपुर हक झोभा: हरे
अमरावती इंद्रपति साऊ जनक डे जब हैं न राजालोग ढिके. हैं
काहेते. जेमनेकन राजालोग
देवता इंद्ादि लेविविधद्द अनेक, प्रकारके 'ण कुवेर .इंद्रादि- झाइ ज़वकपुरके
मतोदर देखातीढें मनहँ सुरातियतन धोखा लोकके धोखे जनकपुर में देवनकी युवत्ों भायगई हैं यहमाधुर्य ह | ऐशवर्य में जनंकपुरकी स्त्री ऐसीविव्य शोभासप हैं जिनके धोखैंदें जो खेतमें झंठही बनायके ठढ़ियाय दीनी जा। * ४४ जो वेबतनकी स्त्री तिनके तन जिनके | ज्लीं लॉक्त ऐसी पुरमें सबखी ते थाम घान मंदिर मंविरे नाचती हैं ऐसा जनकनगर छब्रिसयी है तहांकी हाट जो बजार | गली इत्यादि सर्वत्र माणिम्य वित्रसारी ऐसी खचितरहें ज़ाको देखिलोग | चछतहे जातेदेँ ३ ।४७॥
| मू०। सुनिश्चदृशननरपालऋषयआंगमनअनंदित थे शिरबंदित १ बैदतिन्पहि
अप । रावजनकमहाराज़_तनकी शोभा निरखतसंते नेत्रथंके मनते ब्रिशेषि प्रेमकेबशाभये कौनभांति महाराजके लोचननेत्र चक्ोरभये रंघुनाथजीको मुखचन्द्रकेप्रेमरसमें त्तोसांइ कैयक
धअ सोसमॉजभरि लोभान काहेते 'रघुनाथजीके अवलोकन सनेहबार्त्ता सबआपुसमें क- मे सुनिवृक्ति अर्थात् ग्रोगज्ञान विरांग ज़पतप इत्यादि
पके हज 'परास्त करिसके घर किसी
संशय है कि इनके देखतसन्ते ज्ञानकी जो गतिदे विवेक:
7 झी>। गायत्री भादि विधिपूर्वक्त जप तथा जलेशयन पेचागनि झादि 'तथाएकादशी चान्द्रायणचतुसीसादिद्वततवासत्यशौचतपदानादि
« जोचमे हैं तामेंरत प्रीतिकिहे पूजापाठ संध्या तपण तीथौट्न वानादि आभकर्म्म जगतमें हें सो सबकरि तथा दया अथीत् बे प्रयोजन
जलॉवनकी रक्षा त्रथा क्षमादिक जो. यमदें यथा योगशास्र ॥ तत्रारहिलास- स्पॉस्लेयब्रह्मचस्यौपरियहायमा ॥पभर्थातुअपरायौकिये जीवकोनमारेकूठन बोले अध्तेयनाम चोरी न करे ब्रह्म चर्य इंद्रियजीतेरहै परिग्रहं विषयनको
संगस्यागेरहै पुनः नियमकीक्रिया यधायोगशाख्रे॥शौचसंतोपतपः स्वाध्या येंहबरप्रणिधान्ानिनियमाः इत्यादि क्रियांकरै पुनः अपने वर्णआश्रस्ादि की जो रीति वेदमें लिखींहे ताही अनुकूल चलना यही आंचारहै उ्थे “बैबेकेयया ॥ सढ़ाचार्योपदेशाजु प्राप्तोपयतयापुत्ः ॥ विपरीतान्निदत्तोध - वंणीदिविहितंचरन ॥ सोझाचाररीतिपरचारनामचलना १ पुनःचारोवेद
;+ भगोचर झवात् गोचरंकही इंद्रियनकी विपंयंशब्द र रपरसर कै तिनकरिके नहीं प्राम्हैसक्तेदें ऐसा जो हरिरूप जो क्षति बेद ले बाद़ि जो रूप वरणन करते हैं. जारुपेकी. प्राप्तीहित
सेब देवता पुनः सनकादि शुकदेवादि मुनितेधा गण गणेश महेंदा शिंवजा
इत्पादिध्याबंतेंध्यान भजनादिकरतेहें ३ गणपमदेशादि 083802:% प्रत्याहार ध्यानधारणा समाथे इत्यादि योगकी 'यत्लननकरि 77 हुपर जारूपको नहींपावतेहें तथा गायत्री आदि
गन झादि तप चांद्रायणादि ब्रत इत्यादि पूजा पाठ संध्या
दानादि कर्म रतनाम करते हैं तथा संत्यशोचाचारादि में बसावत संबभांतिं उत्तम पावनहैजाते हें २ कैसे उत्तम इनक चासनां
दि हृढ़साधनकरि भणिमादिक सिद्धी बर्मानंवस्वतंत्रताअचाह लेतोषादि सुख भंतरभरिहोता है तब वहरुप हूदयमें बलता हैं ऐला
जो भस्लख भगोचर भूंप हरिसब रूपनमें राजा सोई परब्ह्मरुप
| मुनि बिश्वामित्र जी भूतलमें मूर्तिमान् प्रकटकीन्द प्राकृत-
| ख़त हें ॥७२॥
सबलशचुकों जीत-. | विचारि तफोधनी विश्वामित्रते आपु आपसी सहाय चाहत २ शिवको ज्जीतिबे हेत मझुनिते सहायता चाहत' इसहेतु : ख्ंगरहि सन क्रम वचन इति चारिहु विधिते सेवासजें वा सेवन इतिचारिउ विधिते सेवा करते हैं ऐसे युगल वोऊ ० “252: 'छबि दोखिये देखि'परती इत्यादि भपाति जनकजीबारम्वार कहते हें
ते विशेषि करिले
मर सदोशमवेस्पलोर्यीरहतमंनमेरेप अहॉसलिदी मदन ट 5 के अल १ (332४० अल: 3477 रूपहरिसथल
5 ज लहघोनज्ञानविरागसो भि 3 टी७ $मद्राराज़ कहत हेसुनि क़ाददेते मेरेमनकी:संदेद-नंढीं जाती है | कर स्वभावते संदा-सर्वकालसें -एकरस' ज्ञान: बैराग्व॑में किहेरहतः पुलः-अह्य व्यापक हरिरूपः सब्चिदानेल््घन संत् जो चित्कहे सदा चेतन्य झानंद जामें घत्रसम्नद ऐसा ब्रह्म
तहीं मुनिराज विश्वामित्रजी प्रेमते पुलंकि कहत । सदन तुमहिं । दित-सबकाज्ञ जोकछु होनहार है सोलब चाबी पम विदित भाव आपूतो सर्वज्ञहों परंतु जोपछेड ताते राज " प्र | केजाये अवीत जा मदाराज पूठे कि मुनिनके बालकदें वा राजकुमार हें तापर कहत कि ये कोशलेश दशरथ महाराजके पुत्रदें जोकही इहां विभव रहित कैसे आये सो आपनी इच्छाते नहीं झाये हें मखहित माँगिआने आपनी यज्ञकी रक्षाकरिबेदेत में महाराज दशरवते माँगि इनबालकनकों आपने झाश्रसकों झानेउ तहाँ ताड़कासुवाहु आदिको मारि यज्ञकी रक्षा कीन्हें पुनः आपुके नगर सिधाये अथोत् धनुषयज्ञ नल ला आपुके न
को आये २ आपुके नगर सिधाये धनुशरधरे रामलषण नाम भथीत संगझाये ताते अपर विभव रहित केवल धनुषबाण धारणकि
गात बढ़ेडें इनको राम ऐसानाम है इनके छोटेभाई
लक्ष्मण ऐसानामद्दै इति माधुर्य कहि पुनः ऐश्वथ दर्शा वत'
ताके रक्षकभार उतारनहार कौनभांति असुर आदी 3 0,
दि तिनके नाशकत्ती भाव परब्रह्म रघृबंग कुलमें
सुनत भूपषजनक महाराजके उरमें आनंद
भरे कह 7
सुन्दरस्वरुपवंत राजकुमारको क्षेखे पुरकेख्री पुरुष परस
स्पा नये कैसे भानंदभये रघुकुल के भूषण श्रीरघुनाथजी को देखि सब ८ ४ 3 'सुछृति सैंभारि सराहतभाव हमलोमनकी बढ़ीभारी भाग्य उदय 'तौतोऐसे परम सुन्दर राजकुमार नेअनकी विषय-करिपाये इत्यादि भ्रशंसा करते हें ९ पुनः सब कहते हें कि राजाजनक सुंकृतपुंज् दें अथीत् ००१४ जनकजी बढ़े सुरुती हें जोकछु सख वेखेंमेंगरावे ताको-कछु झा- है 238
'जानिये ऐसाकहि पुरनर पदलागते मुनिको श्रणाम करते हैं पुनः कहत काकेसुरूत यदनदीं जानिजात कि कौनकी सुरत पुण्याय उद्यभई जाकीवश ये राजकुमार यागभाग अनुरागहीं व त् धनुष यज्ञ ;! 23: पयेको जो भागहै जानकौीजीको विवाद तापर ये राजकुसार अनुराग
ह इहंको झायेहें यह काहूकी सुरृति उदयदे ३। ५६ ॥
पुरकीस्ती परस्पर वांची करतीं हेरीसखी भ
बालक मुनि विद्वामित्रके संगममें में देखे र इूसराहूप किसीलोकर्मे-नहीं दे केतेदें एक इयामवरण 'सुठौरबने तथा सुन्दर चंद्रसम बदन म्तानहु धारण पर हे दे. 829 मानहु मदन युगरुपहैं 23] त् पूवे कामदेवको शिवजीने उजारि बबंसृश्की रचनारहै इसदेत बह्याजी मानों रंचिके मदन युगरूप कामदेवके
* रा पूर्ववालीके वचनसुनि अपरसखी कहत हे सखी आपको वचन .. सत्य है परन्तु एक हठिको कर्म कठिन है काहेते विदेह महाराज को यह : श्रण्न हैकिजो कोर ताके संग-कन्याको बिवाहकरी झरू यह शिवको
अनुष गिरिसम धम्म यामें पवैतकी समान गुरुता धर्स है भाव बड़े कठिन : बली योधा रावण 28 अंटअ नहीं उठायसके सो धनुष जो रौजकुमारं
तन उठैतो केले संयोग द्वे सक्ताहै ) काहेते संदेह संयोगमेंहोत बालमसृद् बालक कोमल किशोर अवस्था तापर अत्यंत सुकमा, अरु धनुष गिरि परत ताइते अधिकगरू सो जोनउठे तो केसे संयोग होईं सोई मेरेमनमें कठिन असमंजसदै ताकोकौन ऐसाहै जो अलंसंजस सेटिके योग सैवारे बिवाहकरावै २ ताके बचनसुनि पूर्व कहनेवाली सखी पुनः समाधान करत हेसखी असमंजस किसदेतकरतीहों काहेते सुमति संदरीमतिवाले मुनिगणकहतेहें कि सावरैंकुव॑र श्यामबरण जो राजकुमारदेँ तेबलप्रताप करिके परिपूर्ण हें भर्थात् केलेहू दुर्घट कार्यपरे ताको करिडारबे में नेकहू अम न भावै ताको बलकही तथा जाकोसब॒जंग आपद्दीडरे ताको प्रताप कही इत्यावि बलप्रतापते भरिपूरि श्यामराजकूमार हें इसी बात को बहुतसुमतिवाले मुनिजनकहतेदें तताहूपर शिवजीक प्रत्मपते विदेह महा- राज्ञकी ज़ोपुण्यदे ताहीते सत्यधनुभंजिहें इ्यामराजकुमार निश्चय करिके : श्षिवधनुषको तोरि ढरिदें ऐला बिचारि संदेह त्यागी ३॥४६-॥
मूँ० । आयसुपायमुनीशकोभोरलषणरघूराय । सुमनहेतउ॒पवन 7 श 2 2५7०० न
बागके संध्यमें पगधारें तहां राजकुंमारनक्रों निहारिके झोमानिद्दारिके नेत्ननसों देखे भाव आवरन बहानारदित सन्सुख ठाढ़है. देखे सो सुख वॉलमयमें जो जानकीजी के मनमें आनन्दभयों ताको चोरि मुखनकरिके ब्रह्मा नहीं कहिसस्तेंदें ताकोतुलसीदास किमिकदै अर्थात्चारि मुखकेपुन/्भांदिआचार्यते तोकदीनदीं सक्तदेतदामेंग्रल्प॑ज्ञेकेलेकदों३॥९०॥
; हे पलिमेमपर हक
मृ० । रामसियाकोमिलनसुख वेदनपावहिंबार ।. श्रीतिप्रेमपर
मितिसुमति प्रीतमगतिरातिसार १ गतिरतिसारबिचार
कहतथकिरहतबिचारी ! सोमेंकहों बिवेककवनमतिगति संसारी २-मतिगतिशंकरशारदाकहिनसकतसुखसरसको।
तुलसिदासक्यहिबिधिकहरामसियासुखद्रशका३।६१॥
टी० । श्रीरघुनंदन जनकनंविनीके मिलनसमयजों सुखभयाताकों क- हत्तसेते वेदभी पारनहींप।इसक्तेदें काहेते किशोरीजीमें तोप्रीतिके प्रेमअंग की परमितिमय्यादा अथीत्हदइहै तथाप्रीतमज़ो भीरघुनाथजी तिन्नकीप्रीति कीगति जो यासमयमें रततिहे सो रतिसार प्रीतिको सहांश अवौत् प्रंण- यहें तहां प्रीतिमें झठअगहें यथादो ० । प्रणय प्रेमआशक्ति पुन्रि लगनल्ाग अनुराग । नेहसहित सबशीतिके जानवअंगबिभाग ॥ मस्ततवतवससभ्रंणय चहसौम्यहंशितिदिहोइ । प्रीतिउमगसोग्रेमहै विहलदृष्ठीसोइ ॥:चित्त अशद्क्तमासक्तितोइ यकटकर॒छ्टीतादि । बनीरदेसुधिज्लमनकी उस्कंठाहय माहि ॥ जाकेरसमेंलीनचित चोपरष्टिलोलाग । जासुप्रीतिमेंचितरंगो
सबब वर: हे 0०३७० रण े
| हमारिदी पत्नीहोईँगी सोः मानसमें प्रसिद्ध
डहाति भापनी मानिलेना प्रंणयहे ! गाति
अति ताको सार जो प्रणयंत्ताहीमय
बिचारी थकितदे जातीहे तातेवाणी नहीं कढ़त है.५९५०४४ ७
विचेकते कहोंकाहेते मतिगति संलारी मेरीतो बुद्धि सेसारमें लगीदेविषय
व्यापारकरि रहीहै २ जाको मतिकी गति करिके गथीत् बुद्धि की
ते शकर शारदा सोभी सरस रससद्दित जा सुखंकों नहीं कंहि
'सोई राम सियाक देरंशको सुख तुलसी कोन बिधिं कहे ३४६१ ॥
विनेतीसीयसुनाय । आंदिअंत
> कहकर सवबराचिदरिणमाय १ स्ववशबिहारिणिमाय
) प्रकटप्रभावप्रतापञ्रगमबरदानश
5-3 +००७३५४+-८९०२९०१२७०४८ १०५ २ शचीशारदाहरितिया ःख़भरि ॥जय ३१६२॥
॥अध्यपाय आचमन स्नान गेंध फूल धूप दपि नैवेद्ादि विविध
अनेक बिधिते पांवैती को पूजिं पुनःसीयपा/यँनपरि बिनती सुनायें स्तुति
करनेलगी माय हेमातु आदि जोकाल बीतिंगया अंत जोग्ावनदार तथा
- “वर्तमान इति तीनिंहू कांलसें स्वग भ्रमिपतालादि त्रयलोकनमेंत स्वच॒श 'बिहारिंणि भंथात् किसीकी परबश नहींदों आपनी इच्छाते*बिंहार करने -
वालीहो १ हे स्ववश ब्हाररिशिमाय मेरे हूदयके जो मनोरथे हैं सोआपु
.._-जानतीहो-भाव अतयामिनीही प्रभाव जो महिमा तथा प्रताप जो ऐश्वय
प्रकट संबजानतेहें क्याज्ञानतेहें मगम जो किसीकोदेतेकीगण
दान भर्यात् पतित्रत घेमेशची आदिकनको
.। अ्रसादपाय । आशीवीदपायआन दद्नै श्रीजानकीजी 22085 हा पड कौ ४5०५ शोभा का
, बंखानकरतसंते रामगुरुपहँ गवनेश्री रघुनाथजी शुरुविश्वामित्र के कोचले १ जंबजानकी जीभवनंको सिधाईतबरघुनाथज्ञी गुरुपासको चल्ले . जाइके सुमनफूलमुत्तिक हाथमेंदीन्दें पुनः रामकादि कथा:
| समग्र द्रांतरघुनाथज़ी यथार्थ मुनिसों कहिदीन्दें अथोतू: है" ४ हेत जनकनंदिनी बागकों आईरदें तिनको देखत संते हमकोदे्रलगी २जो बागकीसुंदरि कथारघुनाथजी सुनाइताको सुनिविश्वामित्रंजी संनतहीरहें तांहीलमय तहांकोजनकर्जाके पठाये तेसतानंद आये अथीत् विश्वामित्र ते कहे कि रांजकुसारन सहित हे कटा. बोलावते हें पुनः मोदलाहि अर्थात् दोऊभाई प्रणामकीन्हेंः पाय रास लपणको आशीर्वाद दिये अथवा निरछल' जो कहिरहे सो खुनते संते सतानंद आय जनक विनय कहें विद्वामित्रे
सण०क . ५ डरा हैं. $ तहाँ ००८: रा सात
आपडू. ६ सत्ानंद विद्वामित्र
बुलावन सुनि मुनि विश्वामित्रजी रघुनाथजी
भले अवसर अच्छे समयपर बोलावआयाहै हे तात्त रंगभूमि
.. को 5 अर सूपतों सबै बनि बनि चलहें परंतु देखें काको यश दशा .. दिशि भाव देखीकी नधनुषतोरै ताकोयश सर्वश्रफेले ३३६४ ॥
ग " हसकवमगकनादनिनानगलनादन गषणकीशिकसहितसताने । चलेरंगभूमि के 8०33-45 25:547505«४$% ० छाल सकल आन ५
<« जनकपरि' इलहित । आसनआदरदेय ३।६५॥ .
टी० । रघुनाथजी लक्ष्मणजी पुनः कौशिक विश्वामित्र सहित सता- नंद्रको अग॒वान आगेकरि मंगल प्रलिद् उत्सव मोद मानसीमानंदः ताके लिधाऩ स्थान -भ्रीरघुनाथजी सकल समाज सहित रंगभूमिद्ि चलते % संगल मोदके निधान मंदिर जो जनकपुरके नारि नर तेशहतजि धरछाँड़ि सब रंगभूमिको थाये किसहेत कि नगरकी बगर जो राहें तिनमें यहबात प्रसिद्धभे कि भूपसुत अथौत् विश्वामित्रके साथ जेआयेहें तेई राजकुमार या समग्रमें रंग्रभूमि देखनहेत झाये दें यहहाल सुनि राजकुमारनको दे- खनद्ेत सबधाये २ इहाँ विद्वामित्रकों देखि जनकजी पगनिषरि प्रणाम ७ आनदल़क्षित अथीत् राजकुम्रारनको देखि प्रेमउमेंगि सर्वोग कर मं भरिगया पुनः ाअमिन आये तो हमारी प्रतिज्ञामी प्र॒णेकरेंगे यह रि परम आनंदपाये पुनः कौशिक सदित राम लपणकों झादरदेण
र ३० + दिये झथीत् विश्वामित्र लपणलाल सद्दित रघुनाथजीको आदर बैक प्रीति पूर्वक वाची करि पुनः उत्तम मेचपर बैठारे ३।६५॥
रघुनायजी को देखि साधुजन सुर देवता:सज्जन कि”
गाजत प्रसन्नतासदित वार्ता करनेलगे २ दृदुभिगाजत
2० इक 24५ २८ संगनूमिमें बैठे देवता, तथा:
मे बकप ताये भाज्ञा दीन्हे तब सतानन्द तुरतही झानी रंगप्मि «० केसी हैं श्रीाजानकौजी सकल कल्याणकी खानि अथौः
भांतिकों कल्याण जिनते उत्पन्न होताहै ३। ६७॥
मू०्। जलन रसियरजुबी रनिशरि ) विनतीकराहिं प १ अचलअंजलिधारिदे : - 'हुंबरदानबिधाता । रामजानकीयोग्यजोरिमिलवहुयहना
रिमिलवहुयहना 2 53 2१ 4४०6 ९४०७५ २ नातज़ु टरेभूपतिजायलजायघर। यहसंयोग बे रिसहनि चिलापल्केगरिनर ३।६८॥
'टी०मिथिलापुर के बासी नारिनर सब सियरघुवीर 5 भर्थात् वरण स्वरूप भ्रवस्था स्वभाव कुल तेज परस्परचाह इत्यादि सब उत्तम- प् ऐसे भ्रीरघुनंदन जनक नन््दनी को वेखि भचल अंजलि विनती करहिं भर्थात् ख्री तो अचल पसारि तथा पुरुष अह्यासन विनती करतेहें $ स्त्री अंचल पसारि मांगतेहें सिह जियाता 2 97007 कक ।
कं जनकनंदनी के योग्य 5 :378803| ति पे भाव जानकीजीको विवाह. रघुनन्दनके ९3७
ब्रैको सुख जिनतें उत्पन्न होतादे ऐसी ऐश्वर्य म होत ऐलीअह्गुत छठा देखत संते प्रात नरनारी सबै में मध्यबरनारी जोलेखी जनहें तिनके मध्य श्रीजानकीजी उससे ६8802 चजुराग अचल श्रीतिदे इत्यादि रूप बज लए नि मगन देवता मनुष्य मुनीश्वरादि अ्रुसीय नयननमें नि्मेषदीन्दे काहेते ज़ानकीजी पत्तकनतें :
स्वरूपकी छब्ि नेत्रनद्वारा पैठि हूदयमें गई. बेंदकरि भीतरही देखनेलगी यही ३25 035 2
किन शव बनाहुआ जयमाला ः अरकबालियंदॉस फेर बकपाकदो बरी मे पगेधरे ३३७९॥: ६ : . ५7
2 टी 53 पको ज $ कमठ एएलरखोर कछुघा्की पीर्ठीत्ते अचल केसा है यथा बजुको' तः ताही को ललोरिमानों विः शैचि महिसंग अद्नाने एथ्वी के साथही रचिदिया है' सकल तनतोरिके याको बह्मानें रचाहैं कि मोस्थिकों भांति बेलेकरि हॉरिमानि रावेण सुर फेरिगंया तंथां भेंट महाबली सो ऊ मज्जितमभंये अधीत ऐसाचोराबिभांगे ।;ऐ हे ह- ४५००४ कबगये 20 छाँडियाकों जानन अथीत् याधनुषको गुप्तढाले एक जानतेहेंजिन 'शिंवको 3 नॉगादि'
अघदाननकवनेहंकाल दननकबमे बाग : 35: 3२४*%
; १ दाननकवनेहुंकालदेवगुर्रु'
. नमानहिं। श्रीमदतेमदरधवेदकोपंथनजानहिं २ जानहिं
..3-.25- इक ।कारिखकुलहिलगाब ३।७४॥
टी० । पुनः बंदीबोल्े हे सकल मदहिपालहु राजालोगहु हसारे बचन
घुनहु ऐसे 2९% ४ ऐसे भाचरणवाले राजाक्या घंनुषको उठावहिंगे
उठायसक्ते हैं कैसे भ्राचरणवाले जे विनापराध बधबंधन ताड़न
धन हरणादि प्रजाको दंडदेते हैँ पुनः प्रचंड भधपाप यथा साधु ब्राह्मण 'कोधन दरणबध ब्राह्मणी कुलखी गमन इत्यादि करतेहें तथादन ३९
अल अत साधु ब्राह्मणको भोजन धनादि न पूर्वेदीन्द्दे न अब १-भूतवत्तमान कोनेह काल न दानकीन्दे अर देवतागुरु * हे राह अर्थात् गुरुसेवा प्राज्ञा संध्या तपगादि कुछ नहींकरते : हैं कादेते राज मद मत्तऐश्वर्य में मदांधताते वेंदकों पंथंधर्म आाचा-
४ पापको पृ 72 हिंसा परधन दरण का गसन इत्योदिपाप आप करते हैं तिनके - करनेवाल्लेन को भावरकरतेदें इतिसुलभ मागेकारि तह ताते अभय है. प्ज्ञामह्ापाप करने लागतेदें पुनः पुण्यकी सरिसर टी गपक तिः जो रीतिहै ताको फोरै पुण्यकरम में बाधाकरतेदें २ कैसी बाधाक नमदिद्विज धनहरें ब्राह्मणनको अनादर करि उनको धनहरि
विप्रमाननापुण्यको तड़ागहें भोजनदान देनापुण्य की नदीहैसों | जत्रगापही नाशकिये तबसबे अधम करनेलगे पुनःतियवालक
। है 8; पराजय करिपाये तबउनकी ख््री बालकनको मा
| प्रापनत कुल दहौं परिवारसहित पहन जप ( धनुषकों नागहो दाथनालगावों यहबात द्व्ते उठावने तें पीछे उपहास होई ३। ७५॥
; ध॑लुपतोरिे
कुलनिह्ारिआपंनाडत्तप्न कुल: ते [तरुजें सत्य भावरण तथा
भारधरे भाव परिश्रम सहिके भूमिकी
भानुसमान जामें तेज प्रताप अपारदै अर्थात् तले स को जीत्िसकै जाके सन्मुख कोऊ न हैसके ताको तेजकही पुन्रः
होतजु भस्तुतिदानते कीरतिकद्िये सोह।हात बाँहुबलते सुयशधर्म नी सोहोइ॥जाकी 3243 40 8 डोत शन्नुउरताप। जगडरात संब॒आपही कहिये ताहि प्रताप/इत्यांदि तेज प्रताप सूर्यनकी समानजामें बडाभारी हो १ यथा सूर्यनसम तेज प्रताप अपारहोईइ तथा चंद्रसम भारी कीरति होइ चंद्रसम्शीतल तापहारंक' भझानंदेदायक
दानकी बड़ीभारी प्रशंसाहोड़ पुलः पावक भग्नि (तप तक एस पवनते झधिकारी बलकरिके हाय २ पवनसो (2 जीकी समान जाके बुद्धिकी प्रकाशहोय सो मद्देशको धनुष
जो क्षेषसम भूमिकोभार घरनेवाला मूपदोइ सो धनुषउठावै ३। ७८ ॥
मृ०। यहिप्रकारकेनूपर्धरेंशिवपिनाकपरचंड । जाकेसत्यप्रताप हक १ ध्वजादीपनवख ।
*.. यहिप्रकारकेघनुप्ररे ३। ७६ ॥ दी०॥ 02433 अर &४2:4080-. अल
यदिष्रकार॑के लृपः धनुष: क्यदिप्रकारके राजा:
ध्वज्ञा, सातोंद्रीप तथा नव खंडमें प्रकाशमानहै राजनके सत्य प्रतापको ध्वज़ा सातद्वीप नव खंडनें योध्याके भूष हरिचंद जे सत्य धर्मपर स्वेस घन राज्यख्री देहतक वैदीन्हे सत्य, त्वागे ऐसा जो होय भयवा प्थुकी सम जे भ्रजाकी रक्षाद्रेत बरबल गांहि
._. समान दया वीर दानारहे जे कबृतर्सके प्राण बचायबेहेत भापनी वेद दे .. दीन््दें वा दधीच समंहोय जे देवंतनके हेत प्राणत्यागि हाडदीन्हे ऐसा जो ह. डज्ञरै जाकोयश जंगत केहिरहाहोंइ यहिप्रकारेके जे नृपहोड ते धनुंप
को 'धरै शिव घनुषकों उठावें इसहेत बारबार प्रणंउच्नरे कहंतेदें ३।७९॥
सू०। | 3 अल अ्यनमलणनल ; ॥ धस्थोमेरुमंदरम म हीमचेडसिंधुक्रिदाप १ मथेसिंधुकरिदाप्रप्रवर्लाहिरण्या » क्षहिमारथों। मुरमधुकेटमबधनंसुयशजगर्मेविस्तास्थों २ / बिविधभांतिबसुधासकलतुलसीप्रतिपांलनकरें । दुखो . होयनपरूपधरिसोनारायणधनुधरें ३। ८०॥
: टी०। पुनः बंदीबोले किती नारायण घनुधरें उठाय तोरिसक्तेदें काहे ते जाको प्रताप प्रबल हे भाव जाके प्रतापके झागे सुरासुरादि सबके प्र- ताप मंदपरिजाते हें कैसेहें नारायण जे मेरुसंदर मदीधरधो सुमेरुभादि पवेतनसहित सब मही एथ्वीको धारणकिददे हैं मथवा बाराहरूपते एथ्वी, घरे पुनः कच्छपरूपते मंदर मेरुघस्थो मंदराचल पर्वत पीठिपर धस्धो पुनः चतुर्भुजरूपते दापकरि मानसाहित सबरल्लेनिकारे 3 दाप लायक घुनाः बाराहरूपते अबंत्त & बली जो हिरण्याक्ष ताक़ोमारे तथा मधुकेटम सुरादि बड़े बली दैत्यभयें हें तिमको बंधन अन आँत् मारिकि जंगमें सुयश बिस्तारधो: &४७४ २१००० फेलाये २ इलीभांति गो- सांडेजी कहते कि बिविधमांतिके
हरे ६ ेति। )। सिफात कि कल #+ हलि
कौनरचना 7४% र तडाग गिरि को ३ 8] ॥ हक ग्गज पुनः जिन सातहु समुद्रबांधे तिनके
बचचिमें सांतदीपबनायेतथा ऊँचे स्वर्गवेवादि नीचे भ्तल पातालनरनागा दि वा ऊँचे मुक्त सुमनक्ष नीचे बंडजीव वा ऊँच ब्राह्मणादि नीचे वा ऊँचे खुरः उतनी प्रशु पक्षी कीठ पतंगादि यावत् जगकी. 4५ , ताको ज्यदि प्रबल बलतेसांधे प्रकर्पफरिके-बलहै जिनमें स्यहिबलते जाकी जैसी मर्यादाबांधे ताको तैलेदी निबाहत यथा पिरूदरीआदि जलबर्षे ममि में भापही पैदाहोत गलर फलमें भुनगा आपहाहोत कुशवारीमें कीठ बिता खाये प्रिये हुृददहोत इत्यावि निश्राहइत २ चारिमुखानि चारिहुवेद साथे शुद्ध उपजाये इसीभांति सब ब्रह्मॉंडको रचे सोई यह कोवंड .धनुषघरे उठावे
जो बिघिससोन प्रचेडहोय ३३८७१७॥ कह नजगतहँंताएंकहीबान 2] ; 20402, मे जास्थों। (25538 58 आपको ३5२ ।जन्परूपष ह-५०। शा
>म ग
£ : करधरेंगणनायकसोहोयजो ३॥ ८३ ॥ है ठी०। जो गणनायक लो गणेश जाकी समानहाँड सो प्रमाण धनु- घरै सत्यकरि लोई उठावे केसे गणेशहें जाको पर्जे प्रथम सुर सबदवता जिनको सेगलं कार्यमें प्रथमहीं प्जते हें बिघ्नहरणकी बान जिनको स्वभाव विध्नहरता है १ विध्नेहरणकी बान सुभावहै ताते हरि इर विधिसादें ब्रह्मा बिष्णु शिवादिकार्य सिद्धीहेत साधना पूजादि करते काढेते जाकोनाम स्मरण ते सब विघ्नं मिटि कार्य्य: सिडहोत पुनः ->अअक लिड्॒जन योगांहि अचराधें प्राणायामादि योगक्रिया करतेहें २ रन सुबन पावतीकेपुत्र गणेशजीको अवराधत प्रजा ज़पा- जोढिसो फल पावहिं जोई-प्राअितद्ने गुणेशजीको । हि निहारता ६: प्र्थादिफल पावताहै ताते जो गणनायकसो होय सो यदिपिनाक धनुधरेभांव गणेशर्जीके तुल्यहोय सोयदि घनुषको उठाय 2॥<३१॥
लि सेब सबै समाजमें दें गिरि हिमांचलादि सातौसमुद्र भाठौ मरुत पवन इत्यादि जहाँलौ स्वृरुपवंतहें सबै इ्ोँ नरादि |सुनतेहें योग्य ज्यद्दि के बल होय सो अब उठौ शशि सृय्यादि हक धनुष धर्ो तरो प्रणपूरों पूरकस ३४८४॥ मू ० । बेठकतेउठिउठिसजेसुनतभाटकेबैन. । अमिमानीमानीम- हिपकियोहियेआतिचैन १ कियोहियेअतिचेनदेवबलइएष्ट सँभारंथों । कटिपटटढकरिदंडमुजनिकोजोरप्रचार्यो २ जोरप्रचारिनिहारिभटअरुएनयनंआसनतजे। कहांधनुष लणप्रणकहांबैठकतेउठिउठिसजे ३।८:५॥ टी ०। भाटकंबेन जनकजीकी प्रतिज्ञा जो बंदीजन सुनाये तिनकों सुनि जेमहीप भंभिमानी मानररदे भर्थात् बल्ादिको गर्व ताको अभिमान कहीं तथा ऐश्वर्यादि परचित उन्नत राखना सोमान है यथा कमा गये: अभि: मानः भहंकारः ज्यंगर्वस्यचित्तस्यसमुन्नाति: द्त्कर्षचिंतने: मानउच्यते इत्यमरविंवेके इातें अभिमानीसानी राजाहिये अतिचैंनकिय उसमें भानन्दद्े बैठकते उठि डठि सजे भषण बसन सँभारे १ हियेसे भव्यंतचैन आनंदमानि पुनः इष्टदेवनको बल सँंभारे पा ४; कटिमें पट इढ़करि कमरबंद कटिमें पुण्करिबॉथे पुनः भुज ज्ञोर प्रचारे तालदैचले.२ जोर प्रचारि जोरकरि तालठोंकि धनुषको
भट ब्ररुण नयन क्रोधते नेत्र त्ताज़्करि योधन आसनतजे इसभांति बैठकते उठि डठि राजासजे पुनः “मानकरि क्याहै तोरेडारते
लगे तहां, धनुपदी नहींनयो परन्तु येते करकाटि दयो ०302 202 आजनि तसाके- 2025: त्करि धनुष उठाये तात्े पाँवुनये तथा प्रकर्ष करिके जोबज्नरहा ताकी हानिभई-१ कादेते मुखको जो मानरहों - सोसब् सखो मानते जो ०22 2328 अ्रमते नाशभई मुख स़खिगया पुनः तनमें प्रस्वेद पसी- अधेर रुख्यो मंगासस अरुण ओएछ रुखेपरिगये सखि विहुंमलम भरुण अघर तथा वदनरूरूयो परिगये तथा वेहकीदशा विहलभई सबीग ढलिप्रिगये पुनः लोचननेत्र झेरू मनदोनों ढीलेपरि: गंग्ने ताते तयेभाव झतिश्रमते नेत्रनपर पलके ऋलांपिगई सन हारिमानि लियो काहते धनुतो नयोनरहीं भावड॒ठि-न्॒ सक्यो भरु भत्यंत बल्लकरनेते हाथकरिहाउं नयगयों सीधे नहींहोतेदँ ३। ८६॥ म०। एकतर्जेएकेंधरेकरेंअनेकउ पाय । बैठेठाढ़ेसध्यंधारिधनक $ 23 अल कक 2. धनुकहँचाउनखायबिरदबंदीगणबोल । २ नयनकरेरेभाट कहिमातुजनेकहुंतरुतरे । कोदीकरी अहारके . एकतजे ४5 एकेघरे इ१८७॥ 7: * ही०। एकराजा उठायकै द्वारिगये तातेतजेथनु उठावन त्यांगि भल- से भये तब एक राजाधरै धनुष पकरि उठावने लगे ते अनेक उपाय
कैसे उपाय करते दें बैठे ठाढ़े धरि बाचमें पकरि अनेक बलकरि उठावते हैं परन्तु न खाय भाव किसी. भाँति हज 00030 'पावत जब धनुष 8207 88 चाउ नहीं खात॑ किसी करके हे खोजे हे के पा लज्जाबशं न नहीं चंद
ब जें बेदीगण पूथ राजनकी बिरवावली बोलें पूवेकोयश बे ९ क्या प्रतिकूल बोले त़यन क़रेरे भाटकदि सक्रोध
पयालाए फातसजड
772 तौमिला, अहारकरिके पिश्माये ताते जन्मही ते कमजोर हैं लेई राजा एकतर्जे एकेपरें अनेक ._ भांति.बल्तकरि हारिबेठे धनुष किर्साने नहीं उठावा ३१८७॥ मू० + धनुधनसवकोहरिलयोमतिगातिनामसदाप ॥ यशकी
रतिबलबीरताधीरजतेजप्रताप १ धीरजतेजप्रतापनियम .. ब्रतधरंसुकमनि । अख्ाशंखकीहारिरूपयुतिलाज़काज : शनि २ लाजकाजपरगाजधरिराजनिधनुकरसोदियो। री तेबीतेसंबंभयेधनुधनसबवकोहरिलियो ३ । ८८॥. टी०+ शिंवको घनुष सब राजनको उत्तमतादि सबधन हरि लियो कौन उत्तमधन यथी सतिकीगातिः अथात् सुब॒द्धिको विचार नाम उत्तम अज्ंसा सदाप सद्दित झहंकार पुनः यश झथात नीति धर्म सद्दित बाहु- बलकी प्रशंसा तथा कीरति 552 दानशीलादि की प्रशंसा बल बीरता घीरज तेज प्रताप तह्ां के पूंडैट कार्यपरै ताकोकरि ढारबेमें श्रसनझावै ताको बलकद्दी सबलशघ्नु ते युद्धकरत में मनहप मुख प्रसन्न बनारहै ताको बीरता कही तथां काम क्रोध हानि लाभ आपत्कालादिमें मनथिर रहना धीय॑है जाकी सन्मुख कोऊ न हैंसके लो तेजहें जाकों सबेबरे सो प्रतापहै १ नियमब्रत ग्र्थात् संदांचार एकरंस 3५.2४३४ सत्य शौच . तप दानादि जोधर्म तामेंहोम प्जापाठ संध्या तपैन जो सुकर्म इत्यादि सबनाश भये तथा अख्र बाण चक्राविशख' तिनकी हारि भई तथारूपकी युति जो प्रकाशपुनः लाजके जे काजहें यथाबडेन को दबाव अनुचित त्यागादि २ लाजकाजादि पर गाजधघरि नाशकरितत्र राजनकर हाथसों धनु छुयो तबंधनुष'ने सबकोउत्तम लियोताते . सबराजा बलबीरतादिते रीते खालीभये' | "रद्दी सो बीत्यो चुकि गयो ताते मंदभयें ३४८८ ॥ 22250 ्ड
जे करधनुधरघोराजालोग गर्लिंगाज 5) धन
_डठावनेंगे जवै्धनुष ने उठा तबलजाय जजाय भागिगये डे भाये हे
_ आ॥रापनाबल सैंभारि तथादल साजि साजिसबै राजाभाय यहांराज समाज
में बिराजमान भये ) ताही समाज में राजा शिवधनुषन उठनेपर मुख
लत प्रसन्नता तेज उतरि गयो बनलायक उदासीन भये काददेतेसबै
संपति गैवायतब शंकर धनुधायककरधो भाव पूर्वदीआपनी सबै ऐडवर्य
: नाशकरि दीन्दे जब किशोरीज़ीके बिवाह द्ेत शिवजीको धनुष तोरिबेकी
इंच्छाकीन्दे धनुषकपास-धायके गये २जब धनुषनदीं उठोतब केसेथायके
आसन परंगये जनुतेनकीप्रभा तथा बलतांको धनुषने छलकरि दरिलियो
जाते पूर्वती गज गर्जिकरसों धनुधर्थो जबडठिनसक्यो तब लकलराजा जल्जाय ल्जाय ग्राय झासननपर बैठे सबशोभा उतारिगईः ३॥८९॥
मु 43 5लानट 5 98 । तिलनटरे भूपति
* लपटाँय १ धररेंअरेंलपटॉयजायँगड़िअधिक
धरामें। जम्योशेषकेशीशईशजनुचढ्चोकलामें २ कला-
रूपकेलासको धरणिरूपधनुकोलयो। उदय अस्तर्गिरि
भारंधरधनुसुमेरतेगरुभयो ३। ६० ॥
टी० । शिवकों धनुष सुमेरुते अधिक गरूभयो काहेते कोटि करोरिन
डपायकीन्दे तंबहूं नहींउठतादे कैसीउपाय भूषति राजालोग केरतेहें कि
घरें झरें धनुषक्ोपकरि भड़ेरहइते हैं तामें लपठायकै छरतेदें अनेक्रभांति
बलकरि उठावतेहें परंतु तिल्तनदरे तिल्लभरि भूमि नहींछांडृताहे ५ जब
राजाल्ोग घनुपको पकरि अड़े लपटाय ज्यों ज्यों बलकरि उठावाचाहत
, स्पोंत्यों धरा जो भूमि तामें आथिक गड़तचलाजात केसा अचल देखात
यथा शेषके शीशपर गड़ोहै झथवा कत्ल कहे इसकालमें याधनुषपर जनु शा शिवजी चढ़े बैठेहें जो इढां उस्पेक्षाकरतेहें सो सत्योपाख्यानमें यथा-*
है कुमारी मंजर रहै २ तहाँ मेरी तो हास्य भइये भई परंतु तब जगमें यावत् बसुधा एथ्वी है सो उहस्त्ो इत्यादि सभामें जंनकजी वचन कहे कि
कोऊ-ब्रली-बीर न ठहर ३९२
. मृ०। लपणलालकोलांलमुखसुनेजनककेबैन । फरकेअधरपला 9 पकोअरुएभयेडडनैन १ अरुएभयेह्ठनयनजोरिकरभेउ ठिठाढ़े । करुणानिधिकीओरबचनबोलेरिंसबाढ़े २ बोढ़े
रिसकहसनुजनकबचनकहोरघुवंशरुख। रामइंपालिसमा जमहँलषणलालकहलालमुख ३। €३॥॒
टी०॥ जनकके कठोर बचन सुनेतेही क्रोधबश्ञते लषणंलालको मुख ..लाक् भयो पुनः प्रत्ञापको अधर फरके यथा॥ प्रत्ाप्रोनर्यकंवचःइत्य- मरः ॥ झ्रथोत् झनर्थक बचन कहनेहेतु दोऊग्मोठ फ़रकनेलगे तथा दोऊ 5 अरुण 4 दोकनग्रन भरुणभये-पुनः करवोऊ हाथजोरि ठांढ़ेभेये करूणानिधिकी झोर भर्थात् सेवकके दुःखमें
' तुरतदी दृखहस्ना यह करुणागुणहै ताके निधि परिपूर्ण . साथनाय पुन: बचन “बाढ़ेते 7772 प्रनुंचितको विचार जताते कठोर रुखराखे सर पी 22 सैमाजमें र पा
हाथसों छुये
दे २ यथा बसुधा समुद्रमें बोरों वही यामें संदेहहें किप्टथ्वीको शेषथाॉँमेहें ते ग
करबि भर्थात् एकद्दाथ ते शेषके शीशके चिलहों इत्यादि पुरुषार्थ भाज्ञादोयतों करों ' डंठाबों ३।:९४॥ . .. . ६
“- ठी० ।लक्ष्मणजी लरूयो देख्यों कि धंनुपटकत' अर्थात् धनु षंकोतोरि
डारनेचाहतेदे यह प्रभुकेमनकी बातंजान्यो भाव हाधर नहीलंगा- थे डंठावनेको मंनकीन्हे यहजानिंघरणियारी सबै कहेड: अर्थात् शेष बा- राह कमठ दिग्गजादि यांवत् एथ्वॉकी धारणकरनेचाले हैं तिनसंबन्सों लक्ष्मणजी कददे कि गातसों सजगहूजिये वेहकों सँभारेरहिये १ कादेते गाते संजगहुजियें धनुषकों धका ठोकर दरेरो दबाव अं्यात धनुक्चढ़ावत में भमिमें ठोकरलागे वा दबावपरे ताकेंबेगेते जो महि एथ्वीचली हाजी
डोली वा उल्टिज़ाई तो सृष्टिबिकलता सब्कोदेसे-सुसखुर नर नागादि आव॒त् वेहधारी सृष्टिपहें तेसव बिकल्लद्नेज़ायँगे.ऐसा तिश्वय ज्ञानिलेड भाव जो भानंदकालमें प्रलयकालको दंड भृतनको भया तौं तुम्हारी बडी. निंदाहोयगी इसदेत पक र कर कप कच्छपादि का रघुबंशमणिको मन: बे नुषउठा' ५ गा ऐसारुख में रघुनावर्जाकों तंते लट्कंतमही सँभा- (22४ हालत ड्रोलत- गिरतसम॒य एथ्वीको सली भांति सँमारि गदे लक्ष्मणल्लख्योदेख्यो ३-९९ ॥
पुनः जबेंटूंटो तब सो ब्रह्मांडभरेमें भारिरहयों तंब गोसाई' श्रीरघुनाथजी टूटे खेई भृमिपरधरिवीन्दे २ गोसाई संबको पालनहार के: ३30 शंभुकी धनुषतोरि भूमिमेंधरें ताको कठोर शब्दभयां ताकोंसुने योगीजनरें ते जागिपरे देखेंमें तो दोई खेडदें परंतु चढ़ावतसमंय अ्रभुके बामअँगूठाकी जोरलागेते धनुषको तन स्ंडखंड घूंलिगयां ३॥ 9
० ।शिवशिवदुषभपुकारईधनुषशब्दसुनिघोर । दिग्गजदि- ् उपालनभयोहदंयकंपअतिजोर १ हृदंयकंपअतिजोरकंप- _ कैलासईशथल। शिवशिरसुरसरिधारउल्नलिआकाशंगयो
सवा तीन शिश शेर अपर र् थलउमागणेशविचारई। ६8 क ५8 %। (के,
टी०। हृषभजो नेदाश्वर तेविकलदे शिवशिव पुकार लेजर क धनुभंगको घोर सहाभयंकर शब्द सुनिके तथा दिग्गज जेविज्ञा पर थाभनेवाले पुनः वरुण कुबेरादि विग्प्रालनके हृवयमें अत्येत् भयो भाव भयम्राति सबको करेज:कांप्िउठा 9 यथा अत्ति जोस्ते | पालनकों हूदय कांपा तंधा ईशधल शिवको वासस्थानः
“अमन शीश जठांबिषे जो गगार्ज
।सुरफूलन वर्षाय पनुर्भगभयेपर झ्ाकासते देवता-फूलनकीबर्षा करतेदें पुनः कि वसकिकी जलयहोय जयहोय जयहोय ऐसाशब्द उच्चारण करते हैं पुनः विप्रवेद पढ़िरहे हें बंदीजन बिरवावली प्राचीन कुल्कोयेश बखान करते हैं नारी सेंगलगति गाय रही हैं १ संगमें नारी संगल गीत गॉयरऊूी अरु भीजानकीजी दोऊ हाथनते उठाय भीर घुनाथज्ञीक्े- गरेमें पहिरायविये प्रभु छातीपर कैसाजयसाल्त शोभितदोत जनु विव्वकीरति
लि इसीकेद्वारा प्रभुक्ी उत्तमकीरति संसारभरेमें छाई फेलिरदी कम की प्रशंसा करिरहे दें २ सिह याज्ञवेटेक्यादि सुनिं दावि ते गांवतें हें पुनः बलप्रताप रूपछबिं नि ब्खान करतें हें
यंधा को गादोतजु भस्तातिदानते कीरतिकहियेलोब । होतबाहुबलते सुयश्॒. धर्मनीति सहहोय ॥ जाकीकीरति सुयश सुनिद्दोतन्रु उरतापाजगढरात
सब आपही क़द्दिये ताहिप्रताप॥पुनःछव्रियया: (3-89, स्व सुन्दरता कम || 2७0०“<+ खुद॒ता 0222 भालक समयति तनसा। ८ “323 2:22क748:40739 "हल: हमर ॥
त जुतन । संबभँगलुभग स॒ठौरसुठि सुंदर | देखी भनदेखीमनो तरुनी रम॑नासोय । फांतिदेहकी 'ज्यो- खोई सुदता जान । परसेः
धनुषबाण सुधारि लक्ष्मणजी उटे परन्तु बचायराखे भाव यह संगलकांज़ समय बंध करना भला
दा बिचारिमना कीन्देबाण प्रहार नकरने दीन्हे २ जब दृषटनूपनको बचायराखे तब जोतिया दुरीहुरती सो प्रकर्टी भथोत् सुन्दरता
ी जानतीरहीं डिक गण आप हे शल नाथंजी त जे परदेवार्ली अध्यषण तेऊ भई के छो
ऐसेतेजं्रीन जिनको तीचहून्हॉंडरत दानचाहिये तद्दांपरधन हरतईइवर भावचाहिये
तुरतखवीसज़ाइहै. नाझकरिबेको कार १० किरण शान अनादर बचनबोलता ड़ महा ज्ञानी तुरतही तुरत खीसजाइहै इसी भ्राण जाहिंगे ताते मुखते सँभारि बचनबोलुउबित,अनुचित ततोकछ अपराध क़िहेनहीं जो गुरुको गुनही
धनुष ततोरिहारा सो तौमोनभो डारे ताकबिदि जवाबदर्दी 402 तामें ने प्राण क्यों गवाब्॒ता है २ पुनः जो तेरे वचनखुनि क्षमा किदेदँ
ज्लखि करिवरं टरी अथीत् प्रथमहीं कुवचनके साथही, तोको परन्तु बालकदेस्रि तेरी एक अल्पमृत्यु-ट्रिगई झबबहुतबात्तो
के पाछेलुके न बचिहो का तेज्यदिते क्षत्रविद्दीत
'राजनकी प्रृथ्वी किहेजें जासों ताड़ी परशुधारते- सुम्दारा
श्िर काढ़िहों ३। ३०६ ॥ २४
परशाकी बिक दिशवामितेजी आकर बरनो भव भा ४22 इसबालकको मनांकरों
स्वभायन दासबनिम्रपीनहे क्ीमेल धर्चन क्रहि क्यो: बजिलेकिती जक धनुफ्तोरने/सेस्यो
लीक ब्ती #लड़ेतताति। इक
(न हेफरसा ते मेरेहाथर्में बनाहै भरुमें भांति सरोष उत्तर सुनत अभथात (साई बबदरहां है तथा मोरहृदि ज्वालनबाढ़े मेरेनी ज्वालाबाढ्तजात भाव ज्यों ज्यों 5त्तरूय साकत्यक्रावेत ह्पोत्पों की घाग्नि " 7722 इसबालकको बच्चनहींकिया साते जानताहों क-सेरा ३ क्रोधभस्निके ज़्वालनके बाढ़ेतें. मेरा/उर अं>
'जनकों लाला फकिमंगा' कनणडाए कक हड़फफ
धावपुरसंतानंदअवघहिचले ३। १९५॥ टीवश्नीरघुनाथजीके ब्र्याइकी
लस्नपन्निका हॉंथसें के पाय सतानंद अवधहि अयोध्याज़ीकोचले कौनी लामाते थीत् दररापादि-
३ महाराजदेखिके प्रतिक्षर गा मे रघुनेदनके बिवाहकोहाल भलो मंगलमयज ' लिखादे सो प्रसिद्ध सबको सुनाये सबसभामें प्रसिद्ध है समाचार अयोध्या भरेसें फैलगया तातेपुरमें घरघर बधावनबाजने
। सतानंद ग्रयोध्याको चलेआय मंगल समाचार सुनाय सब- को झानन्द विये ३३१२४५॥ * «
मू० । रामजानकीव्याहसुनिसाजामूपबरात । रथतुरंगमातंग ै
हे 332 2525 विवि: पा 0 १ गजघंटाघहराठ भकोरप्रमोदपुरसुरतियजयजयसुमनघुनि । दुशरथघौंसुर पतिसज्योरामजानकीव्याहसुनि
“माजसे >> अकट-2२४अक-३० ० 20 ।बिः कुलको ब्यवहारकरि दल्तन कांडन पिढनिमंत्रण इत्यादि शी जो रीतिरहे कै भाव जो बिना दुलदादोनेवालीरदें तेतौ कीन्दे होतीदें सो इढां नर्हीकीन्दे ३ 3 शुभ मुहूर्तजानि
रमालक्ष्मी अक्मायणी सरस्वती इत्यादि पतिनसदित्त
'डम्मा बिष्शुसहित रमा ०2५3४२८ कं: ०० ७ रामज़ानकी रूपछबि अथीत् यथाचुम्बक
० रूपकडी यथा भयवहुणदर्पणे॥चुंबकायःकरण
त्॥चक्षुपांसगुणोरूप॑ञ्राणःस्मरशरावले॥ तथाछबि॥
चझुतिलावण्यस्वरूपस्वइसुन्दरंतारमण़ीय ॥ आातिमपुस्वताबहर
दो० ॥ झुति
०232: ॥ भयाव् शरदर्चद्रसम सुखकी युंति मोती . तनमें बिना मूषण जो भूपितिवत् स्वरूपता सवीग सुठौर बने. । 5० ० का लपेकी, रसनीकता नस कल ३३ ५ ' माधुरी खुदुता कोमल झंगसुकुमारता-ज़ो फूलौचोट न सहिसके इत्यादि रघुनाथ जीको रूप भ्रू जानकीजीकीछ बि देखनेदेत ज्ञालचकरिके : ३ दशरथकेबारे निराखि देखनको ललचाय झर्थात्॒ दशरथ नेदनके य स्वरूपकी साधुरी अत्यंग निरखत संते अघाते नहीं ताते बार देखनको लालचबतादै 3९535 सब मनबच क्रम करिके
अथोत् ऐसों प्रेम
ग्रेम उ शो लाविशल रोमांच कंठारोधन हानि कप 7707 व
टी०। सुथल सुंदरेस्थान में भधौत् जहां सबभांति भूपजनक महाराज बरातको डेरादिये तब कोशिक- सहितत्तक्ष्मण अरुरघुनाथं जी पितुके आगमन की खबरि. “हर्षिकले भथीत् रुपा- दया शील सुलभ उबारतादि अ मंदिर औरधुनाथजी आनंद सहित 33675: मिल्लनहेत, हर्षिचले जाय रघुनाथ जी प्रणाम पूर्वक पिताको मेंठे भाव देखिदशरथ महाराज उठाय हढूंदयमें ज्गाय लीन्हे पुनः भूप राज मुनि पदरज धरे प्रणाम करि विश्वामित्र के पार्येन शीशपर घरे तथा शत्र॒दन भरत दोऊंभाई प्रभु को प्रणाम था तीनिउभाय यथायोग्य भि्ते २ पुनः लपण सहित वशिष्तकों प्रणाम करि मिलते तथा अपर ब्राह्मणन को प्रणाम करि वधपुरके यावत् जन रहें तिनकों यथायोग्य प्रभुमिले तबराम : हियो रघुनाथजी को देखिसबके हूदय भानंदते भरिगये भये अंरु.सुथलमें जहां सूपजनक जी बरातको सबमंगत्त पदार्थ लिहे खडी हैं ३।१ २९:
मूर 0३
४ बैलदी अरुणारे नेत्र व री भादि जेले राजकुमारनके बल छबि सोभा देह 25३0 देहकी प्रकाशहै जेलेइन म कहत तेसे उनको नामभरत अरू सिविदेश न येतानिर पेन ऐसे नूपसंग भौरहें ३। १३० ॥
हिला शबन 8 पटक
नमिलायमहेशविधिबड़ोयोगजपतपकिये । तौसबपुरसुकू
: तीसमुभिसखिविदेहसमुमेंहिये ३ ॥ १३१॥ 'अनुरूषि राखेडहे नृपप्रवीन होयतो चारिहु कुरवेंर यहि पुर बिवाहिये अर्थात् जो जनकमंद्ाराज चतुरहोईं तो इनचारिहु राजकुमारन ) ५ इ्दां बिवाहकरें ३ कादेते नृष प्रबाण इसीपुरमें इनकी बि- बाहकरें ई चारिसगाईदीन पर्थात् ब्रह्माने चारिहु संयोग रचिके इहां पटैदीन काढेते जेसे विवेहके घरमें चारि कन्या महाराजके चारि कुमारदें यह संयोग-धनुषब्याज शिव कादेते यह संबोग महेश विधाता मिलायदीन बड़ो | बढ़ोभारी अष्टॉंगयोग
साधारण ६
को पकरि लावहिंगी तद्दां एकांत थलमें लेके मनभावत आपनी इच्छा प्रणेकरि तब छाड़ेंगी ५ जब निरभय गी तब नरनारि ठप्तदोईँगी अर्थात् नरतों चहे अबै ठृप्त सये - न अब्॒दी प्यासीहें ते तबै ठप होगी जब सपना रिकेनाते इहांगा हल ०० ०3४5] लहि।नि जानकी सा इड्दांते ज
०) कक योध्या जी रहेंगी पुनः गन गलि ४२० को आशनत भजिक तियहे त्ता
न
'बहिंगे २ महाराजके आपने थलै ज
दाह को राजकुसार इदामध्या- म आारिदेन हा कार्तिकरृष्ण प्रतिपदा तोरे झोच मिटिगया इत्यादि यावत् शोचरहो ताबंत्
'सुछुत खंडितरही १ चारिदिन सुछृत टूटीरही ताबत् चारि नुप कर्चैर बिवाहों जानकी आदि चारिहु कुमारिनके अआरिडु राजकुमारतको ब्रिवाहकरौ पुनः ब्याह समय 'नेत्रनभीर वेखि जगतमें जीवनको लाभआनन्दलेहुं २ की प्रवविजगमें जीवनकी जोलाभदैताकी मर्यावदददै यंदजो चारिड कुमारनके बिवाहको सुख जे जन नेत्रनभरि देखहिं पा छतार्थ रुपहें परन्तु जी विधि रुखंनूप उरबले बअंह्माकी अनुकूल जो चारिहू कुमारन को ब्रिवाह जनक महाराजाके मनमें बैंठैती- ये कला कक पुणबत्रे जब पुरवासिन की बढ़ी सुकृत उदयहोवै ३॥ १३३ ॥
| सखिसुकृतीताहीगने रामलघएशंडविदेखि। तातेपुरस
'टी5 । व्याहेपरी धरा उसका | के धांसको” पठई -हेमन्तऋतु तामें उत्तम अमहनंसास पंचमीतिथि उत्तराषाढ़नक्षत्र ठंदियोग भुगुबारं
गोंधूली वेलामें शुभलग्न विचारि लिखिक ब्रह्मा नारदके हाथ
समयज्ञानि रघुनाथज्ञी के विवाहकों जो बड़ाभारी उत्साह है ताकों देख-
ब्रह्मा शिव इन्द्रादि सब देवता 47272 हनन औ, जनकपुरकों चले $ देवता देखनहेतु चले ताहीसमय व्याहकरावनेदेतु सतानन्द
'बरातसहित चक्रवर्ती जी को हक 3 घतिलेज-अ 37५७४ कक सो सुनि बरातलहित ये चलिायें पॉड
तवतभोंदरवर्दीकरज़ोरेइस्द्रानीव्रल्लानी करजोरेनव्र्नि हि 2 य९ 2 20060 ज्जो क । स्वउचाहृतजाकीकरुणाकोबारबार सन्प्ताती;४ जाबिनपातौद्धिलिनसकतजोसबघटमादँसमानी-। संन््तजनन जानी ४ अर्थात् सब शक्तिनकी इश्वरी है यथा ४ 32337%0 827 कक ॥ तप्तकांचनगौरांगीशक्तीन्रांशक्तिदायिनी 9 को रुख जुगवत पलजाहि जहाँ जिस माडवाबिषे' ऐड्वर्यवन्त भरीजञानकौजी दें जेहीदित चितवें सो विवि
गे ३१ ३८॥ ४ कद वन शव पका २
22%! 3२5 > अथौत् परम जावक पीतंधोती क्षुद्रघंटिका करां- 5 के बी कंकण कंडा केयूर कंठां मंणिमाल पदिक कुशडल जरकसी जामा पेटुका उपन्ना पांग इत्यादि मुषण वलनसंहित रघुनाथ ज्ञी साडव मध्य समाजमें बैठे जगंमंगे भूषणमें मणी चंमकिरही हें कंचन झुक्तनजटित मायेपर मोर केसाशोमितहोत यथा नखेतेसहित निशिराज अन्द्रमा है अथोत् मुख चन्द्रकेसमीप सुक्ता नक्षेत्रंले छंबि वेखावते हैँ 3 मौरसहित. सुख यथा नखतन सदित निशिराज चन्द्रमा है सोई ओ्ोभा नारि नर ल्वी पुरुष सबै देखते हैं कोन भाँति यथा रघुपतिमुख
शरदशशि छबि निरखत को तृप्त॑नभा कक 5. पृणे चंद्रवत्
छबि माधुरी किरणें- तिनको चकोर॑वत्नेत्र-
का हल भाव कोनहीं नेत्रतभरिदेखा २
काहेते सबै तृप्तभये कि रघुनाथजीके सुखकी छंबि लाखि देखिके नयन चकोरनदवारा सब अवलोकन मेंलगेरदें यकटकंसब देखेकीन्दे ऐसे श्रीरघुनाथनी बसन भूषण सद्दित मड़येसर समाजमें बैठे ज़गमंगाय .. रहेंदें जिनपर कोटिशत मदनवारिये जिनको भलोक्षिक शोभापर सौकरो- _निवछावरि करिदीजिये भाव समतायोग्य नहीं है ३ ३३८
म्रषितकरिलञाये रमन 'रामदिग स्थितकीन्ही रघुनाथजीके नगीचही सन्मुः ५ बात करनाचाही सो अवसर समुझि मुनिवर भ्रतिमंग शांतिकहिदीन्दी भधीत॒ बशिष्ठादि श्रेमुनिन शांति
'पढह़चेलगे २ जबे जासमयमें जानकीजी मंडप अहगतरस रपट सं" अति
बाजनेलगे जानकीजीको देखि वंशरथ महा- 4८-33 सुखीभये तथा सब रानिन सहित जनकजी प्रेम
रुकत रूप अवलोकनते बिलग नहींहोत सोई 32% 2 जिनको सुत्तभ प्राप्है तो कोशलेश जो दशरंथ महाराज तथा मिथिला नगरमें जसंकस- हाराज की समान को सुछती दूसराहै भाव इनसम येई हैं ३७ ३४४॥
०। होनलगींवरभौवरीदुलहिनिललितललाम | * 8 303» कक 3४० कर १५
वहिं २ मगनमोदभाँवर्पिरेंरानीतनमनबावरी । स चारबिचारकरिहोनलर्गीवरभाँवरी ३३१४५॥ -
55 ।बर ओछ भाँवरी किक वतकी कटे कप लक्षित
तथा पकजसम सा मुख र रास: ज्ह अथीत् ल- ५ लितनाम सुन्दर गौर वर्ण सवोग सुठौरबने ०० जा ७०३०० ३
शोम! दैरदे अथवा घरको भूषण कुलको भूषण सब ऐसी ललितललाम अीजानकी ऐसी दुलदिनि तथा ०३.४5 सम साँवरो मी क तंथा शशि चन्द्रपू्णे
सुन्दर रघुताथजी दूलहं इत्यादि
ताते उत्तम भाँवर होनेज्ञगी
'टी०। मुक्तादि समणिगणनकी खानि जहांहें तहां जेली रघुनाथ्रजी की निवछावरिद्दोतीहे ताहिकौन गनिसक्तादै भावेअसेरूप दोती हैं काहे ते घन जनु जुबारि जब:धानमुक्तामणी सोनाआादि- 3 ० अभि, परिप्णण है भाव सर्वत्र बियरें परे हैं पाना 22727 ९ झौर अन्न छीमी बालौके भीतर रत ते ऐसेखेतमें नहीं बिथरिसक्ते हक जुवारि यव धान बालौमें बाहरैरहतेंहें ताते खेत कटेपर बियरेपरे हैं $ काहेते मणि मुक्तादि जुवारि यव धानकों नाई परदे सोकहत कि जनक मांदिरते झावें अथात् दायज हेतु जनकजीके। संडारः मंदिर ढोषढ्ोय सद्येतरको झावत दशरथजीके आगे धरत पुनः वशिष्ठ०सुनिके देन तने जहर केशनिय पर्स लगता हक आंत त्ेशञ २ नेगलाधि लब- नेगवैके आहुतिदई देवनको संतुष्ठहोने. देवनके दिकी आहुती अस्नि्मेंकीन्दे भाँवरीकील्दे श्रीराम जानकीको बिवाहभयों तालमब अश्माविके
तथा वर कन्यावि|लबकों द् को सुं्रवेष स्वरूप वसेन मंगल्मोद तथा सुवेषादि कल गत साजहै सो.
।सरसरिताहिजगण
मघामेघदशरथभयेयाचकदादुरमोर भयेबाढ़िचलेचहुँओर १बाढ़िचलेचहुँओरशालिजनकादि
करानी। ३2232 सुंखसुंद्रपानी २ ; मोर॑दनारिमूषणपट्बस्तनय । रामलियापाक्सलुखदमधा
: मेघदशरथभये ३। १४५ ॥ टी० ।देखतसन्ते नेत्ननकोआनंद अन्तमें जीवकों कल्याणकेती ऐसा जों ऐश्वर्य गुप्तमाधुे भूषित श्रीजनकनन्दिनी रघुनन्दन को सुन्दर स्वरूप जलाको बर्षोऋतुकरि वर्णन करत तहां बी में भादवेँ अधिक तादूमें मघा जक्षत्र अधिकहोत तथा इह्ठां मघाके सेघ महाराज दशरथ भये भाव अत्यंत दान बर्षिरहे हें बर्षो में दादर मेढक तथा मोर आनेंदद्ने बोलत तथा इह्ां परिपूर्ण दानपाय याचक प्रशंसा करिरहे हें तेई दादर मोरदें अत्यंत जल » बर्षे लदीउमड़ि चलती दें तालब्रहिचलत तथा इद्दां दिज्ञगण ब्राह्मणसमूह तेई सर सरिता तालनदी नद सरीखे बाढ़िचहुओर चले समूद दानपाय चारिष दिशिकों झानंद्ितचल्ते जातेहें. ५ ब्राह्मणबाढ़ि चारिहुओर चले ,तथा शालि जनकाविक रानी अत्यन्त बर्षाभयें पर शालिधान हरित दे अत्यन्त बाढ़त तथा जनकआदि पुरके नररानी सुनयनाझावि पुरकीनारी इत्यादि सबके मनमें आनंदबढ़त तथापुरजन परिवारके जन ते सब॒कषीहें . अथीत् जनक भरुरानी घानसरीखे भरु पुर वा परिवार ज्त ते और अन्न सरीखे उत्सव लुंदर पानीपाय संबैसुखीभये ९ जो मणीवान,करतेढें सोई 22 ली के बु
है, ग् मे रित आसनकीच्र बैठारे-९ पथादूलद तथा
स्वरुूपता बरण १०५५५६०३९४५ 22%3243% रि
आनंद ं 2 वश लहकौरिको व्यापार करावती हैं इसढेतु वरकच्या विर के भीतरको जले रहें ३ । १५० # के मू०।रंमाउमोगावनल्गीलेमाठनकीनाम। धरिकपोललहकोरः है कतकरनिखवावतराम १ करनिखवाबंतरामकुलाहलमंगल-
उसागावतलगी ३॥ १४१ ॥ टा5:4 रंमालंद्मी उंमापारवती इत्यादि गारीगांवस स्लगीं अरू लदकोररुत दोउनसों ल्लहकोरः
करारनामा लिखाये भाव आपनी हलक विश वाह तब करेंगे जब दशरथ मदाराज लिखिदेयें कि तुम्हारि दी कन्याके पुत्रको राजगढी देयूँगेलो! छल' राशि लिखिदिये भावबिवाहमात्र पत्ररद्य जब कैकेयी परमेंझाई तब॒झनेक छल्लवचन कहि कैंकेबीते वहपत्र माँगिलिये पुनः जब पावस देनेलगे तब गा इसीते सचित होतादे कि छलराखि पत्रलिखें पुनः आगेदेखें कौनकोन चात्रीकरें ऐसे चतुरके आपु पुत्रहौसो आपहृकी चातुर्यता प्रसिद्े देखिपरती है काहेते किशोरी जीकी सुंदरता सुनि ऋषि यज्ञरक्षाके बढाने अकेलही बाहन रहित पैदर इहांकों दौरेआंयों भरु आपु में चेटक नाटकविद्या बहुती देखिपरती हैं काहेते किसी चेंटकबलतें सा- रीचकों उडाय समुद्रपार पठायो सोतोमला बाणको बहानाहै अरु पवन न मालूम केलाचेटक सिद्धकिहेहों कि जाकोलगाय पाषाण अहल्याको-दिव्यस्री बनाय वांको न मालूम कहांको' उड़ोय विहेडा ५ 5-- न+न्स शक हां आय ऐसावेटक लगाये ४3 लअ५+ किशोरीजी तौ अधने हैं |. 4 म् “प्राण : पुनः परशुराम ऐसे सब : क्रोधी तिनपर चेटकडारि लेतिही हथियार धरायलीन्देड ऐसे चतुर आपु
मोहन चारिड
करि उत्तम खीलिहेड पुनः जोकछ अपन 75 न
ईशा हब इत्यादि युक्त, गो कदतीहे कि जानकीजी सूधी
टी का शिशेशक नेक कप हासबिलास हास स 2०४ जो दानकेना उच्चित सीतिसे होताहे रिहू उठाये पुनः शिविका रूचिर पालकी 38 5 “2002४ दुलहिनिन
नकियोषटरसचारिप्रकारके ३.। १५४७
-ही० । बट्रस यथा मीठाखट्टा तिक्तलवण अम्लकटुइत्यादि छ'प्रकारका
उजनमें स्वाद पुनः भक्ष्य भोज्य लेहथ चोष्य तिनमें विविध झनेकमांति के भोजन बनाये यथा भद्ष्य में भेद बोंदी लड॒डू खुरंसाँ पपरी पेराक स-
मोसा मठरी गुलाबजामुनि गुल्गुल्ा खा्का बतासफ़्रेनी शंकरपालादि
हे पुनः भोज्यमें मेद यथा दालि भात॑ खिचरी त-
स्मईरोटी पूरी मालपुवा अमिरती जलेंबीआइढ़ि जे रससंहित रुखाई लिहेहोते दें पुनः लेहबमें भेद यथा दूध दही राबड़ी मलाई हलुवादि जे
अधिक रसीले पुनः चोष्यमें भेद यथा सब सालन तरकररी व्वटनी अचा- रादि इत्यादि अनेकभांतिके भोजन बत्तायके तैयारकीन्हे तेब झतानंद स-
द्वित भ्ापही जनकजी बरातको जाय भोजन करावने हेतु समाज सहित
दशरथ सहाराजको लवाय लेचले १ कोनभांति दशरथ /मैहासाज्ञ को
ज्ञवाय लैचले भर्च भरथात् झागे सुन्दर सुगंधित-जल छिरकंत पुन सु.
: हाथे पाँवड़े अथोत् सुंदरी विचित्र चांदनी बिछावत-जात'/त्तापर बलेंजप्त झेदिर पहुँचे पर पॉयघोय सणि जटित सिंहासनन परूग्रंथाबरोर्प, सबको बैठाय पुनः पनवारदे छेयोरसके भोजन पेरसनलगे 3 मुदित आतेद सन _ क्ेभोजन परसाये जब जेंवनलमगे तब तियगन बिहार के आदि गाने करनेल्गी इसभांति ६८ अर ५2०३८ यावत्रः तिनको
नगारादि हे ईशा मजा श | ते अंतर बाहेर ऐसाआनन्द ' ; 'घरकोकार्य 'छबिसोई पावस, ५2:26 तामें अनेक उत्सव: लाहै तापर सबके मनझारुढ़ 8 पुष्ट रसरीहें ताके बलते सबबराती भूलते
हैं परन्तु जब आपने घरको जानेकी राखि छाँड़तेहें इतिहिंडोरा केसीपेंग सबके
यांचकरदे तिनक शृह गजभूलत अर्थात् दानमें भृमि रहे हैं पुनः जरीजामा पाग दुशालाबि
यज़सन्योदिग्गजसहसपचासली ३। १५७॥ 0080 8 ५
+ डी० । दिग्गज पचास सहस बड़े ऊंचे पुष्ठांग द्वाधी पचासदजार तक 2:02 सजेकैसी जरकसीसाज जामें मणिमुक्तनकी फालरीलगी
सी जरकसी भूलनते गज़राजमूपे सोहत हाथिनपर- विव्यचमकदार
लें शोभा दैरहीदें ५ जरतारी भूल्ननतेभपे गज़राजसोहत तथापीठिन- परज़रकसी भमारी कर्सीहें ते केसीसोदत म्शनौपावस भँधियारी में ति- मिर झरुण इकठोर अथौत् श्यामदयाम सम्रहह्यथी तिनपर सणिमुक्तन बुक़जरकसी भूलें तथाभमारी कैसी शोभा दे रही हैं मानों पावस बषी- ऋतुकी' ' भँघियारी में तिमिर जो भंधकार तथा अरुण जो सूर्य ते दोऊ
.. एकही ठौरहें इहांहाथी अंधकार अरु जरतारी सूब हें ये दोऊ एकत्रकबहूं .. नहीं होतेहें ताते भसिद उद्लेक्षा लंकारदे २ समृहदाथीसोई स् ५. “०8 हें तरिनकी गर्जनसराखे जो हाथिन के घेटनको जो ' है सो सुरबास लो देवनकोबास जो' स्वगैल्तोक तहांत्तो शब्द
॥ल- हजार जौ दिग्गज दायज के देत जनकजी साज-
भर्थात् कमी ग
जीनपोस म्रषण तिनकरिके अलेरूत भूषितहें ६2 न
रंगके यधासबुजाइयामकेण कुम्मैत सुरंग अबलख समुद सेदली :
सुरखखाब समुद सिरगांचोधरा पचकल्याण नल निर नकुल फुलब
इंकीगरी इत्यादि झनेक बरनके पुनः झापनीवेगके
करतेहें ऐसेरंग रंगके साजेते बनिबनि तयारकीन्हे: २ ६ ५ जे साजे बनिबनि तयार मयेते केसेदें जिन््हेंदेखिसुरदय देवनकेघोड़े उच्चैःन अबादिलजाते हें इत्यादि राजाजनक जो दायजलज्यों तामें देशलाखंबर तुसी उत्तम घोड़े सज्यों ३३१५८ ह *
मू०।ढुषभदुंददशलाखलो दा टन सदर लेलितेलेलाम ५ सेहत लिलबलेे १ जनपकवाने | सौरममगमदसलय
ठी०। सचोनबेलाख महिंषी भेंसी लो मन्दराजी गुजराती 5 बरि आांदिवेश देशनकी खानि भौर भौर भांति बनावटकी न्यारी न्यारीते इयामपुछंग-ऊँची केसी शोमित होती हैं मनो इ्यामघनके लुवन' करिया बादरनके बच्चा समूह झाकाझते उतरिआय सबमही एथ्वीपर चरतेहें १
जलधार भूमिपर गिरततथा ये जो महीपर झानि सबंचरत तिनके दृधकीधार जो बेगते छूटतसों घरणी एथ्वीमें घसिज्ञात
महीकठमें मणिनकेदार पहिरे सुकुमारे शिशुधोरी उमिरिके बच्चनको दूध
प्यावतीदें २ 228४ बच्चनकों प्यावती हें ताते वैनाम निश्चय करिके थ-
धारनके विधान होतेहें झर्थात् दूधती भधिक भरू शिशु
| छुहमार पीनहीं सक्ते हें भरु भेंसी पन्द्वानी तो एक में बंच्चा पीवत
४९४ दूधधार जो छूठतसों सूमिपे गिरतरसी
बिद्याहबिसत “पसज्यो शिविकालाखबहत्तरी ३३१ १६२३० 753 तक ट्री०॥ बंहत्तरिल्लाख सिविकापालकी सजाये तिनपर जानकीजीकीदासी
संजन 22०42 क8०५+० पउकलक बज ३ बसन दे जावक ४ गरन ५४ लिंदूर ६ | मेहँदी ८ झरगज्ञा ९ बेसरिग्रादि बारहो,ूषण १० फूलहार
१२ मीसी १३ तांबुल १४ अंजन १७ चातुरी १६ इति सोरहों करिमानी कामकी तियारति पात्तकिन पर चढ़ीं १
डी० । कंचन खबित बिचित्र सवालाख पिंजर सज़्यो सोनेके सख्ता- कन करिकैरचित चित्रबिचित्र पिंजरा एकलाख पच्रीसहजारसज्योजिनमें शुक सुंवा शारिका मेना मराल हंसइत्यादि बहुत पक्षी पा 728 कुही बाज इत्यादि शुचिपवित्र मित्रदें भाव इ॒छ/पूवक कामकरते हैं $ शावे मित्रकुह्दी बाजादि जिनको आपनी रुचिते जानकीजी प्रततिपालेप्रतिदिन खान पानादि दिंवावती रहींते पक्षिन को ते सेवक हाथनर्मेलिंये जे सब जानकीजीकी सेवा करनेवाले हें २ कविकी उक्ति जे जानकीजीकी सेंवा करने वाले हैं तिनंकी-बढ़ीभारी भाग्य है काहते ज्यहिं जगस॒ज्यो संसार को उत्पन्नकियोः ऐसी जगत जननीकी सेवाकों प्राप्तभये ताते बड़ीमाग्य बालेहें तिन ज्ञानकीजीके संग ग्रह कौन बढ़ा विभव है जो सवालाख प- क्षिनके पिंजरा साजे:₹।१६३ # मृ०। ऊंट्मजाअरुश्वानको लेखागनोसिराय ।'जेप्रियसियंके नपलंख्यो नगरंबाहरेजाय १ नंगरबाहरेजाय मनहुँअम रावतिघिरी। दुंदुमिदयेसह् ठत्रअरु चमरंघनेरी २चम रघनेरीभवनपट आसनविविधविधानको . दायजद्योन
' येगने ऊंट्मजाअरूइवानको ३।१६७॥ .... / टी०॥ केठ अजाछेरी इवानकुत्ता इत्यादिको व्लेखा कीन चहीःती गने | है: 30: वीन्हे काहेते जे जीव सियके 3३.६४
| जानेकी जानकीजीको प्यारे हें तिनसबको | जाय नगरके बाहेर ठढ़िआयेगये $ जाय न
मल्लनवादि तथा डँट छेसी कुत्तावि यावत् वायजदिये सो लब ये इसकी लंख्या प्रसिद्ध नहींकदे झसेख्यहें ३३५६४॥
जद नितस्वामिहिष्यार । सदासहागिनिहोडु मल मा री रयहेआशिषादोहिंहम सुताअंकउरघारिके। मेंटिनेंटि पांयनपरे रानीसुतासँवारिक ३। १६४ ॥
दी९-। सुता पुत्री जानकीआदि तिनकोरसवारि #ईँगारकरि भ्रषणपदि- सुनंयनाभझादि रानिन करुणा वियोग दुःख़बश सीखसुनाय क्या:
लिखावन-सुनावती हें हेपुत्री पतित्रत धर्महि दृढ़धरधों पु्धारणकिदेड पुनः सहजस्वभाब्ते पतिको सेयहु भर्थात् केवल पतिनको डेइवरमानि सहजस्वमभावते सन बच क्रमते सदा सेवाममें तत्पररहेउ १ सहजस्वभाव| ते: प्रत्रिको डा के सिखावनदीन्दे पुनः आशीर्बाद कप >न आपने स्वामिनको -नित्यद्दी प्यारीहोंहु तथा सदा सुदागिनीहोह, ७2%: पति सहित तुम्हारा सुद्दाग अचलतरहे यह हमारी आशिषा आशीर्बादहे २ सुता भंक उरधारि पुत्रिनकों भँकोरामेंबेठारि माताकद्ठती हें हेपुओी यदी: भाण्मीबाव हमदेतीदें सवासुख्ी सौभागिनीरदौ-इत्याविसुता सैंकारिकै पुनः. सनी; मेंडिभेंदि पायनपरें भाव माधुर्यमें बात्सल्यरसते बारंबार भेंटतो हें तथा जबऐइवर्य बिचारतीहें तबपांयनपरताहें यहशांतरसतेहोत ३३१ ६५. ॥ मू० /जनकनयनधाराबहे सुतालियेडरलाय । सि रे
_ नही जनकमल्यागीजाय ) जनकनसागीजाय
गुणअरू मद 5 गन न
बुबर सनेहकी प्रबलताते डराय सबमागिगये यथा सब॒ले वि: | कोऊभागै त्ैसा इहां न समुझना इह्ां ऐसासमुम्कनाचा- हिये यथा सबलगत्रुकीभयते को ऊप्मबलआपनीसहायहेतुछोटेनकोटिका- च्रेहोइताहीके सहायद्देतकोऊ मद्दासबल झायगया ताकी बडी ऐश्वर्यदेखि आपनी लघु ऐदवर्य को संकोचमानि आपनी अब्लताते बिनाभयकी भयमानि संजातीभी भागे जातेहें वाकी बास सावकाश देनेहेत तथा इद्यंं मोह शत्रुकी मयते अबलजीव झापनी सहायतादित धीये धर्म ज्ञान ध्यानादि टिकायेरहा जब सियराम सनेह महा स्बलजीवंकों संहोयक आया तब याको बास सावकाश देबेहेत अबल धॉौरयादिं भागिगये तहां काम क्रोधांदिके बेगमें मनु नपरे ताको धौरयेकही तथा सत्यक्षौच तप दा- नादि जहां प्रेहोयं ताको धर्मकदी पुनःलोक सुखको तुच्छ जानना सो विरागहै तथा देह व्यवहार अलार आत्मरूप सार जानना ताको विवेक कहें तथा मेरी मुक्ति निश्वय होवे यह सुम॒क्षताहैं वासना त्याग शाम कही इंद्रियविषयते रोकना तोकोदमकही विषयतेपीठिदेना उपरामेकदी दुःख सुख समजानना तितिक्षाकही शो््र वचनमें विश्वास अंद्वामनांदि खना समाधान है इत्यादि सवज्ञानके गुणहें पुनःध्यानंकी समॉज यम नियमादि अष्टांग योगहै इत्यादि सब विदेदजी में परिपणरहें जब सियराम सनेह उरमें परिप्ृर्ण भया तब धीर्यादि नि्ंरिगये भअरू मोह दल इसीकोताबेदारभया अर्थात् पुंत्रादिकन पर अत्यंत्सनेह होना सोई मोहदे भरू ईड्वरपर भ्रत्येत सनेहद्दोना भनुराग है तहां जोःपुतरी या- . सात भावते भत्येत सनेदरहा ताही में जब.इेढवर मिला तबवही मोह या तबज्ञान ध्यानादिको अंतरमें रहने को टीरदीनही
गये ३ ध्यानाडितों निसरीगये पुनःपावन
पुनः
फर्क 32 ४2: के सुख सखिगया सुखपेकजते बचन न ऋद्ग्रो- कमल बंदद्दे जात तामेंपरि श्रम्तर नहीं कढ़्िलकत तथा
ही रिधायरबर सगलइशवर सम अ्रणामकरि करिप्रणामरघुपतिचले ३। १६६ ॥
टी० । सबभाय सहित रामरघुपाति भरतलषण शः 206:4*% ,4 शिरोसणि भरीरामचन्द्र भावउत्तमकुल् में भी परमोत्तम लिम अमलयश प्रकाश करनहारे श्रीरघुनन्दन सासुनको प्रणासकरि बिदा है बरातकोचले ताही समय सुनयनादि रानिन सुन्दर सीखसिखाय सुता पालकी चढ़ाई गर्थात् उत्तम कुलकी रीति पातिब्रत धर्म इत्यादि उत्तम सिखावनदै पुत्री जानकी आदिकन को पात्तकीनपर चढ़ाय बिदा कीन्हे तैसेही सुन्दर सिखावन देतसंतते भूपजनकजी पहुंचावनद्ेतु पांलकिन के लाथददी चले 35532 मम कह व ज2 अैल : द्वीन पुनः कश्यपादि मुनिन बल्ादि देवतन प्रमुके गुणगावनेलगे २ का गुणगाये सोड परममंगलकारीहै. पुनः पयानसमय झतिभले सुहा- हर पे ० ल्ोवा भुंडादि भत्यत भत्ते
सद्दित 23232 सौभागिनी
७ ; परमगुमभानंद ताकेविशेष्यवरें १: पत्रपतो हे 35 कल ५० पान न अल
णीदै पुनः दिव्य बसन भूषणा पुनः कौशल रु शा सेकेयी भादि 25 कम सार लि दीप दृधि दूर्वा हरदी फूलफत्त तुलसीदल् भक्षत् लिंदूर रोरी मुक्तादि मंगलपद युतआरती साजि सुदुबाणीते मेगलगीत गावती हैं २ म्रुवृबाणी
करतीढें पुनः-नर्वान चमरसोतिनकी चोके कंचन कल्तश बीपप
22००8 000०026:5%3%:४ श्आा : शिषदेहिंसनेहम ।रामभायद्शरथ - सुखद रहेंसदामुनिजोकहेड ३॥१७४२॥ - ; ४] «5 टी5। गठिबँधन कुलवेवांदि पूजन जुवांखेलावनांदि जो जो उपाय मुनिनायक वशिष्ठजीकहे सो सब व्यवहार कु्तरीति ज्ोकरीतिसबकार्य करे पुनः कंचन सोनेके धारेनर्मे माणि मुक्तादि भरिं मेरि मुदित आनंद संदित विप्रनकी दामदीन्दे 3 कंचनथार मणि मुक्ताभरि ब्राह्मणनको दीन्दे तथा जे भामिनी खीगण मंगलगावें तिनको रानी सोनैके मणिजे- डित भूषण देतीदें तेखी बिप्रादि सकल भाशिषा भाशीर्बाद सुनावतेहें सनेद्द भरि रामसनेह उरंमें परिपूर्णभरे आशीर्वाद देतेहें कि शम्भु उमा परसन रहेउ दे शिव पावती दशरथ महाराजके परिवार पर प्रसन्न रहेड सवाकल्याण किहेडकौनभांति यथापूर्व बशिष्वाईमुने कहे उद्दे तथाभाइन सहित रघुनंदन रानी पत्रोहन सहित दशरथ महाराज सदासुखद औरहू को सुखदेनहारे बनेरदें ३। १७२॥ + मूः। (22308 ली 24 /८::4 । नारंदेशारदशिषशुक ४ १ गणपतिकीअवगाहंव्यासविधिक
.. .3ढी०। वो' 22225: रे ध्याकांडझत निजमतिकी अनुहारि ॥ झानन्वको प्रबंध आदि कारणपयो- ध्याजी में उत्पन्नदोतरहत ताते दिनविनप्रति अत्येतलुख आधिकातजात भावसवा उत्सव बनारहत कबते जबते भाइन सहित रघुनाथ जी को
बिवाहकरि कोशलराय दशरथ महाराज अयोध्याजीकों आये १ जबते कोशलराय पुत्रनकोी बिवाहि पतोहन को लेके आये तबते
.. आनन््वरूप जत्त करिके भरे द्ैगये भाव सर्वश्रकी आनन्द बहरिइर को
.. चलीआई कौनभाँति ऋद्धि जो घृत द्ग्ध शक्करान्नादि समृ॒द तथा सिद्धि
.. अणिमादिक तथा संपति यथाचांदी सोना मणि मुक्ताविसमुद्द धनइत्यादि
आद्धि सिद्धि संपतिझादि नदीसमसर्वश्रतेचलीभावतीें तिनकारिके अवध
सागरभरिषूरे भयोध्यारूप समुद्र ऋद्धि सिद्धि संपति आविकनते भरि-
परिषूर्ण द्वैगया तहां समुद्र अधिक बढ़त तब बहुतदूरितक प्रवाहबोरि
अयोध्यारुप समुद्र उमगो तब॑ झानन्दरूप जल
यो ताते सप्तसागर प्रमाणलो ञ
सिंघुते
7 44492 कोमल बचनकहें कि देगोसाई भाव झापु चक्रवर्ता लोकभरेके रक्षाकरन- हारेही ताते हमारीभी रक्षाकरी इसहेतु भरतकों पठावो दंशदिवस उहां रहें तासमय कल 'उ नृपप्राहि बंशिए्ठ वा जे देशांतरी सुनिज्ञन भाये हें तिनहूंकहे कि हेनूप दशरधजी यहभये हैमलोगनकीभी यामें रक्षा है त़ाते यहकाय अवश्य कीजिये अर्थात् वेदृष्ट मुनिनके शत्रु हें तितकोमारि इस्ारीमी रक्षाक्रीजिये २ मुनिरुखते भरथात् मुनिनकी इच्छादै-कि भरत डल्न॑ज़ायँ इत्यादि बिचारि सदाराज आयसुदियों भरतको भाज्ञादिये कि ज्ञाड सोसुनि भरतजी शिरनाथ-प्रणामकरि-उठे चेल्लेकी साजसाजे इ- स्थादि नृपसों बिनयसुनायके भरतकोसंगले केकयपुत्र॑युधाजिंतूचले ३१३॥
मू०। बिदारामकेचरणधरिमरतशत्रहतभायामातुगुरूआतानइप , - हिचलेसबहिशिरनाय ३ चलेस्बाहिशिरनायसुभठसेनासेँ ५ गलीन्हे। श्रीरघृपतिपदकमलहदयमनमधकरकीन्हे एम नमधुकरपदकमलरतिसुमिरतनामसनेहमरि । घन्येमरत ३॥४॥ सूपकी भाज्ञापाय शन्नुदन वोऊभाय रघुनाधजीके चर- 5 १५ 338 या मातु गुरु जाता नूपदि इस्यादि सच्च- हे प्रथम कोशल्यादि सोतनको प्रणामकरि पुन्रः गुरु
हैं इत्यादिःजा नास्दकें प्रेम नेमकी अवखिहे ताते उर हह अत लिप लक मेल लेकी धरा पल आ शक
38८ ५ <7 3 शिप्जीको सुनाये हेनाप सबक़ेमन भायो रासति- दे पुरजन परिवार प्रजा सचिवादि सबके यही अमि- 723 कि दह्रघ आपने जीवतहीं युवराजपेद रंघुनंदसको दैवेवें तो जो
प्रह्दीधरात है तो रघुनेदर्न को राजतिलक करिदीजिये २ सबके सनको भायो पुनः सुखद भाव इंसीकारणते ज्ोकभरि सुखांपत्ै- , गो ऐसे वचन सुनि वशिष्ठ जी आनंदर्भये दो मिल्तिः कार्सकाजिनको भाज्ञाविये ते सुमंतादि तेऊ मुंदित आनंदः मनते तिलकद्देतु/ सबसाज साजनेल्नगे अरु मुनि रामभवनगये मंहाराजकी:पमआाज्ञापाय सेयस्र- बताबनेहेतु मुनिवश्िष्ठजी रघुनाथ्जीके संदिरकोग्ये-३।६॥८ 5८ 7
रावण गो अब ओपपनोय जी बनकों जायँंगेततबतो रावेणकों ७०804 0० 'हरेंगे अरू जो राज्याभिषेकद्दैगयां तो निश्चयकरिके हमार 9 निदचय अंकाज भयो जानि देवनसुमिरतकरि शारदाकों बुज्लाई तासों प्राथेनाकरतेदें हेमातु सोउपाय करह जामें रामविपिन रघुनाथजी बनको अप : ९ बुधि बलयेबुद्धिकरिवल कार कैसायाकारिक ऐसाप्रभावप्रकाशकरों
गि भ्ीरबुत्नाथजीबनकेाजाहिं तबहसा- करि चरणगर्ें शारदा के प्रॉयपकरत
कप #७##जानिब नह ल् ६-०३ उप |
हे कैरी जो सुम्तारि ही विपति के हेतु यह हु पदसब उप
तथा जबतक भरत इह्दारदे तबतक उनके लेज अतापते पुररूप
रही. भब परदेश जातेते का 'तेजतप सब गयो सोई मनभावत समय पाय तुम्हारी बिपति को बीज सा बोयो सो अब अंकुरभया चारि- दिवत गत बीतेपर देखियो कैसी बिपति होती है ३। 3 8. 43: कक सूरत
सत्युमानिरानीकहे कहुसखिमोहिंउपाव। 24577: गये नभये सोसबयहेप्रभाव 3-सोसबयहेप्रभाव ॥ 5 -बजानों। "२ आपन मानिनकछुकहिय नृपमंलीनउघरनचहे । हितूजगतमेरी तुही सत्यमानिरानीकहे ३। १५॥ है लो > ली० | मेयरा के बचन सत्यमानि रानीकैकेयी कद्दती हें हे सर बंचने की उपाये कह विपतिहोना तो में जानिचुकी काहेते भरत सहा- यक॑ ते तो ननेउरे को चेल्े गये पुनः मेरी दाहिनि आंखि मुजफरकनादि * बहुत अंसगुन भये सो सब यही को प्रभाव है जो होनहार है $ सब उत्पात होनहार के प्रभावते द्वोते हें नातरु में किसी को कंछु बिगारा नहीं कादेते संबं सुहूद सम सब्र रानिन को में मित्र की समान जा- नती रहों कॉनभांति सवतिभाव को ईर्षा सहज बैर छांडि मित्रता पूर्वक पुत्र पति भाषन मांगों झापवे ऐसे सब 523 मानती रहीं ४4 मरदाराज बथा हमारे पतिहें तथा संबरानिनके हैँ इत्यादि में' भेद नहीं करती रही २ सब छैँडाय केवेल' आपने पति मानि कबेहूँ नकहियें अथोत् भपना परारी फोरतोरकी बात कबहूं नहींकद्दा भाव जो मंदाराज हसारे वा राजदेना लिखिदिये रहें त्यहिं बलते हमारा पद सब रा* निनते ऊँचामयारहैं तेहिबलते केवल आापना पतिमानि दमकों सबंध: ता मांगना योग्यरहै ताकोहम कबहूँ नाम नहीं लिया न ४ 22202: 'नेप उरमलीन
मॉतिदंहि कहिसुखायरानीबदन ३।१६ ॥ ...
'टी०। रानिवेदन सुखायकहि शोकते मुख रुखाकरि जबरानीकेकेयीने अधीरवचनकहे तब मंधराबोली मन मलीन जनिकरसि हे महारानीजी मनमें उदासीनतानलाबों तुम्हारीविपति मिंटनेकीसहजही उपायहे का- हेते तेरे दै वर नृपचढें भथीत् देवासुर सेग्राममें देवनकी-सहायताहेत से- बरनामे दैत्य ते युद्धकरि दशरबजी वायल है सूर्ज्छितभये तहां तुम साहस करि मद्ाराजको रथभगाय बचाई लिया जब सावधानभये तब तुसको . बैबरदान देनेको कद्दे सो थातीदै हेपरबीन परमचतुर सोई- वरदान झब मांगिलेदि १ कैसी प्रबनिता चातुरीके साथ मांगिलेदि देखिद॒ढ़ वचन न डोलें अधात् जबरामसपथ सद्दित त्रिवांचकबोलें इत्यादि सत्यन्नतरद्पुर्ट देखि तब मैंगना जामें पूरवेकढ़े वचननफो बदालि न सकें तबक्या सांगना रास बिपिन बनबास करें तथा सुत आपने पुत्र भरत को राज्य इत्यादि सत्यकरि नृपलन बोले भर्थात् मद्ाराजको सत्यत्नत इृढ़कराय तबतुम भी सत्यहीवचन बोलना भावकैसह् समुभ्कावें परन्तु आपने बचनकीहठ न
5 नातर प्रयोजनकछु भी न हायगो अरुअपयशी है जाउगी २ भरत तथा चौद॒ह वर्ष रामको बनब्ास मांगना काहेते बारह बर्ष तक राज्यको दावा रहता है चौदहबर्पमें सोभी न रहेगो भरू इ॒हां मंत्री सेनप प्रज्ञा इत्यादिभी भरतकेसम्मतर्मे दैजायेंगे इसदेतु जबरामबिप्रिन बनको जाय हैं घरू भरत भूपराजा-है सदनपरमें 34०7/4734%:5- ४४० बल्ले जाको जेसा चढ्ो तैसादी वुखसुखदेड, इसीमांति सबतिको हूवय
अधात् स्वेक़र क्रोधितरुपते मानो. सुत्युभाई २ किसकी बग 243 ४ हर मरण की दशा बनाई इंसदिशा ते निरचय बज्ाह़ै-कलक्षणकी मयी घरणि भूमिका बनी है सोभागिज्नी -सहजही-सिंदर बेसरि/चूरी प्रतिकी गाय क्षाणपर्ती हे ज्ञो घ॒बाके लक्षण हैं तिनमयी म॒मिका बनिबैठी कादेते देविकुरीति लिख पअर्थात्त् संधरा दासीडे स्वामी कैसा सिखावनदिया तिते बाहिर ताते कुरीतिके वचनहें ताते वाके वचनकी पुनः पतिते विरोध करावत्ती है ताते अलद्दित मानि
उचित लंगत्यागि लती ज़ञानक्वीरूपधारि न शत एरएना | जगमें क््यहिको की रवाशाभवात 'परवक्वधिकी तथा पंवन काहिनहिं डंगायोःभथ ४
ते नर पशु पक्षी ठुण ह॒क्षादि सब डोलिजाते हैं तथा देखरुज वियोगें
: द्वानि वरिद्रतादिन्वखपरे पर को दुखीदीन पौरुषहीन नहीं दैजाताहे १ : यथा दुखपरेपर कोनहीं दुखीदौन होताहैः तथा मोह जीवकी भज्ञानता' पुतः सदजाति विद्या महत्त्व धनावि पाय चितउन्नतकर ना इति मोहंमंद _ क्यदितहिं बाध्यो कोनहीं मायाफ॑वर्मे फँस्थो पुनः इंद्रीदारा विषयनंकी अत्यंत प्यास इति हृष्णारूप ज्वर क्यहिनहिं जास्घों भाव विषये आशा कौनजीव नहीं तप्तरहताहै २ पुनः कामदेवने क्यहिकोशर बाण नहींसाध्यों भाव सुंदर 24 02200: कोनहीं कामवश है जातांदे तथा क्रोधको दंललेना यथा मनुस्मृतो ॥ पेशन्यं या। मं । वाग्दण्डंभंचपारु
* ष्यक्रोधजोपरियणोष्टकः ॥ इत्याव्रि काहिनलाध्यो किसकोनहीं स्वाधीनक रि क्षियो तथा तरुणी तरत्त युवावस्थाकी ख््री चंचल क्यहिनहीं छल्यो किसे
: को ज्ञान नहीं नष्ट करिदियो तथा चिंता व्यालिनि अथौत् रॉजाको कोप' शब्नुकीस्॒य कार्यादि किली वस्तुकीहानि- प्रिय वियोग वरिद्वता इत्याविमें भव सद्दित सुप्रि बनीरदना चित बिंतारुप्र सर्पिनि किसको महीं खाय।*
ग़ावि यथासव निदचय:द्वोतेहें तथा यह कर्म सबलहे ताके बशते जीव'
. क्यान्रहीं कारिडारता दे ३३3 ८व ५: 97:/ « 55 5 + ४ 3फ।छ एक + अवधपुरीअमरावतीबाजजेंबिपुललघाव। सवकेउरआनंद अतिरामतिलकसतिभाव १ रामतिलकंसतिमावसांम
साजिनृपवशरध महाराज जब साँकसमय-पायो ४ चलिआयो २ जबमहाराज केकंयाके मंदिरको झाये तहां दासिनेते रिसके सबनसुने भाव कैकेयी कोपमवनमें गई यद सुनतद्दी बदन पीतमयछाब- ती भय: जो डर सो सवागमें छायगया तातेमुख पेरप रि गेया भावकामकी वेगते स्वरीकी रिस न सहिसके अरू महाराज कैसे हैं अवंधनाथ ६ *५३ सरिसमाव इन्द्रकी तुल्य बल तेज प्रतापवंत दें तथा सब शोमा युत भ्रयोध्या अमरावतीक तुल्य है ३३१९॥ “77 हर
० ।/सोदशरथकैम्पहिहियेकामप्रतापबलीन । जाकीबशत्रय हि भनप पः
चितअव्रेखहुकामबलतीनिलोकमेदितकिये ।
: ताकोशरनृपउरगड़्योसोदशरथकम्पतहिये ३ । २८ ॥ टी० । जे. ऐश्वर्यते बल प्रत्ताप बीरताकरिके इंद्रकी लुज्वर्हीत दान रथ स्त्रीकी रिससुनि हियेते कम्पहि हूदयमें अत्यंत डरसानि सवोग कांपि उठा ऐसा कामदेवको प्रताप बलीन बत्तवानहै कादेते कामकों अलापब लीन जानिये कि त्रयलोकमह्द जाकेबशद्दे क्यहि नहीं अनर्थकीन अथीत् तीनिडूं/लोकनमें सुर मुनि नर नायादि को ऐसा धीर्यबंत्र समय हैःजो। अनुचितबात नहीं करि डारा १ क्येहि नहीं अनर्थकीन
करिदिये तथा शंभु भंगवोनेकों मोहनीरूप । रनेको धाये बीजपतितंडेगया पुनः राजा ययाति कामबशते पुत्रसों युवा- वस्थामांग्रे।इस्यादिको बिचारकरो २ इत्पादि चितगवरेखों भ्राव वितरूप भीतिपर इन चरित्रनको लिखिराखों काठेते कामदल कामदेवकी सेना यावत् विषयंव्यापारहै सो तीनिहूंलोक बालिनको भेढ़िताकियो कामबा ण सबके उरमें घावकीन्दें हैःताको शर नृपउरगडेयो ताही कामदेव को बाण मंद्वाराजोके उरमेंगडा सोईकारणते दश्रथ कांपतेहें ३३२०३
।देखिजायरानीविकलभूमिशयनदनदीन । पटपुरानसखे _ आधरनयनअरुणरैंगपीन $ नयनअरुणरँगपीनमनहुँदु : देशाअंनेसी।विपतिनारिकेरूपकुमतिजप्तित्रकटतितेसी २
५ प्रकटतिवचनबदनमहँकुमतिसाजधरिछलकुथल। भूपसभ «5 यपैठेभवन देखिजायरानीविकल ३३ २१ ॥ 5 _टी०॥ दशरथ महाराज मंदिरमेंजाय देखा रानी कैकेयी बिकल म्र॒मि मेंशयन भमिमेंपरी दीन दखितकी ऐसीवशा तनमेंकिद्दे कौनभांति पटपुरा नेपपहिरे अंधर-ओठ सूखिगये हें पीनरंग झरुणनयन अर्थात् क्रोधते पु ल्लज्ाप्नी नेत्नमें है. १ केसे भत्यंत नेत्र लालि केंमानई नहुं अनेसीन कारी व वुल खा, शआ अल कक न्नारि 2-2 अदा प दि. पतिमरिज। ने प्रती है. तासमय कीन्हेदे आ्थात-प्रतिके जीवतदी तनमें बिबवाकी दशा प्रकटकरिलिया २
>टी ०१ महाराज कादेते-अये धर्म कार ४०3०4: नमन | प्रसन्नतापूर्वक वात्तो करु स्वाधीन पतिकाको रिसानेते क्या अधिकंलाभ है 3 पुनःजिस सनेहते में तोको कामादि चारिहु फल दैसक्ताहों तताकी तोकोप्रतीति भी सदाईहै भावमेरी झनुकूलता सदाएकरस तोपरहैं सो हू भल्ती भांतिते जानततीहै पुनः तेरेही सुखकेदेतु रघुनन्दनके राजतिव्तक हेतु घरी शुभ मुदूसे शोधाईं सोकाल्ह बनीहे भावजों तू. कल मोसों नःकहे न पूछे छलते राज्य देतेहें स्रो नहीं ६४४५४ के: हेत अर्थात् पूर्व अनेकबार तू कहिचुकी है कि रघुनंदनको करि देउ-ताही झनुकूलमें अबहींधरी शोधाई है झब तोसों पा रिलानीहै सो या समय रिसानो तेरेयोग्य नहींदे २ कद्ठिते या सर रिसानो उचित नहींदे कि जब रघुनेदनके तिलकद्देतु में गुभपरी शोधाई 3०५० अब: अयोध्याबासी सब लीक ४5 ०० इज्छा इत्यादि समुभ्काय प्रबोधकरि नृप्रपाणि गहि दशरथ मदाराज हाथ पकरि केकेयी सों कहतेदें हेश्रिये- 35 2 (रण: क्रोष कियो ३३२२॥- -
हि
.._महाराजनहीं जानतेहें $ महाराजतों शुद्ध कोमल हृदय सबको मित्र जानतेंदें तिनकी कौन गनतीदे नारिचरितके भावनको जॉननेदारे बिधि हू नहींदें भाव खिनकी छल चातुरी ब्रह्नौ नहीं जानि: सक्तेहें' लोई छत्त 'कैकेयी बोली कि हमारी थांती दैबरदेहुं भोर तुम्हारे सब इमतजे भथीत् देवालुर संग्राममें जो दे बरदांन देतेरहो सो 'हमधाती शाखा सोती आज हमकोदेहु भौर जन्मभरेके दिये यावत् शक बंचनहें तिनसबंको हँस छोडिदियाँ इन बर्चननर्म जो छल चातुरी है सोतोमदा- राज सम॒भे नहीं भरु ज्ञो सहज भावारषहै घोईसमुभि प्रसन्नदेगये क्या झौरतों सब बचन सामान्य हें परंतु ब्याहँके पूर्जो लिखि वियारहे कि केकेयाके पुत्रको राज्य देयेंगे ताके साक्षी बढ्िप्ः अरू गगौ- चार्य ताते वह बचन बडा सबलरहा सो तो छांडेन देतीदेंतों रामराज्य की बाधक नहींहि तौं भोर दोबरदानचहै सो मांगिलेड्गी तो कछु हानि नहीं है इति समुक्ति महाराज प्रसन्नरदे अरु यार्मे केकेयीनें क्या छल कि जो प्वेकरारपत्रकों बचन में छांडि न देंजँगीः तो मेरी दिशिते महाराज अरोक न होईँगे तो था समय बरदान देनेसाफ न हों- ईँगे भरु जो ९8675 :40%:3/4९४ /९०२४९४ ३८8३५ वेबेंती थ शघुनेदनवनको नं जाईंगे इस च। पूँजे सब दावाल्यारगें बरदान मांगना पुष्टराखे ९ लोई कद्दत तजे तुम्हारे दान्यता कल बैजों तुममें हवा छाल को शहरल्पाता बी जा बे करन की
| कहिरा का अब कम भावकदहौकि राम शपथ है. हम देहेंगे 577:7220/ 2: में
८ तब 'काहे केहिसे बंचन फिरि नठरे बदलि न
'ठी०। स॒त्य शपथ लखि असंगलमल बचन कहिचिली जब महाराज कहे कि राम शपथ मोकोहै जो मांगि हे सोई बेडैंगो इत्यादि शपंथ सत्य देखि भाव न बचन टरेंगे ऐसा बिचारि अमेंगलमंल अनवे २४५३० जर ऐसे भयंकर 603 कही & एकबर
अनुकूल प्रसन्नता प्वैक राज 27330 ० अनुकूलदे भरतको ०४ 4#व देसाई दूसरौबरमांगतहों विशेषि अत्यंतउदासी- न बेपते चौदहबष राम बनवासमेंरहें २ पुनः दृढ़ता यापर ऐसीवे कि: नाईकाल्हिही रामबनकोजाहिं तबतो सबैबात अत्यंतभलीएे झरु 4२० नकरौगे तौ मोर्मरण भथात् जो मेंमांगिचुक़ी लोनभया तो केवल बेस्वार्य ह॒था अपयशीद्रे कौनसुख लोककों देखावोंगी ताते आपनेदाद्याथ झरा- यनेप्राण घातकरोंगी तामें भापनोभी अयदा विचारिये अथीत् बचनवैके पुनः न देना यह असत्य पुनः मेरीहत्या इत्यादि आपदूको अयश होइगो इत्यादि सुलिसपतिसत्मरिल्ली बन चली ३। २४॥. मृ० सुनिमृपतिउरआअतिदल्यों बजह्दंयजनुलाग । मुखसुखान ससनसेजल न दरलहोचन । रोक १ प्राणविकलभयमा गमूंदिराखेडठलोचन | शोकदाहउरदहत कहतकछुबनत
५ [२ बनतनशोचनमुखवबचनमनहुग्रेतकर्मनिडल्यो। / 5 पुनतशीशव्याकुलशिथिलसुनिभूपतिउरअतिदल्यो ३२५ :: ढी9॥:सुनि भषति डर अतिदल्यो कैकेयीके कराल बचन : महाराज दृशरथको उर अत्यंत करिक्ष घायेलभयो कौनभांति जनु बज़लाग ऐसी व्यथा छातीपरभई ताते 'मु्ब सुखायगया र ३८2: -झांसु जल भरिययों भ्राण बिकल ४ बोऊ अयशकीसय
कर्मनिछल्यों अतिपर्वक हु पूजादि करतेमें कछु क्रिया बार्तादि चकातों
तर प्राणघातक वंडदेनेलंगा तथा केकेयी में प्रीतिकरिं महाराज त्ताप करते हैं ताते शियिल ७4३३६५3७००५ ३ शिरघुनत सड़पीठतदें काढेते कैकेयीके बचनसुनि मूपउर ३) २५॥
म०। मयेबिकलसनिनुपकहा बचनलगेजिमिवान। सत्यसंधता अनकिये कहयोदेनवरदान ३ कहयोदेनंबरदान बचनकि
थी कहत हे महाराज मेरे बचन यथा बाण-गापुकेलगेतो मेरे'बंचन सात काहेते बिकल भये याको कारण कहो पूर्व मनमें सत्यसंधता किये बेरदात देने कहो भथौत् हम सत्यसंधहें जो कहो लोईकरी ऐसे: सत्यवादी मनतेबने मोको बरदान देनेंको-कहय्रो 3 ज्लो पीछे दुख होनारदेतो जब देने को कहो तब. किनकादे नहीं सभारे बचतकद्यो
बेचनमात्र उदारबने रहयो देनेके समय 5.२) बिचारि लिहथो कादेते कौशल्यासुत सुबन कि पुत्र! 28 तथा मेरे उत्पन्नभयेते भरत तुम्हारे पुत्र नहींहें भाव क्या कोौशल्या दी ब्याहीढें में दासीढ़ों वा कोग़ल्यामें पुत्र-तुमसों भया में किसी ज्ञो कला करतेहीं २२ कादेतेज्मनावर
ह््ड्लु दूसरा बर जो और कछुमांगु तो भवधपुरमें ि 53% «5०५ सोकबहू किसीमांतिखणिडत न ट $ राज्यको तिलक करिवेडे तो तामेंदागु नहींलागैगो भावदूसरा: कर नहीं करिसक्तादे तो रामको काहेते बसको पठावती है कादेते सबसरा रास्र साधुदें ताहिकौन अपराधलाग अथोत प्रजा पुरजन मंत्री मिः प्रशंसा करतेदें कि रघुतन्दन परमसाधुदे तिनतेरो क्या, अपर बनको पठावती है झरू बिनअपराध साधुकों दणइदेना उचित भ्रयोध्याकी नारी तथा तरसबै.लराहतरद्े कि राम हाई द्दे | तक तोहूसराहतरदी अंबपचय छातीवद्त -भाव अन्र हि उबलत्म मेरीछाती जरीजात तोको ऐसे बचन कहना बड़ाआरचर्य नर त्लायककी नहींद्दे ताते आपनीयोग्य समुझ्ति बिचारि कार्यकरू
अयश न होइ इत्यादि नेत्रउघारे महाराज न
'चहे सूर्यबंशभररि | पुरकाल-हवालेहोय भर्धात् मेरे महापापते सूब्यबंश भरि नाशद्दोय पर जगह पापलागे जाके प्रभावते अवधपुस्भरि काल के
य सब पुरजन मरिजायेँ पुनः कलह जो परस्पर प्रत्यन्त बिरोध .. के व्यापार पुनः छत्त चातुरी ते कार्य सांधन जो कपटठ इत्यादि अधम्मे- अनीतिरूप भागि लागेते अवनि ४थ्वीचहै पताले भागिजाय २ झवनि * इहाघटे खणिडित परे प्रथवा इहांते भागि एथ्वी पातालमें घंटेजाय स्थित 4 रवि शशि उलतीगति रेगहिं घ्ात् चहें सूय्य अर चन्द्रमालौटि लें पुनः विधि हरि हर आपुदहिकदें भयात् मेरेंहीबचनद्वारा लोकमें उत्पत्ति प्रलयहोतें देखि लोकसाधक ब्रह्मा बिष्णु मद्देश ३८ * हुँ झा पुडड मोसोकहें कि रघुनन्दन को बनका न पढो तबदूं मेरेबचन न दरगे यामें सरस्वती उतक्तिहैंयथा ॥ चौ ० ॥ कप सो ।करैमन्यया भलनिं कोई ॥ भावयद सबकाये रामइच्छाते होता है ताको मेटनेवाला कौन है £ कैफेयीके बचन में घुनियद है कि केवल आपुकं दुखहोनेते त्रैजञोक महादुख छूटता हैं सोऊबात धर्मवन्तन करनाउवचिंत है ताके बचन न टरेंगे ३।१८ यनेटबरपफन ही मू०।अनलचंदवरपेकबहूँ शीतलसूरजहोय । शेषतजेधरनीध रन समुद्बिनाजलजोय १ समुदबिनाजलजोय शंभुशिर चंद्रश्नजारे । तिमिरदृहेरविरूप ढडकरदंडहिडारे २. दंड हिविधिजगर॒ष्टिसब नारायणमिटिजाहिंकहुं । येनवचन नरपतिटरें अमल पंत पल झध्रध्या < टी०। पुनः कबतक मेरे बचन न सो सुनिये चन्दकबहुंभनल बंप भरधीत जो सदाशीतल अम्रृत वर्षतादे सोऊचंद्रमा चदे कबढूं उष्णदै अग्नियर्ष 3६ जो सदाउष्णदै सो सर चहै कब॒ूं: कब जो एथ्वी ताको 36 22 तजे भ्रम शीश्षते डारिदेवें पुनः जो ला जलते परिपूण रहता समुद्र चदे कबहूं बिनलल जोय वेखिपरे ३ यथा -समुत्र:सूख। देखिपरे
तथा चन्द्र शम्मु > (थम
चेद्रंसा झर्निरूप दे चदै कबहूं शिवके शीशको भ्रकर्षक्रि जरायदंने रबिसूर्य ते सदा तिमिर अन्धकार को नाशकरते हें सो तिमिर च रा ) रबिरूप को दहै भस्सकरिदेवे तथा छुद्धकर संसार को बढ़ावतेवाले ते चदें दरडहि डारै संसारपर दणड़ करनेलागें २ सबसृष्ठि को जगमें रह कर्त्ती विधि जोब्रह्मा ते चहें संसारपर दरंड करहिं पुनः जे लंदा अखण॒इ्ह़ें सोऊ नारायण चंहें कबहुं मिटिजायेँ इत्यादिक कबहूं चन्द्र अन्त ब्वे परन्तु दे नूपति ये मेरे बचन न टरिंहें इति केकेयी हढ़कहा
मूं०। 222535:4/230/4%%84:* रलागोतोहिंपिशाच । 8230: म् ड्ैशिरसाँच १ तवशिररा।
बः ् ! नृपहोवहिंभारी । तुहिकलंकदुखमोरमिटहिकबदुँकनहिंना री २ नारीकरिचितचाहिकेबचनमोरजियजानिफुर । राम भूषसेवकअनुजराज्यनचाहँभरतपुर ३। ३० ॥ - दब टी० । भरतपुरकी राज्य न चढें मंद्वाराज केकेयी प्रतिकदत रे ब् भरत तौ अवधपुर की राज्य होना चाहते नहीं यह तोहि पिशाचलगों दे भाव तेरामी ऐसा कुटिल हठी स्वभाव नहींरहै सो जो (20072 सोतेरे कोई भतलगा दै ताकी बशहे काहेते मोरिसृत्युलाँच शिरचढ़ि: मुख बचन बोलत मेरी म॒॒त्यु सत्यही तेरे सीशपर चढ़ी बैठी है सोई तेरे मुखद्दारा येबचन बोलत दै भाव मेरा काल तोसों सब कद्दांय रहा है 3 मेराकाल् तेरे शिरपर चढ़िसत्यदी मेरेप्राण लेइगों पुनः 8 नृप होवदिं मेरे मरेपीछे रघुनंदन महामंडलेश्वर राजा है हें परंतु देरीनार तोहिकलंक प्रुमोरदुख येदोक कबहूँनहीं मिदिह्दें २ हेनारी मोर ब जियफुरजानि पुनःचितचाहिके करे भर्ात् जोमें 26: सोई ० ६३५०४॥ है बचन १33५५ पॉछे आए ४०९ || भा यश अयश पुनः रामभूप अनुज लेवंक सरेपाछे रघुनेदन राजाहेंढें भरतादि 2220 ०अन सेवकव्ने-रहि हें काढेते मरततो पुरकी राज्यचाहते नहींतो केसे भौर दैलक्ताहै ३। ३०॥ मू० । बसीअवधनुपरामहँयहजानतसबकीयः । मोरमरणभोभा
०3
रह है. अं अवधबसी यहसबकोय जानत केकेयीप्रति सदाराज-'
तू उजारे वेती है परंतु अयोध्यापुर 30 कार
प्रजादि सबैकोऊ यहवात जानतेदें कि पुरके राजामी रघुनंदने हें अर्थात् 0338] अनुकूलब॒नौको जायँगे तो राज्याभिषेक तो मे ि
| 2 नंदनकी धाज्ञातेचहं सो भाय राजकाजकरै'
बैंकों मानेंगे परंतु देभामिनि कोपवंत्ती मोर मरंणंभों तोते न यहसुख ल्रूपों नंसोय नकार दौष देहरी न्याय है अवात रंघुनेंदन बनगये त्तौ मेरा मरण निदचयभयाः ताते यथा यह लुख न देखने पाग्रो तथाबनतेः लोटि आये पर जब रघुनंद्नक़ो राज्यानिषेक होइगो सोऊन देखडँँगो 3 यथा
हे यहराम राज्याभिषेक लुख न देखनपायों तथा जबे राज्य बलकहो इंगो सोऊ न देखोंगो परंतु दें भामिनि 2 मेराबचन सत्यकरि न्ौवते जान्यसु क्या स॒त्य जान्यस मीनविनु बारिजियै भर्यात् बिनाजल' मछरी चहै जिये परेतु रामबिनु में यामिनि रातिभरि न जीवत रहिह्लों २ जियों न यामिनि रातिभरि न ज॑वत रहिहों कदाविंत रातिभरि राहि जाउँ तो दिनभये पर जीवन ह॒थाहै ताते परिणाम अंतमें निउचय मरण जानिले तातें त् अभागिनी तनलियो अथीत् रपुनंदनकों बनपठे कलंकी भई राम विरोधी जानि भरतों तेरामुख न देखेंगे अरू मोकों मार्रेवि-
8३५;
कर राजा हैं नैंहें ३ । ३१ ॥:
पन लेइगी इत्यांदि इसकुलमें तू अभागी तनुलियों मर अयोध्या पुन: मू ० राम्रामकहिनूपगिस्योकुमतिनमानीबात। झवधवधावञ नन््दंबड़नींदनलागीरात १ नींदनलागीरातकाल्हिशुभघरी
रानीके प्रेरणाते महाराज कछु अमेगल:आज्ञा न देदेवें को मनोरथ देखेंगे तौराज्याभिषेक करिलियेंगे रानी: स्पा
विचारते लोटे जाय है नंदन' को लवाय लेके पुनः मंदिर को आये: देखें चपंदेशरथ जी सृमिये गिरेपरे हें राम राम कहे रहेंहें देह नहीं है ३। ३२॥
। मर इश्क मोल उत्तसलि/ हुमा । कि मोंको दोवरदान देनेको कहेरहें लो भवर्मेनेमांगा भरतको राज्य झरु चोदह
बंषेतुसको बनबास इसौते महाराजको दुखदै काहेते उधर धंमजात इधर झुम्हासा सनेह नहीं छोडिसक्ते हें जोतुम खुशीते बनको चलेजाड तौसब इख।मिटिजाव, ९ जो भारी कुटिल्तकरणी को हेतुदै सो सुनिके पुनः तन प्रसन्न-मृदुरचनाके वंचनकहे अर्थात् महाराज को दूखिल देखि ताको-तौ बुख मनमे है परंतु आपने बनजांबे में हर्ष ताते तनप्रसन्न है पुनः कोसल रचनाते वचन कहत कि हम छोटा उपदेश तामें इतनांबड़ा मद्दादुंख म- द्वोराज क्यों करतेहो इसभोॉति पिंताको उठाय रघुनंदन वचत बोलतभये
हट 258 डचित है २ को उपदेशदे सत्य शौच तप दानादिमें जोः अडी श्रप्त संकटक व्यापार हैं तिनपर आरूड़करे भ्ररू जो अऋोदहैःवर्षको बनवास इसधोरे धर्मोपदेशमें ऐसा दुखकरना घर्मवंतनको उच्चितनहीं काद्देते देखिये आपदीके वंगार्य हरिवर्द्र सचैलराज कोशदे ढारे ख्ीपुन्न आापनी देहतक बोचिंडारे, अरु प्रसन्ने बनेरहे यह धर्मवंतन की रीति है।ताते हर्ष सहित बनजानेकी आज्ञांदीजिये इति कोमल रचना बचन है ३। ३३॥ + 5] सू७।राउरचरणप्रतापते बनमृदसंगलमोहि। मुनितीरथदेवन :-। दरश सोरपमंहितहोहि १ मोरपर्महितहोहि जातद्निबिल .. मनलागे। आतुरऐहॉअवधिधरन पुनिचरनसभागे २ ध 5» शनचरनपुनिआयहों आयसुदेइयआपते । कुशलक्षेमघर आयहों राडरचरणप्रतापते ३३३७॥ >ादी९१२घुनाधजी कहंत॑ हेमनहाराज़ हर सद्त बनज्ञानेको मोकोआ- बसुददीजिग़े काहेते यामें श्रमधोरी झ्रर्आनंद सदित-लाभवड़ी है भर्वातु झापुको धर्म सेराभी -धर्स पुनः राउर झपुके चरण श्रतापते मोहिं बनें . मुद्र मानसीझानंद तथा मंगल प्रसिद्ध उत्सव अल बेर चुत 3574 7527 बास देवनके दर्शन इत्यादि मेरे हित हैं. 9 रापरमद्दित होइगो पुनः झपहू को बड़ा दुखनहीं काढेते राजकाज तो
ः | हि
माजा २ साजिसमाजप्रसन्नमुख महेमातुपदप्रेमसख, चलतव्याकुलगिरथो उत्तरकद्योनभूपमुख ३: 3-० रामसूपपॉयधरे भूफ्मुख उत्तर म कहे उन्त पदशरथ महाराजके पॉँय .
आज्ञामांगे परन्तु महाराजके मुखते उत्तरु कछु न निसरि जकेड तबमातु कैकेयी कुमतिवाली कठोर टक्यहैं ५ ५३८०. तानेकदु कुब- ००० 0लपनक् कम भाव तुमधम्ते राखाचहोतो: धस्से स्पागह ताते खिनके ऐसेविलाप करतेदें तो ये तुमको बनजानेकी न कहेंगे कुमति यातेकहे जो प्रीति बिरोध॑माने तथा 38७४७ ५०५१५. न पठवत अरू मह्ाराजके प्राणजाते हें तांहूपरें हे भनादूर ताते कुबचनहै हैक धृ 'यन्ाप ई कदत ताते कटुब' कहते झरु राजादशरथ डे हों तब रघुनाधजी प्रबोधंकरि भाषु क्योंबाधक हौतेहीं भाव में काहृभाति नटीरुकि पुन्र/शिरताय प्रणामकरि बिपिन
टी०। मातुकोशल्या रघुनन्दनकों
हैं पुनः आनन्दमय बचनकहत हेपुत्र काल्हिनूप भवधेश महाराज तुम्हारे
तिलकद्देतु सुखसाज सज्यो सो सुखन्द कितिकबार अर्थात्ज़ाको देखि सबके समूह सुखहोई सो लग्न कौनसमय में है भाव भाजु कोन समय तुम्द्वारा राज्याभिषेक होइगो १ सुखको हन्दसमूद लाभसो लोचन नेत्रन . द्वारा सबं पुरवासी लूटी सो घरी केतनीबार है, अथात् कोनवार राज्या- सिष्रेक को आनन्वकों उत्सव सब नेत्रने भरिवेखेंगें जासमय जानेकीसहि- तभूषण बसन सजि तुम सिंहासनपर आसीनहैहों तबरविद्ञत झ्ुतिछूठी श्रथीत् सौसूर्यकेसी प्रकाश तनतेप्रकटद्दे सर्वत्र फेलिजाई तासमय निर- खि सबशोसा लूटेंगे २ शतरबिय्युति वा समयमें छूटी लो अग्रोध्याभरे में भ्रकाशित रही पुनः देलालमधुर भोजनधरे हें सो न्हायखाउ बड़बार मै बड़ी देर हेचुकी भबशीघ्र स्नानकरि भोजनकरो इत्यादि मोदसहित गोंदमें भरे
माता कौशल्याजी कहती हैं ३। ३६॥ मू०।राजविपिनकोम्वहिंदयो जहांमोरबड़काज। राउरचरणप्न
०234 47% ३5-पअ &3+ “5 १ 52 अयभ28४2 ० प्रा तु मत णपणत २
[यसुकी मातृचरणाप्र' + कहरूदुदुह
करजोरिक: इ३श्छक
4 जबकौशल्योजी राजतिल्तक की धरीपूछे तापर रघुनाथजीकहंत अबतो पितांसोहिं बिपिनवन को राजदियो है जहां मुनि मिलन ववेबाल देव वशनादि मेरा भी बढ़ाकाज है भाव बनबॉस 22%
पर पुनः राउरचरण आपु के पदकमल प्रतापते सब उत्तम के 'झुसज्ञ सदित पर ज़ोटिभायदें/ 3 सांजसदित
52 2028] कप
भाप भाज्ञदीजे ३५३७॥ ० | सहमिसुखानीसनिवचन सियाधरेपगआय । द यार सवशाय १ विपिनविपतिसबगाय सुनतलक्ष्मणउदिधाये । कहिकहिविविधप्रकार लपणसि
, . यप्रभुसमुभाये २ घ22032 कफ कह प्रियसदन । -उत्तरकछुकनसियद्यो >
बचन ३॥ श८॥
टी०.॥ रघुनन्दनके बचन सुनि कोशल्याजी सहसि । प्राणघात सरीखे दुखते देह चेष्टारूवी परिगई घमे में किम कहिनसकीं ताहीसमय आय सीयपगधरी जानकीजी 25 भाव प्राणनाथके साथ जानेहेतु मोको भी आज्ञावीजे सो बिपाति सबगाय रामजानकी को बुककाई अथोत् वर्षा हिमि झातप सहन नॉगेपॉये संकट कंकर समि चलन फ़ल भोजन भ्मि शयत ब्याप्र राक्ष- साविकी भय इत्यादि बनकी सब ब्रिपाति बख जीको समुभाये भाव तुस बनको नचलौ १
गाचत्तैरहें ताही समय बनगवनको हात्त सुनतदी :
353४ -९७-४० खड़े: भये. 4००० अर
१ 2. ५.०० ०००० ३३ ३॥४१ : टी० । आपक बचनकों उत्तरंदीन्दे मोकोपाप है तंते हे प्रभु आपुके 53 प्रणनहीं करोंगी अर्थात् परमें रहने को सुख साखु इवशुर की | इत्यादि सामान्यधंम्स यावत् बचन आपुने कहे तिनेको जोमें पति- ब्रत धर्म्म वेदशांख्र प्रेमाणते उत्तरदे आपुके बचने खरंदत करिदेडें तो मोको बंडापापलॉग काहेते जिसथंम्सक बलते में प्रत्युत्तरकरों तो झापुको उत्तर देनेमात्रही ते पतिब्रत धम्में निमृ्तनाश होता हे काहेते जो खी क्रोधबश प्रोड़ताकरि पति सो भ्रत्युत्तर करती है ताही पापते निषिद्ध पशु योनिमें जन्मपावती है यथा ॥ शिवपुराणे ॥ उक्ताप्रत्युत्तरंद्यात् यानारी कक वन के धर कल कण ॥ इत्यादि “8-० प्रभु सुखपर सन्मुख में अपना प्रण नहीं प्रकट कहिसक्तीः कॉदेते जो कुछुबात पूछो ताको मीठे बचनते उत्तरदेना उवितहै अरु जो आज्ञावेड ताको मानिलेना उचित है ताते जो कहो सोई करों परन्तु हे 2९३५ समुम्ि बिचारिये अथीत् जो कुछ करिवेयोग्य होय लो विचार
करि ये कीजिये घरु जो तजो तो कहाबलाय अर्थात् जो बिचार कुछ न करो केवल सोको त्यागिके चलेजाउ तो मेराक््या अख़्त्यार है १ थ् ५ ५2३०-0५:॥/532% ४८-3३ ##९४४५ कार्यकीजिये केवल त्यांगिके न चलेजाइयें नांतरू 230 म अंथीत् पयानके साथदी आापनी देहत्यागि प्राण
५:0० २ 72202॥
सी । भर! घुनाथज्ञी.सिखावनवेते दें के ०३३
०। ओऔरघुनाथज्ञी,सिखावन
बातमानो भाव जो जानकी. नहीं मानतीहें
नको मुख्यधर्महै पुतः इनते पुरकों तथा राजकाजभी
अरू तुम सबकार्य करिसक्ते हो पुनः मेरे झाज्ञापरात बहु कहाँ सोमानो क्यामानो निकेत जो घर तामेंब॒लौ अर पिता दशरथ महाराज तथा पुरबासी जन इत्यादिको जो
ठग अल्यायकर्ता शन्रुधात इत्यादि अनेकविष्न 47 को नाशहु संसारसद्वित . राजकाज देखहु काहेते अवध हैं अरू भूष दशरथ महाराज ते ठृद्द अरु मेरे विया के नरनारीभी सबै दुखितदे काहेते ममदुख मेरे 207
योगको पश्चाताप सो संबनाशहु सबको समुफ्ताय 002] 5
>7टी७। आवसु तज्यी नहींजात 383९६ द 4० 738085
त्यागि नहींजञात जो कहौ सोई
शा ्ु पक स्वासीद्ैके भापुतो बसें बासकरों झरू कक खझुखभोगकरों अहुयद्यापि गोभानहीं परंतु आज्ञा अवः इयकीनचाहों सो देहको जहांकदों तहांजाय परंतु प्राणवायु ममबशनहीं 2 डा आज्ञानुकूल परमेरही ४ 84004 मेरे बशमें नहीं जो भाव प्राण आपदोके साथ १ प्राणतों भांपुकेसाथ:
ही जेहें देहको जंहांकदी तहांजाय परंतु यह राजकांजकी भार कापरंडार तेहों भाव यहंभार उठावबेयोग्य में नहीं हों काहेते राजकाजकों भारतों राजा नीति धर्मवत सुबुद्दी उठाइसके हें अंरु में आपुर्क चरणरजंकों से: वनवारी शिशु कुमति सेवकहों भर्थात् बांल निवुद्धी आपुकों सेंवकर्शों २ बूसरे बालक तीसरे आंपुक चरणरजकों सेवमवारों सेवक
१] ग किमिलहों नीतिपृवक धर्मकी मांग में कहृपिदों जापर भाएुड़ हैं ताहीराह भौरेन को चलाइहों ताते यहकाज मेरेंयोस्य नेंदीं है तो भवधकाज मेराकेहा अयोध्याजीमें मेरा रहनेकों क्योकाम है कछे भी
नहींतो आपु स्वामी बनकोजाड में लेवक घरमें केसेरहों ३। ४३॥|
मू० ० “० भ&+-३०:५५०४+/ज०ल७ १००७ अश्रुध
भल्ले हें भर्थात् लक्ष्मण
है गये काद्ेते प्रेमनेम सहित जो मंत्र जपयोगाभ्याल कीन्हे को फल जो बिसल भक्ति शुद्ध रामसनेह लोई- चलेगये ३। ५५॥ - ५ 2 कम 22 है मू ०। एककहतमुखचन्दसों भामिनिभावतमोहि । कलाकोशश शिशीतकरसीताकलितसजोहि लिफल जेट गम मई सीताकालितसजोहि इयामरेखाशशिमाहीं । ए तकविताही २ वरणतकविम्टगरअंककहियहस्ट्गनयनंअने दसो।तापहरतयहशशिमुखीएककह॒तमुखचंन्द्सो ३४४६॥
टी७०। ग्रामकीख्री पुरुष परस्पर बात्तीकरतमें किशोरी जीकी शोसावरणन करत यथा सखी प्रति एकसखी कहत हेभामिनि सोंहिं भावत मुखचंद सो झर्थात् सीताजीको मुख चंदकी समान सोको नीकल्ञागत काहेते शशि जो चेद्रमा सो कलाकोश प्रोडशकलाको भराख़जाता है पुनः शीत
कर शीतज़ता करने वाला है तथा कल्ितल सुंदरता सहित सीताकों जोहिदेखु भथात चंद्रमामें पोड्शकला हें तामें चौदह प्रसिद्द अरु दो गुप्त दें तथा क्िशोरीजीक मुखमे दे ओठ दे कपोल दै श्रवण दै बरुती दे भूकुटी दश ये अर साथ शीश नासिंका ठोढ़ी इति चोदह प्रासिद्ध भरू इंतावाल रसना दै गुप्तहति सबाग सुदरि सोई पोड़झों कला हें यथाचंदू सीता
शीतकर तथा किद्योरीजी को क्षमावंत शातिल स्वभाव है १ पुनः
कलितसज़ोदि जानकीजीकी सुंदरता सद्दित देखो शशि माही श्यामरेखा है अथीत् यथा चेद्रसामें इयाम चिह्न देखि परता दै तथा श्रीज। के मुखपर छूटे बारनकी लट इयाम सुभग सुंदरिद्दे तादीकों कबि ३ रेख़ाकरि बर्णते हें २ बणत कबि सृग अंककदि भथौत् चेद्रमा जन खृगांक करि बणन करते हैं भाव चन्द्रमा के भंकोरामें यह सुगनयन अनंदसो भर्थात् सरगके ऐसे याके नेत्रहें लो सदा रहंत पुन: 47703 क्
न् सा वंट्तर ताहि मुखकी समता थोग्य भौरें कछ नहीं हैं काहे ते कमल समहे अरुण सुबासित अति मृदुल॑ भयात यथा कमल भरूण लालेरंगको होत तैसेही मुख अरुण यथा कमलमें सुदरिबास अरु मृदत्त कोमलदोत तथामुखीमें सुगंध अति मृदुल है सो लियमुख अवगादि भ- मुखंपर भ्रगाधजल सम शोभामरी है तामें नेत्रनद्वारा बुद्धिते गोता
पर नौकी भाँति समुमिदेखु १ सो सियसुख झवगाहन करि नीकी भाँति निहारिदेख तो वह शीतको सुतपुत्रह अर्थात् जलपंकसहित जहाँ शीतलता होती तदांकसल उत्पन्न होताहै तथा यह सीता जो दल॒ताके ठोकरंल्तागेते 52 वे महीते उत्पन्नभईहे पुनः वादि कमलकों यश उत्तमकबरि जन करत भरु याहि सीता के मुख॒कों सुयश पुनीता सुंदर पावनयदश 'पुराण बखान करत ३ इस बिचारते कमज्ञ भरु किशोरीजीकों मुख कद पुनीत पवित्रयश है तथा श्रमरमित्र अयोत क्मलकों सनेही र रसलोभी सदा कमलको रसपान करता है तथा इहाँ रंघुनन्दन
'सीतेकोसुखदे वूसरानहीं' ४३ ४ 8] कल विलर _मलदिने मन्दपरत संपुदित द्ैजात तथा 20 ० ० एकतो लंबा प०००० ०2० 2. शबुसदाई अवीत् चेद्रमाको राहुलदा शच्ुबन। कमस्तकों दिभि पाला सदाझ्षश्रुबनादे अरु सीताके मुखको भरिश्नु कहोंनहींहेजाय कखोजहु, ढेढ़िद्हु कहों न ठहरी २ पुनः चंद्रमा कृष्णपक्ष भरि भरें बढ़त हे अर यह निशिदिन लही अर्थो दिन एकरस सदा प्रक्राशमान लो देखि: पंटतर समता देवेयोग्य कह्हि ताते सीतामुख
मुख कददो और नहीं दै ३।५८॥
०। एककहेंपुरधन्यहैमातुपितापुनिधन्य । जिनदेखेतेधन्यहैज कु हॉजातधनधन्य १ जहाँजातधनधन्य बिटपगिरिसस्सिर 77732 20077: २ बैठ हँसिबोलताचितवतधन्यहें । तञतिधन्यहें. ६ ॥ ५६ ॥......
हि लिए दक्ष गिरिपवेत सरिनदासिर तंड़ागइत्यादि जे इनकेमंगमें स्पर्शा : बिहोवें सो सब धन्यहोयँगे तथा खग पक्षी मृगादि जे इनको वेखतते धन्य 02233 पुनः जहांबसत भथवा बैठत तेतें सबथलधन्यहें २ यथाजेजे थलमेंबैठत
। त्ेति ०5 तथाजे इनकंसंगरदें वा जातों हँलिबोलें वा जाकीओर चित्तवत तें सब धन्य जामेंचलत सोपंथधन्यहे जहांबालकरें सोबनधन्यहैं भरु दम जे नेंत्रनभरि देखतीदें तेसब अत्यंतकरिके धन्य परम रतार्यभई ३५९॥ मुं०। रामलंपणसीतासहितदेखिप्रभावध्रयांग । न्हायंदानदीन्हें हिजनप्रीतिसहितअनुराग १ प्रीतिसहितअनुरागंदर्शसु
- खसबहिनपाये । दुखसुखसबकोदेतआपुऋषिआ श्रमआ,.
४७: में रे कट पक न ।ज्ञ्ा सन ३६० ॥
_ टी०। लषण जानकीसद्दित श्रीरघुनाथजाय प्रयागजौको प्रभावदेखे भाव गंगा यमुनों सरस्वती माधव अक्षयवट इत्यादि सब सबज्न समय हैं तिनको देखि माहात्म्यंकद्दि पुनः प्रीतिपृवेक स्नानकरि पनुरागसदहित
दिजन प्रयागवार ब्राह्मणको दानदीन्हे॥ भ्रीति अनुरागसद्तित रघुनाथजी के दर्शनकोलुख लंबहिनपाये अर्थात् जहां जोदेखा लोई प्रयागबासी प्रेमा- नंदक बशभया जाको वियोग ताकोद्ख जाकोसंयोग ताकोसुख इति दुख सुख सबकोदेतसेते आपु 2495-32 थजी ऋषिके झाअमको आये २ सीता लपषणसद्दित रघुनेदन भा: झाये ऐसाबचन किसीके मुखते सुनत- ही ऋषि भरद्दाज भानंद लह्वित परमानंदयायें प्रभुको प्रणामकरतें देखि आशीबाददे उरमेंज्गाय भासनवै बैठायें पुनः लषण जानकीसहिंत रघु- सैंदनैको मुनि झादरकर्ो-अथोत् प्रीतिपू्षक स्वागतपूंछि अध पा भा- चमताकंद मूल फलादि सोजनकराये ३। ६ ५ ॥ |;
2 कफ ल रिद्शैतियहफलप्रकटदिंखात । नेमप्रेमजपयोग .._.- तप २३० रथत्रत १ तीरथब्रतदुखगातआज़सबसफ
पुन आसन प्राणायाम ध्यानांदि अष्टांगयोग पंचारिन जलशयनादि तप तीथोढन चांद्रायगादि ब्त इत्यादि यावत् गात देहकी दृखबेना 9 सी
ब्रत्तादि यावत् वेहको दुखंदें आपुकी झार।धनाकीनः सो हमारे आजु सब सुफलभये अथोत् सब साधनको सुंदरफंल पायगये काहेक्ते राउर भागम लद्दत भापुके प्रावतसंते परिपूर्ण लद्दतनामप्राप्तभया क्याप्राप्या ५5२४४ परमसुखको वेनहारा भापुकोमुख सोनयननसोनिद्ारे इच्छापूर्वकदेखे २ सुखदेनद्वारा भापुको मुखेनिद्दारते परमलुखभयों पुनः राउस्परंशते भा- पुके अंगस्परतें तीथ प्रयोग परमपावनभया पुनः हे रधुनंदन तुम्हारे दशे भये ते क्षेत्रभरे में परम मंगल प्रसिद्ध उत्तव तथा मोद सबके मन से ानंदभयो ३। ६१ ॥ मू० । भोरप्रयागनहायकेरामलषणसियसाथ । चलेमनोहरमन हरनवंदिचरंणमुनिनाथ १ वंदिचरणमुनिनाथंमदनरतिं * ऋतृपतिमानो। ब्रह्मजीवकेमध्यलसतमायाढबिजानों रमा याद्बिमियदेखियों उमाशंभुगणनायके । चलेकिधौंसुरपति शचीभोरजयंतलिवायके ३। ६२ ॥ टी० । भरद्ाजक झाश्रममें रातिभरि बासकॉन््दे भोर प्रयागनहाय ब्रि- बरेणीजीमें स्वानकरिके लपण जानकीको सायलेके रघुनाथजी सुनिनाथ भरदहाजके चरणबंदि प्रणामकरि मट मगवासिनके मनहरिलेनेहेतु मनो- हर भस््येत सुंदर तीनिहूं स्वरूप छी चल्ते $ मुनिनाथर के चरण बेदि जब प्रयागते आगेचले तब रफहमें तीनिहूं स्वरूप केसे झोमितद्ोत्र म्रात्रो मदस़ अरू रति पुनः कऋतुपति हें भर्थात् तीनिदु स्वरूप सवोगिशोसा भरे कैले देखात ताकी उत्प्रे्ञाकरत कि झागे रघुनाथजी नहीं हैं इयाम कप मदन कामदेव है तथा बीचमें जानकी जी नहीं दें हेसबरण सुरुमार स्वरूप रति कामकी पल्ीहै पुनः पीछे लक्ष्मणजी नहीं हें.
.. दूसरी विद्या मायाजीवको बह्मते सम्बन्ध करावत ताते शोमित है पुनः तीसरी साया/ झाहलादिनी जो जीवके अन्तर ब्रह्मकाप्रकांरा करत ताले
.. अति शोमितदोत इत्यादि यथा अबिया बल्लजीवके बीच॑में भशोभित' हैं 'आंमाधुर्वलीलामें प्रारुत दृष्टि देखते विशेष उदासी बेषके बाचसें
खी प्रशोभितदे प्रधीत् वेपकी शोभा नहीं है पुनः ऐश्वर्यलीलामे विवेक हाछिते देखे यथा ब्रह्म जीवके बीचमें विद्या माया शोमित है्तकाततीनिहूँ स्वरूप ज्लोकोड्धार देत केले: चलेज़एत यथ(जीव भक्तिक्रे पीछे/ज्ञाग अछ भ्रक्तिजीवको लिहे ब्रह्मको मिलावने जात सो प्रसिद्ध सबको उप़देशत है हि आहला[विनी बह्म जीवक़े बीचमें अतिशोशित 00 (के [वर्य मा- 'मिश्रितल्लीतामें लनेह दृष्ठिते देखे. इहां राम साकेत जे ब्रह्मा .
प्राप्ती अगमहदी तेई प्रभु दयादशितें राजकुमार 23
सुलभ प्राप्तदोने हेतु तापस वेषत्रनावे थोरेंह्ी सनेहते सबको करने श्डि :- 3४3: प्रेमामक्ति- जीवको सहज सनेदतेः ब्रह्ममें /लगाये हें । “मध्य माया छव्रिलसल शोभादेरही है ₹ अह्यजीवके मंध्य &; हि कप न शितुत्तना पके कै ७३७६४५३-६ मायाकीभी उप्रमानहीं क “ उदार्सीकरहत पु परल्तोकेके करस्ध्राण कत्तो हें अरू राजकुमारतो लोके परे हर रसमें ग्रथेकरतकि-जीवन
बढुनॉनिहारिसप्रेममेयभयोपमंसुंखधामकों ग्ररंगनोरिनरदेखिचरितसियरामकों ३। ६३ ॥_ 'लियरामको पंचचरित सबसुखअरु मंगल पके अल ः मार्गमेंजातसते जनकनेदर्ना रघुनंदनको साथुय॑ललाहे
दिलबभांति को सुख तथा मंगलप्रसिद्द उत्सव जम देन;
हैले रामलपण लियदर्शते अर्थात् ऐश्वर्य पाई रस्परइनंका 0]
नेंदनी लपणलालतीनिढ् स्वरूपन के दर्शनपायेते चैतन्यम्न ख़ग़सुंग सुखीसुभाय अथोत् जे मद्दाअज्ञ पक्षी अरु सुगा / का भावते रामसनेही है ०5025: 4 ६28 पा]
. धनसुफल बालमीकिआश्रमगये ३। ६४ ॥ ही .._ टी०। श्रीजानकी लपण सहित रघुनाथनी वालमीकिजी के आश्रम कोगये सोदेखिमुनिनमें वरभरेप्ठ जोबालमीकिते सिलनको आगे भाये प्र- - जाम करत देखि रघुनेदन को हूदयमें लगाय भेंटे $ 2+#३००००+- न्दनकों हूंदय लगाय भेटि कुशलपूछि पुनः पजिपरिपूर्णकीन्हे पोड्शाप्र- कारप्जन करिपरिपूर्ण प्रसन्न कीन्ददे कोनभाँति आदर आसनवेय भर्थात् आसन बवैवैठारि झादरसदित अधे पाद्याचवमनादि करिफूलफल अंक्रादि भोजनदीन्हे २ केसे फलफूल भंकुराविदीन्दे अमियसम स्वादिष्ट पुष्टका- रक तिनको भोजन कराय पुनः प्रभुकी स्तुतिकरि प्रसन्न देखि मनते आनंदभये क्या जानि झानंदभये कि जपतपादि सकल साथनकी तलिद्ठि जो ज्ञान सो सफलभयो इति बाल्लमीकिके आश्रमगये ३। ६४॥ मू० । जाकेहितमनगोत्रसितसाधतसाधनधाम । मोहमदादिक .. गुणतजेअहनिशिजागतयाम १अहनिशिजागतयामजाप तपयोगबिरागे । मानसब्रह्मनिरूपरहतनिशिद्निअनुरागे २ निशिदिनअनुरागेरहैज्ञानध्यान॑मंदिरलहित । सोप्रत्य _ - क्षमरतिलखीज/केहितमनगोत्रसित ३। ६५॥ - हटी७ | जाकेदित जापरब्ह्मके प्रार्तीदित मनगोत्रसित उज्ज्वल अथीत् सब इेद्री चित बुद्धि भइंकार इत्यादि जो मनको परिवारहे ताको सितः करि अधीत्विषयमें लाभे इंद्रीमलिन होतीढें तिनकीविपयछुडाय उज्ज्व- झिकरि भंतरमें लोकिक वासना मलताको रोकि उज्ज्वल्लकरि. इति सम दर्मादिकरि सनकोगोत सितकरि साधन-धामजो समक्ष मुक्ष अर्थात् .सुक्तिकी “2 वला न अन३ ७०-34 %४+4७०० ॥ पुनः. सदा झज्ञानता त । 3 “७७३३५००५५४ ग्रथा शब्द स्पर्ी रूप रस गंध मैथुनाडि विष्रया
कोजाप तथा तपस्या पुत्तः यम नियस आसन प्रत्याहार ध्यान समाधि इति झणछंगयोग तथा विराग संसारसुख को
साधनमें लगेरदहते हें-तिन करिके मानस ब्रह्मनिरुप शुद्धमन में विज्ञान . पूर्वक बह्मविचार में निशिदिन भनुरांगेरहत रातिडदिन व्रह्म॑बिषे अचल : श्रीति राखेरहत २ निशिदिन अंनुरागेरहें कोनभांति ज्ञान ध्यान का दिरख-
: सितध्यानरूप मंदिरमें ज्ञानरूपते शोभादेतेदें जो परब्रह्म सो खखी नेत्रनभरि देखा जाकेद्देतु मन गोत्रसित उज्ज्वलकरतेंदें ३। ६५॥
मृ०। रामकह्योकरजोरिके मुनिनायकसुनिवैन। आश्रमपावन | दीजिये जहॉकरोंशुचिअयन १ जहॉकरोंशुचिअयन दिव- सकबुतहाँबिताऊँ। जानतकारणसकल कहाकहिप्रकेटज
नाऊँर भा समन कई वजनी शनि ।च- लियक्ृपाकरिदेहुमुनि ३१६६॥ * टी०। करजोरि रामकद्मो सुनिनायक बैनसुनि भझगस्त्यसो भ्रीरघुताथ जी हाथजोरि क्यो हे मुनिनायक मेरे बचन सुनिये पावन आ श्रम दी- जिये झाश्रम निवास करिवेयोग्य पावन पवित्र मूमिका बतायदीजिये जंहां शुचि भयनकरों पवित्र आश्रमरचों १शुचि अयनकरों जहाँ तहाँ कछुदिविस * बाल करि बिताऊँ पुनः सकल कारण मेरे बनआयबेको सबकारण आपु ज्ञानतेहो ताते प्रकटकरि कहा जनाऊँ अथीत् सबतो द्वाल झापुज्ञानलैही तो किस हेतु प्रसिद कहि ओरनहुको जनावों भाव आपनी ऐड्वर्य मुप्त राखा चाहतहों २ प्रकट जनाऊँ आअमन अर्थात् जोने 64.20 4 तो में नहीं जनावताहों परंतु जहाँ जददँ बास किद्देते कार्यहोनेको कारण _ सहज़दी बेधिजाय सो सो आाभसनको आपुत्ते ज़नावताहों, आपत्नाप्रयो- _ करावतहों हे
सुन्दरवनगिरिगणशसरित३।६७॥ संगजाय सुंदर गिरिगण सरित-ब॒नदीख वाल्मीकि मुतति- के शाह पिन कूटमेंज्ञाय गिरिगण समूद परत सुंदर तथा सरित मंद्ाकिनी: . नदी तथा ब॒न इत्यादि सब देखे कि परम रसणीकरहें पुनः वाल्मीकि जी: :. विज्ञकटकों साहात्म्य कहतेभये परमउत्तम जो थल्त देखि-दुख भंगड़ोहि . ऐसा परमोत्तम स्थान है जाके दर्शनमात्र ते जीवन को भव दुख नाश होत9 ज्ञाकोदेखि दुखभंगद्दोत ताते खग पक्षी सुगादिक यावत् बनचारी बनबासी दें ते सब सुखी हें पुनः तरुवर फलित विंभाग तरुद्वक्ष वरओेप्ठ ते विभाग नाम भलग झलग ठोर ठौर फलिरदे हें तथा वारि सुधा सम सुंदर नदिनमें जल अमृत सम॑ स्वादिष्ट पुष्ठ रूजदर्ता शीतल देखत में सुंदर भ्रंमल २ सुंदर जल तथा थल भृमिका भी सुंदर इत्यादि निरखि भ्रधीत् देखिलीजिये वह चित्रकूट मंगल भरित प्रसिद्ध उत्सचत परिपृण है इत्यावि मुनि, कहत दे रघुनेदन यह सुंदर बन गिरिगण पद्दार समूह सरित्न जो नढ़ी इत्यादि भापुको विहार स्थलहै ताको पावन करिये भ- ध्राँत् ब्रासकरि किंचित्काज्न विहारकीजिये ३। ६७ ॥ मू०। रामलपणआश्रमकरथो चित्रकूटसियसंग । मनहुविपित * 'बसितपकरंत रतिऋतुराजअनंग १ रतिऋतुराजअनंग ... रामलखिसुखबनचारी। भरिभरिदोनासफल भेटधरिबदने ... निहारी रबदननिहारिनिहारिसंब समगनसदनमंगलभरखों। _ विपिनभयोकामदसुखद रामलपणआ श्रमकरधो३ (६८॥ _“टी०॥ वाल्मीकि मुनिकी झ्ाज्ञानुकूल लपण जानकी संग सहित श्री |! ह ०४ चित्रकूटमें झाश्रमकरथो परणशालराचि बासकीन्हे केसे शो मिल हि हो :रति कामकी स्त्री-पुनः ऋतुपाति जो बसेत पुनः झनंग जो कामदेव इत्यादि विपित बनसे बसि तपकरतेहें अर्थात् जानकीज्ञी मानों | औरपघुनाथ जी नहीं दें मानों कामवेव्रदे लक्ष्मणजी नहीं हें'मानों ते रूपनकी उत्प्रेक्षा झरू
४,
सब परम सु मूलकन्द फलन सहित दोना भरिभरि भेटहितलाय झगे “सन्मुखखड़े सब प्रभुको बदन चन्द्रचकोरवत् निहारिरदे हें २ बदन ]
प्रसुकोमुख निद्दारि निहारिसंब कोलकिरातादि प्रेमानन्दमं मगनहें पुन सदन जो उररूप मन्दिर तामें मंगल उत्सवभरेंदें भाव ऐस। श्रोनन्द्रभये कि रघुनन्दनआाय बनमें बासनहीं किये मानों हमारे परंमें ब्रह्म।णइभरेको संगल भरिभयोधभाय ऐसे बनवासी हर्षितभये इत्यादि जबते राम लपण झाश्रम करघों लपण जानकीसद्दित श्रीरघुनाथर्जी इंद्ां पणशाल बनाय जबते बालकीन्हें तबते बिपिन जो बन सो कामद सुखद भयों: मं्नाकासना परिपूर्ण देनहारा सुखंदायकभयों ३। ६८ ॥ मूं० । अवसुमन्तअवधहिचले रामबिदाजबकीन । हयनचल हिंरघुबरबिरह सचिवभयोदुखदीन १ सचिवभयोदुखदीन शिथिलरथहॉँकिनआयो । त्रिकलबिषादनिहारि अवध* केबटपहुँचायो २ केवटशहआयोबहुरिसाँमपायअवसरभ हानि लानि बेहाल दर गनसमंत अभि टी०। श्रीरघुनाथजी चित्रकूटमें पहुँचिगये यह चरितकहि पुनः चरित कद्ठत अब जा भाँति सुमेत अयोध्याजी को चल्ते सो सुनिये जब- 6. ४3% बिदाकीन तब सुमेतअवधको चले तो परंतु हय जो घोड़ेते हांके ते नहीं चलत राम बियोग दुखभरे अशक्ति भये तथा रघुबर बिरह- दुखते सचिव दीनभयो अर्थात् रधुनंद्नके बियोग जनित बिरह दुखते सुमेतो दीन मद्दादखित पौरुष हीनभये ५ कौनभाति सचिव दुखदीन भेयो शियिल रथ हॉँकि न झायो ऐसे सब अंगंदीले परिंगये ज्ञाते रथ
हॉकत न बना इति विषाद मानसी दुखंकरिके
केव्ट भंवर्ध पहुँचायो अथोत् निंपाद राज ने
करि रे सहित सुमेत को के निकट तक पुरनिकटते सुमेत सो बिदा दे केवटगण झ्रापने शह घरू सांझ समय जामें कोक- _इति भले अवसर पाय हाने र
कहननआयोमुखबचन ब्रह्मरंध्रपधकढ़योजिय।
मसियरामसिय कहुसुमंतकहँरामसिय ३॥७० ॥
। सविवको झआगमनसुनतही नरनाह दशरधमहाराज विकलउठे पुनाबोले देसुमंत कहू रामलिया कहाँहें भाव लोटिआयें कि बनकोचले तिबताउ इतिकद्दि पुनः प्रणाम करते: देखि नृपति दशरथजी हृदयमें लगाय भेटे अरू नयनन नौरिप्रबाह करुणा प्रेम उमगा
दब रन नेत्रनसों आँसुजल जलकी प्रवाह धाराचली १ उद्ाँतें तो इख पीड़ित ओवैभये इहाँ महाराजकी द्ादेखि अधिक विह्व्भये ताते . इनकेभी नेज्ननते ऑँसु जलकी प्रवाह धाराचली अरू सचिव सुमंतसन ज॑ भायो कंठारोधनते पुषक्षर बचत न कढ़िसके ताते श्रीरघुन दन 0 नेदिनीकों संदेश कहाहुआ हाल सो मुखते कहन न पायो २जनक
दिनी रघुनंदनज़ो संदेश पिताते कहिवेको सुमंतते कहिदियेरहें सोहात्त ४. ४8 बचन सब कहन न पाये अवथैकहतही ब्रह्म रंधपथ जियकढ्यो ध्यं जो छिद्रें जो खालते ढका रहंत ताको ब्रह्नरंघ्र कही ताह्ीपव . शस्ता है खाल फोरि महाराज्ञ के प्राण निसरिगये कोनभाति जबमहा- 'हे समेत कहु रामसिया कहाँदें तापर जब सुमंतकद़े कि रेघु-
लोठे यह सुनतद्दी लपण रामसिय रामलिया ऐसा कहे प्राण
जो सहिं न जाय ऐसा देसह दुख सर्जैपुरवासिन दुखंकी कौनकहै ज्यादिक करीब्य ते नूप दशरथमरे ताते नगरबासीसबै हायहाय धुनि लायेदें राजमंदिरमें रोदने पराददे ३।७१॥
मू०। राखिभूपतनकरियतन कहवशिछसमु झाय + दूतपठाये ४ भरतपहँ आतुरचारबुलाय १ ० 22:५७ ४ रचारवुलाय भषगति अ्रकटेहुनाही । गुरूबुलाये भरत वनकीनाशिरनायतव हयगतिमारगसुनिवचन। मुनिवु का यरानीसकल राखिभूपतनकरियतन ३॥ ७२॥
टीं० । नावमें मृतक तनथरि तामेंतेल भरिदिये इत्यावि दशरथ जीको तनराखि भाव यावत्भरत झवें तावत् शरीर ऐ: इसह्वेतु यत्नतेराखि पुनः वश्िष्त जी आतुरचार बुलाय तिनसों समुझायः- कहि दूत भरत पहँ पठाये आतुरचार शीघ्रवलनेवाले चारगुप्पुरुष अथौत् हरकारा तिनको एकांत में वुलाय राजनीतिकी रीति कहि सः मुभायदीम्दे तिनदृतनको भरतजी के पहँ पासको काइमीर को पंठाये १ शीघप्रवलनेवाले हरकारनको बुलाय क्या नीतिसः 83202
कटेहुनादी भर्थात् भूपद्शरथ के मरने को हालकहूँ प्रक
डद्दौभीजाय यही कदियो कि महा भरत भर्वात्: को गुरुवशिष्त ने बुलाया है ऐसा कद्विताढिले वेगिः 2» तादिसंगले वेगिगमनेहु शीघरदी
परत गुरुसदेशभयेमरत ३७३, कश्मीर पहुँचि वकिष्ठजीको घाहासुनाये इतिगुरूवशिपको सै भ्रतभाये जब झवधतगरके नगीचप्हुँचे तब अश्रुनवेखे कोस पक इब्ानज़ो कुत्ता ख्गालज़ो स्पार उलूकजो घुघुवा ख़रजो गदहा त्यादि कुत्सितनीच प॒शुपक्षी भशुभ अमंगल वचनबोज्ञत 3 कुनीचजी व अशुभ बोलत तिनको सुनि देखिक भस्तकी मतिकी गति थितिनदीबुद्धि बिचारते उरभंतरमें थिरता न रही बुद्धि श्रमितभई काद्ेते भरत को ज्रावत सन्मुखदेसि नरनारि पुरके पुरुष स्त्री सन््मुख कोऊनहीं आवता
कोउब्नाम् कोऊदहिने चल्ेजाते दें कोऊ कुशलभी नहीं पूछताहै ताते बुडिसंभ्रमभई झंतरमें भय उत्पन्नमई २ काहेते भयउपजी झवधपुर
बस देखिके पुरजननकी टेड्ीटशि देखे ताते दुखरूप ज्वरते छातीजरति
भथात् राम रुपापात्र अवधवासीजन जे सदाहमपर भनुकूलरें तेप्रति- कूल देखिपरते हें तो याकोकारण भत्लानहीं है इसदुख तापते छातीत- प्रभई ताते पाउँ घरत सोडंगमग परत ऐसी भयसमाय गई कि जहाँ पग
भरत रहाँ नहीं परत मारग छोंडि विज्ञगपरत इसभाँतिः गुरुको सँदेश
सुनिमरतजी अवधपुरको झाये ३। ७३ ॥ पु सू०। भूषणभाजनसाजिके सुंतआगमनविचारि।लेआईकेकय
< सुतासुतआरतीउतारि १सुतआरतीउतारिमायहउम्रमते:
।। पा प 5 अप पियोनजलथलंबेटि २ अंकुरशूल
प्रसन्नदै'तौ-या में क्या कारणहै इत्यादि बुद्धिमें
भया जातेवेहकी सुधिभूलिगई मार्यते प्याले यद्यपिरहे परंतु बुर स जल्नहीं प्रियो धल्त बैठक स्थानपर बैठेरदे शंकाकरि शलपीरा-के भे5 कुर उसमें ऐसेडडे ते शुल्ते पीरा करनेल्गे कठिन पर आुंकाते त- कणा होनेलगी २ शूल के भकुर उरमें उठत बिच 872 राजिकी कुशलपूंछे भाव मद्वाराज़ के राजकाजमें संबकुशल
सुतवादक भापनेपु्रके उसमें दादताप उपजावनेवाले बचन कैकेयौबोली भूषण भार्जेन राज्यामिपेक हित पुनः साजिके भाव शीघ्रद्दी राज्यामिषे- क होवै ३।७४॥
मू०।कुशलराज्यसबकाजमें राख्योंपुत्रसुधारि। भईमंथरापरम हित दुखदूषणंसबत्रेजारि १ दुखदूषणसबंजारि राजसंबतु म्हरेजाग्यो। कंटकमेसबदूरि 2850 %28:272 अंगमसुधारीबातमें नृपसुरपुरसखसाजमें । कछुकबिगा रघोविधियहे कुशलराज्यसबकाजमें ३७७५॥ टी०।पुत्रकोवाहकरनेवाले क्याबचन कै फेयीबोली हर राज्यमें कुशल _ है पुनः तुम्दारे देतु राज्यके लबकाज में सुध।रिराख्यों है भरु संधरा तुम्दारी परमद्दितकत्तो भई तानेदुःख दूषणावि सब जारिदिया भथात् राम राज्यभये तुसकों सेवकाई करनापरता सोदुख अरु जो तौ तुमको ज्ञोग दूपण देते इत्याविकन को मंयराने युक्तिसों भस्म करि दिया १ सो ढख दूषणादि सब जारिके तुम्हारी राज्यके सब अगसों जाग्यों सहजही उवितभयो काढेते अंगमवर नृपसन माँग्यो न 20. जार्मे काहू की गस न रहै ऐसे अगमदै बरदान में महाराजते सांगिं डे ताब तुम्हासी राज्यके ब्ावत् 5288: दें तेलब दूरिभे ताते भकंठक राज्यकरीः अर्थात् कि
पाया पे > ज खनन के... तौ अधिक झानन्द 2002
४,
मू्पर पिन मरेभूपत्यहिशोच । तुमकहूँराज्य बेलासअब कीजेडॉड़िसकोच १ कीजेछॉड़िसकोचहोत
संबंविधिकोकीनो । 8559 8803 ०20 पक पुरराज्यनवी .. नोर राज्यसुनतब्याकुलगिस्थो रोदन ता
.ततातहातातकहि रामलषणसियबनगये ३। ७६ ॥
टी०। मेरे बरदानद्वारा सिय लपण सद्दित रामब्ननको गये त्यहिशोच ते भूप भवधेश मरे पुनः तुमकहँ राज्य बिलास राज्यपद को सुख यह दूसर बरदान मांग्यों ताते अबसब को सकोच छाँडि राज्यसुखकीजें १ काहेते सकोच छाँडि राज्यकीजे होत सत्र विधिको कीनों अधीत् उचित अनुचित यश अयश जो कछ कार्य जननद्वारा होता है लो बिधाता के > प्रेरणाते होता दे भथोत् जो बिधातने चाहा सो भया तामेंमेरा तुम्दारा कछु दोष नहीं जो कछ होनहाररहै सो भया पुनः मरण जियन जगरीति अर्थात् जो महारांज मरिगये ताकों भी शोच न करो काहेते जो संसास्में उपजताहै सो आायुव॑लमात्र जीवता है भन्तमें सबैमरिज्ञात इंतिलोकरीति बिचारि पितुमरणको शोचत्यागि पुरको नवीनोराज्यलहु अथौत् प्राचीन रीतिते तुमको राज्य न मिलती अब मेरेद्वारा तुमंको राज्य पावने हेतु “ब्रिधातान नवीनयूुक्ति बांधिढ़िया तातेहर्षित राज़करी २ रास बनगये तुम रॉज्यकरो इति कैकेयी के बचन सुनतद्दी मद्दादुखते व्याकुलद्दै रोदनकरि भरत गिरघो मुर्चिछितमये कौनभांति रोदनकरि यथा ताततांत हा पितामें न वेखनपायो इतिरोदनकरि भूमिपरगिरधो पुनः हायमेरेहेतु रामलपण
: सिय बनगये ऐसामें अभागी झलकद्दि झोकते मुर्चछितह्नैगये ३ (७६ ॥
_मू०।परेनकीरामुहँजस्थों “३०३०० हक ३४ ०३४ |; १ मिथ्याजन्ममोहि बाँमतृमईनका
हानिल्ञाभनहीं |
काद्देलेमेरदेलु मौगतमें तेरेमुखमें ऐसावरंमाँगत झागि नउठी तेरामुख 080० नः टुबाददी परमें विरोध तथातेरे उरकी कठोरता भथांत् रघुनेदन ऐसे उत्तम
पुत्रको बनबासदे दर्षितरदना इतितेरी कुमति कठोरता नूप न लखी मं
दाराज़ पूर्वही न परखिलिये जोतोको प्राणघातक वेडदेते सोसाधुध्वभाव
महाराज केसेजानें पुनः मरणकाल विधाता ने बुद्धि हरिलिया पुनः तो
को जो ऐसाकरना रहें तो मोदिंमिथ्या जन्मे भावमें रामतेव क ताकी
मातात रामविरोधी ऐसादहोना उचितनहींरहै अर्थात् मेरे घनकीरुचिबिता
विचारि क्िहदे तृ ऐसाझनर्थ करि अपनाको अरु मोकों टथादी कलंकी
बनायलिया ताते मोको द्थाही जन्मे तृबॉम्कादेनमई अथोत् चतुर्धाश
पायसभाग तू क्यों अंगीकारकिया तू भर्द्धभागमौंगती जो सदाराज इस-
कारकरते तबजो तेरेपिताको लिखा या दर्शरंथ महाराजकों लिखावशिष्ठ
ग्गाचाये की साक्षीत्यहि करारपत्रपर हठिकरि अद्दृभागमाँगती ज्ोमहा-
राज वेतेतव पंगीकार करती तबतेरेही उदरते रघुनंदन उत्पन्नहोंते भरू
पछिजाको चतुथथाश देते तारानीते में पीछे उत्पन्नदोता तबतेरे पुत्रभा-
इनमें बड़े रघुनंदन को राज्यहोती में सेवकाई करता इत्यादि तोकोपव-
ही करना रहै तबतेरे को कुछभी कलंकनद्दोता काद्देते जो प्रवमदी गंदे.
भाग महाराज तोको न देतेतो तकुछभी भागनलेती तबमहांराजेंकोभवश-
होता तोको कुछ भयशनरदै इसभॉतितू बाँलकादे नहींमई सोतौ किया
नहीं तबतो पतित्रता बनिपतिकी झ्माज्ञामाना 880६ ४०. की आचीन
रीतिधारण करि पिताको लिखांया समयपत्र खारिज $:2332६
ते मुख्यरानी कौशल्पाको सानि पूर्व बड़ाभाग देवाये झापुछोटी व ५
भागलिहे पुनः रघुनंदन को राज्याभिषेक देनेको तू अनेकबारमेरे स|
महाराज ते कहे इत्यादि छोटीबनिं छोटाभागले छोटासाईकरि : । उत्पन्न किह्दे झरुजन्मभरि पतिव्रता कुलवंती बनीरदी झरुअब मेरेसूनेसें
तऐसी कुमति कुबुद्धि धारण किया भावमेरे पृत्रकों राज्यदोबै हे ते कठोर कराल पापमयी कर्मकरि (रन शीहिप नंदूनको
24 क्िथा ह०३५2 ४ 2 वि
्ड काहेते तेरे रूपमें सन््देह होती है कि पीतमसारत नहीं डरी
प्राणप्यारे पलिको म्रारिढारतमें डरनहीं मानी अर्थात् बिधवापन लोकमें
यश पातिद्रोहते यम सॉसाति इत्यादिते मभयहै हठिकरि पतिके प्राणेल्ि
यातथा सियराम ऐलेउत्तमपुत्र पतोहू तिन्हेंबेअपराध बनकीषठये तातेस-
स्वेहहै कि तृ कद्टांकी किसप्रेतकी पिशाविनी रूपहे सो सनुष्यकी बोस भई
कहांकी पिशाचिति है मनुष्य बामभई जो त्वहिंराम भनहितलागें भाव
सेल कट बिसुखभई परन्तु अबक्या दैसंक्ताहै ताते जो
हंसि सोहाति प्ररन्तु उठुआाँखिन आगकोठीरतजि भोटजायबेठु
भार मेरेलामनेते उठिज्ञा तेरामुख देखने योग्यमहं है २ हेदुऐ मेरी भाँ.
ख़िलभागेतेठरे पुनः तेरेउदरते जन्म्यों लाते मेंभी पिंकों जिसधर्री जन्म
- भया सोभी घिक् है काहेले जो तू रामसुबन रघुनन्दन ऐसे पुत्रकों बनहिं पठाये तथा प्रीतम मारत न बरी ताके उद्रते में जन््म्यों ताते मोकों भी
है ३। ७८॥ 3 आाईदुखदायिनितिया माममंथराजाहि । भषणशभारश्ँगा
अं ह 85,320 जी ३०३६० ४४२० १
उठिवौरि पगहुमंकिके लांतताकेकूबर पर परी भ्षमिमें गिरिपरी पुनः केश धरिषर्सीदत अथीत् कहि बिलाप करनेल्गी भधीत् भल्ताकरत बुराफलमिला सो लुनि अविक क्रोधभया ताते शिरंके: बारगहि औगनर्म घसीटा कीन््हें तनय अम्ते नछाँडे २ जब बीर झत्रुहन तनक नहारे अपनी ओरते तब भरतके दयालामि तांते जाय रक्षण किया छैडायदिये इतिजब दुख दायिनी तिया मंथरा भाई तब कुलदाहिवी रघुकुल्ममें दाहकरने केंकेयीको त्यागि उठे कोशल्या पासगये ३ । ७९॥
मू० । उठतकीःशलागिरिपरी भरतदेखिंउठिदोरि । ..._ उठायके आऔगनगिरीबहोरि १ अब दीन्होंदुहुंभाई । मातुलगाईकणठ अश्रुधारानहवाई २ नहवायेचपनीरते बीरभरतधीरजघरी । बिकलभरतसमु भावती उठतकोशलागिरिपरी ३॥ ८० 20० । भरतंको आवत देखि उठिदौरीं बलद्वीन दुबल्वेह कौशल्याजी गिरिपरी पुनः उठिके चली आँगन मं भरत उठायकै प्रणाम कीन्हे तब माता रूदय में इन व दस झँगनमें पुनमगिरी लो कौर
रोइदीन्दे तब माता केठलगावे चषजो नेत्रताके नीरते
भरे अंचलपोंठतिधायके ३ । ८१॥ ् माता कौशल्या प्रापनाअचल भरतकेनयननमें लगाय आंसूपोंछत
हेसुत पुत्रतोदि बिना मेरी यहदशा भई गातदेह ऐसी भबत्त गईं जासों उठन न पैयत गिरिपरताहों भावजो तुम इदाँहोते तो यह ब॒शा नहोंने पावती १ कौनकारण गातसो उठननपैयत है रामसियचन- हिं सिवाय जनकनंदिनी सद्वित रघुनेदन बनकोचले तंब पुरबासी परि- वारज़न सबंबियोगदुखते बिकलभये झरु लपणलियलंगलगे तिनकोरघु नन्दन बहुत समुझकाये भाव घरमें रहो बनकों न चलहु २ रघुनन्दन बहुतकुछ समभकाये परन्तु दोऊ न घर में रहे तब वोऊको संगलायके रघुनेदनचत्ते इति सुनतभरतकेनेत्रआँसु जलसों पुनः भरिभये तबधायेके पुनः मांतुमंचल ते पॉछती है ३८१ ॥
मृ० | मातुजगतजन्सम्योंद्था भईनकैकयिवाँक | रामसियाञ प्रियमयों अयशमृलजगर्मांक १ अयशमूलजगर्माँम जासृहितयहगतितारी । जन्मतहत्योनमोहिंदेतिविषमाहु रघोरी २ माहुरदेमारथोजगतकुलकुठारिउपज्योयथा। न् पगतियहरघुपतिविपिनमातुजगतजन्म्योंद्था ३ ८२॥ <-टी० । हे मातु में द्थाजग्में जन्म्यों भरु कैकेयीबाँक न भई कादेते अ्भ्रिय भयो मेरे हेतु रघुनन्दन जनकनन्दिनी जाको शन्नुव्तु
है हीते जगतमाँकः भयशमूल् भर्थात् सबजगभरे में मपयशकों 4 काहेते अयशमूल जगमाँक भई जासुद्दित यहगति
के द्वितहोनेद्देतु दे मातातोरि यहदशाभई कि पुत्रबियोग
ऐसाभया कि उठतमें गिरिपरतीहो इस पश्चा-
० व 0 अकलज 2 लटक जुआ. है हुर घ। पह३ सकी 22 80 मरिजाते
आफ िकलिता तकीतर 6: ७००१3०- ५६१०७०४:%४५००० लः् कहते रह देशी व यहगति भाव रामबियोगते
८ + प्राणैत्या गे: ॥ चुनः श रु बिपिन बनकोंगये तोते हेमाता में ठयैजगमें जन्म लीन््हेँ ३।८९ ॥ मू०।सुरंगुरुद्दिनपातकपरें जोजानतयहबात । बालबालवधअ
घञयशगायगोठपुरघात १ गायगोंठपुरघातमीतनृपमाहु
रदीन्हे । परधनपरतियहानिपरे अघगोबधकीन्हे २ गो
बधनिंदावेदकी परअपकारीअघकरे । जोजननीजानहूँ
तनक सुरगुरुद्दिजपातकपरे ३। ८३॥ हे टी०। भबभरतजी सोगंदकरतेहें हेमाता कैकेयीकी यावत् कत्तेब्यता हैं यहबात जोमें जानतहोड़ँ तो लुरदेवता गुरु दविज ब्राह्मणइत्यादि बध करिबेको पातकपाप मोकोपरै पुनः बाल जो ख्री बालक तिनैकेबंधको अघ तथा यश लोक में निन्दा तथा गायरहने को गोठ मनुष्य बासको पुर इस्यादिको घात भग्निम्मादिल्लगाय नाशक रिवेकों जो अबहावै 3 यथागाय योठ पुरकों घात तथा मीत झरु नूपराजाको माहुर दीन्देते जो पापहोत अथवा परथन परखीहरित्तेनेते अथवा परहानि किहेते अथवा मोबधगाय मारेते जो झघ पापदोता है २ यथा गोबध वा बेदकी निन्दा अथवा पर अपकार परार ह्वितको होत हानि करिदेना इत्यादि जो अघकरै इनयुत सुरणुरू दिज पातक मोको परे हेजननी माता यामें जोतनक थोरदू हाल जा में जानत होडे ३।८३॥ रे
मू०। अति ंथपंगदेयँ । बलकरितिय पर ३: 220 87005 4082000%%%%% मातुषि 0 3 ४ ।हरिहरपदतेबिमुख भूत जाजानोतो
: उरआलेंतीरथकुकृतनिजकुटुम्बढ॒एलावहीं |. . अपघपरें परघरआगिलगावहीं ३।८४॥
९ तथा तीरथकुछत उरभानें अयीत् तीरथर्में जाय परखी प्राप्त की उपाय वा परथन दरणकी उपाय इत्यादि कुकर्म उरमें लावते हें तिनकों जैलापाप लागत झथवा निजकुटम्ब तृणल्ञावर्हिं भापनीबंडाईके ४ परिवारभरेकों तिनुकाल्लम तुच्छकरि गनतेहें इत्यादि तथा परघर
आ्रागिल्ञगावहिं तिनको जेसाअझघ पापलागता है तेसेही अधमोदिं परपरे पापलागै जोकेकेयीक करीब्यमें कछुभीदालजानतद्वोऊती ३८४॥
सू०॥ 2 82% 02202 । मीतविप्नकुलकष्टल
.. बिध्वसें। 48322 5 : अशैजेनित्धरें कुबचनबोलिछातीद॑हें । ; * घिंदेहुजग लोभमोहफॉसेरह ३।८५॥ -
०१ जे लोभ मोह फॉलेरहें लालच झज्ञानताकी फसरीगरेमें ढारे भ्र्थात् वेहब्यवहारैके मानबश लांभदेतु अनेक छल विद्याकरते हैं सेग नहिंलेयेँ साधुनके संगहू जातेहें तबढूं साथुन के ऊपरते बातेंकर तेडं अंतर दछतता बनीरहती है कौन भाँति सदा हितकर्तता बिप्र ब्राह्मण जा धर्मोप्देशक लोक त्रिवर्ण न “इत्यादिको कट्टलखि रुजरपाडित दरिद्व दुखित दोखि नीरभोजन जलादि नहीं देते हैं ५ ऐसे 'निर्देबी कि अरे कष्टौदेखि भोजन जलादि नहीं देतेंहें पुनः कृपसरबाग बिध्वं्से कि 5 55४४ बागादि प्ररंस्वारप्री
५ आवाज़: व माहिर शा गज यम रूप साखिजमउच्नरें नित्यरारिउठिग्हकरें। श्रिर नहीं तेनरजगहोतेमरें ३॥८६॥ _ - 5.
५ दी०॥ ते नरऐसे मनुष्य जगमें पेद़ा दोतदी मरें केसे नर जे ज़न्मभारि
पाषकरें जबते पैदाभये तबंते परख्ली पर धनदरण जीवर्ढिसा -परदित
हानि परप्नवगुण प्रकट करन इत्यादि पापकर्म करते जन्मबीतिगया रणमण॒इल्ते भागे भौ रणको जुकाय अपयशल्तदें भापने बचा रे
अ्रयञ लेलेतेंदें झथवा. विप्र गुरु तापदेदि ब्राह्मण गुरु इत्यादि 32350
रुषनको पनेकभांतिते दुख ताप देतेदें ३ अनादर ताइन न
विप्न गुरु आविकनको ताप देतेदें तथा भोरनकों घरसुबास बसत- देखि
चोर डाकू भागि भादि लायउज़ारि देतेहें भरू जन्मभरि पथ
अल 3३३००+०० इ।थछ॥ बोलीं दे सुतपुत्र तुम शपथ न खाँचिये किसदेतु 0 पस्छ हैते तोदिं राम प्राणप्रिय अथीत् ' तुमकोती रघुनेदन प्यारेहें तो तुमसों ऐसीबात केसे हे सक्तौह तथा हेभरत तुम- ईँतो रघुनंदनकों सदा भतिप्रिया भ्येत प्यारेहों यामें कछुदानि नहीं सक्तीरहै यह ब्रिथि गति बॉँकीहोय बिधाताकी जोटेह्रीगतिद अर्थात शुभा- शुभ कर्मनको फुल जो कछु लिखि देताहै सो निश्चय होताहै १ जो बिधिकी बाँकी गतिहै सोईदोहि झोहीभया ताते काहुहि दूंषण जनिदेहु अधोत संथरा वा केकेयी इत्यादि किसीको दोषनहींहे कहिते प्रधानकर्म सोई क्षेत्रदे तामेजीव किसान जो शुभागुभबवै सोयलाहु, लुनियत अ- र्थात जोजीवजैसा शुभाशुभ कर्मकरताहै तादीअनुक॒ल सुखद्खफललाभ पावतादे २ बयोलूनियत जगत्में मथात संसारमें जीव जैसा कर्म करत सोई दुख सुख भोगत देखिये भूपमरे हमबाँचिये भथोत् सदाराज वियोग होतही प्राण त्यागि.संब दुखते छुट्टीलियें भरू हम बचिरहीं ताते अनेक दुख देखती हें काइेते जब रामचलते तब हमारे प्राण न चल्ते यह हमारे कर्मनको फल ताते किसीको दोष नहीं झरु तुमको तौ रघुनदुन प्राण ध्यूरे हैं ताते तुम पुत्र शपथ न खाँची ३। ८७॥
मूठ 82०९९ आयगेबेंठेहिरोनिबिहानि । मरतबुभायबशिष्ठ 75; ।बिधिआनि १ भृपक्रियाविधिआनिदाहसर * यतटदीन््हो । रानिनकेरप्रवोधभरतपॉयनपरिकीन्हो २ * पॉयनपरिकरिकर्मसबातिलअंजलिक्ृतरायके। भरतासिखा ... येर्ुतकरमबंडेभोरमुनिआ्आायके ३।॥८८॥... ,-.... .टी० । बैठेहि रैनि बिह्ानि कौशल्या ढिग भरत बात्तीकरत संतेबैंठेही राति बीतिगई बड़े भोर मुनि आयगे अथीत् भरतको आवन सुनिःकार्य ; जानि वशिष्ठ आदि मुनिगण भ्राय राजदारमें सब एकत्र है बैठे भरतंकी 23273 शोक त्यागि जो भब उंचित हैं मुकाय पुनः क्रिया विधिमूष व
तेते अदग्ध मूत्र शोधि विल्वहरि क्षेत्रको सूप दशरथ.
* ज्यमें झनेक झानंद देखनेहेतु तनको (कक े ०. र राखि छोड़े २ पायँपरि समुझाय मातनको*राखिके पुनः भरत नी दाद क्रियादि सब कर्मकरि पुनः रायके तिलांजजि रुतकरत मिट .०७ | में- हाराजके ठृप्होनेहेतु तिलांजलि देतेभये इत्यादि बड़े मोर सं * शिष्षावि झायके मृतक कम भरतजी को सिखाये श|८घट॥ ७
*२४ ४: सू ० । हयगयमणिभूषएदय सिंहासनमहिसाज। घेनुअसनआ युधचर्वरकेत्रपात्रशिरताज १ उत्रपात्रशिरताजस्वमति गतिमुनिजसभाषी। शतशतकीनबिधानमरतकरणीअभि लाषी २ करिकरतूतिप्रमाणजस संक्पकर यें। शुद्धासेडकरिकाजसबहयगयमणिभूषणदंये ३,। ४
टी० । दशगात्र षोड़शी सापेंडी दुषोत्सगें बिधिवत् करि पात्रकों दान कह्दत हय घोड़े गय हाथी हीरा मुक्तादि समणी कंचन मणि जटित भूषण इत्यादि दिये पुनः सिंहासन झरु महि म्मि ग्रामावि त्तया जो साज यथा सब॒ल्स घेनु दुशाज्ञा ज्ञामा घोती पदुका उपन्ना रेशमी जरतारी इत्यादि बलन तथा घनुषब्राण तृजीर खड़गादि आंयुध्च चमर छत्र तथा रसोईके भोजनके 02024 ढ़ि सबबिधि के प्रान्न, तथा शिरताजकिरीट ( छ)्रपात्र शिरताज प्र द स्व॒सतिज्ञस भाषी बशिष्ठजी आपनी मति अनुरूप जहाँतक मे भरतजी ऐसी करणीकी झानिल्ाषा कौन्दे जोकि अथीत जो विधान एकबार करंने को बशिप्चली- ते कीन्दे यथा जहाँ एक गोदान बताये तहाँ सो ३ वेदप्रमाणते जससुने
सदांचलिआई । प्राणजादिं बरुबचननज़ाई ॥ जको अछेह अखंड वचन झर्थात् जो तीनिहु काल इृढ़गढ्टि बनकोचले पुनः दशरथ महाराजके वियागदृःख प्राणत्याग इत्यादिको शोचनहीं सनमें आने काहेते सत्यसेब को _ बचन न जानेपावै तो शोक प्राणहानि कछु चीज नहीं है याते झोचरदित्त हार्षत्त बनकोचल्लेगये ताते धर्म शीलतादि गुण तथा रघुनेदनकों स्वभाव सनेह इत्यादिकनको कौन कद्दिसंक्ताहै किसकी ऐली सतिहे ३। ९२ ॥ मूठ। कठिनकेकयीकाकहों कहतहुकहीनजाय । कुमतिकुआगि ' बरायके दीन्हीअवधलगाय १ दीनन््हीअंबधलगाय राम / सियवनहिंसिधाये । पुरपरिजनमनशोच भूपहूठिप्राणप “ठाये २ प्राणंगवॉयेभूपवर भावीगतिकोनहिंदहों । विधि विधिताअतिकठिनह कठिनकेकयीकाकहों ३। ६३॥ _ टी०। पुनः वशिष्ठजी कह्षत कि जैसी कठिन केकेयी हैं ताको क्या कहों कहते कहतहु कही न जाय भथात् जो किसीकी लमता कहा चा- दिये तो याकी योग्य उपमा नहीं हूँढेमिलती दे यथा ॥ नीतिशाख्रे ॥ एते सत्पुरुषाःपश्घटिकाःस्वाधविरो धेनतुतामान्यस्त॒पराथसुयमभूताःस्वा अैविरोधेनतु)॥ लेमीमानुपराक्षसाः पर हि तंस्वाथौयनिष्न त॒ये । येतुष्ततु/निर श्रैकाःपरद्दितंतेकेनजानीमदे ॥ अथीत जे स्वार्थ हेतु ओरको कार्य नाश करतेहें ते सनुष्य राक्षसक्रे तुल्पदें भरु जे विनास्वार्थ पराया कार्य नाश करतेहें तिन मनुष्यनको नहीं जानतेदें वेकोनदें इत्यादि कहतनहींबनत गी उपमा दीजिये काद्देते कुमतिरूपी कुत्लित् झग्नि बरायकै अवध २४४ बैरमानि हलक महाराज ०४३2 अचेड अग्तिवत् अवधपुर भरेखें सब् नर नारिन के उः -दीन्हेसि १ अयोध्याजी में कैली आगि लगायदीन्हेसि
"२ ना
* ही १५०४ के अवसर
- शज्यलहि ॥: दोषनकछुमानसकरो सृपबचनश्रियप्नाण नहि ३१६४१
टीं०१ पुनः वशिष्ठजी बोले हे भरत अब सत्यभावते जो करना उ-
खितहें सो सुनिये सूपदशरथ महाराज को आपने वर्चनै प्रिय रहे प्राण नहीं प्रियरहे सो फुर कीजिये शिरघरिये अथीत् महाराजकी जो आज्ञा है तोकों शिर घेरे यथा रघुनेदन वचन सत्यकरिबे देत बनगसन शिरघरें तथा तुम राज्याभिषेक शिरधरि महाराजको वचन सत्य कीजिये
केसां उत्तमहै घस्मे स्माति श्रुति गाव अथोत् धर्मशास्त्र वेद यही रहाहैककि पिताझोआज्ञा करनाचादिये१ जो बात धर्म्मशास्त्र अरू वे
पुनः जेदिलिगि रघुवर तजे जीने वचनकी सत्यताहेतु दशरथ' रघुनेदनको त्याग किये ऐसा बचन प्रिय ताको
शस्यादिक तथा सचिव सुमेतांदि तथा पुरके सबलोग
ज्वस्फारिक जरतेदें तिसंझागिक संवशोथोरे दे बह ले
2 084:0%%-2 7:25 । कालकर्मगतिवामकुदिनमुखकीजियकारो २ ._ कीजियगुरुआयसमुदितपुर । पालि ._ शोचसबकाहरोकहतकोशलापॉँयपरि ३। ९५॥ +टी०। पॉयन परि कोशल्बा कहत हेपृतगुरु की बातसुनहु आपत्काले सर्यौदां नास्ति ॥ यासमयमें अत्यंत आर्त हैं ततते कोशल्याजी भरतके पाँ- यनपरीं ताको हेतु यथारघुनंद्न धर्मधुसीण पिताकी आज्ञाते वनको गये तथाराम भक्ति धम्सते लपणो चलेगये तथाभरतों रामभक्त हें सोई दृढ़ . करि येभी न चलेजायेँ इसभयते आत॑ दे पॉयनपरी पुनः लोकिक घर्म बिचारि पिताकी आज्ञानहीं प्रधानकीन्ही गुरुकोबचन प्रधान कीन्ही इस हेतु कहृत हेपुत्न यद उत्तम धर्मदे ताते गुरुकी बात सुनहु वंशिष्ठ जी को बचल अंगीकारकरहु भाव राजकाज वेखहुकाहेते भूपमरे पुनः ल्पषण स- द्वितरघुपति वनकोगयेरहे तुमसो यहित्रिथवि कदरात अर्थात् राज्यनहींलीन चाहतेदों १ द्ेपुत्नतुम यहिबिधरि कादरता धारण करतेही सोभलीबातनहीं है काहेते अवध उत्पात बिचारी अर्थात् बिनाराजाकी भयचोर ठग झमि- चारी शच्चुआदि अयोध्याजीमें भरू राज्यभरे में अनेक उपद्रव करेंगे ताते कालकमकी जो बामगति टेढ़ी वाल त।ते जो कुढिन हैं तिनको मुख़कारो कीज़िये भर्थात् कराल कालआये जो असत्कम्म उदयभये तिनके प्रतापते ज्ञो कुदिन लोगनक दुःख़वायकदिनदें तामें भपनी शक्तिबलते सुखदायक आचरणसाजि कुद्निक मुखमेंस्पाही लगाइवेड भागिजाइ २ ऐलाबिचारि गुरुआयसु मुद्वितगुरु वशिप्ठ जो आज्ञादेवें सो आनंद सहित कीजिये कोन भाँति पुरजन परिवार ज़ननकोभार सबकीरक्षाको व्यापार झापनेशिरपर धरिपाल॒नकरि सबको शोचहरहु ऐसा उपायकरी जामेंलवको दुःखमृत्षि ._ जायइति बचन कोशल्या जी पॉयनपरि कहतीदें ३।६५॥ भरतनयनधाराचलीसुनिगुरुजननीवेन । हाथजोरिबोले
० । गुरुजननीके वयनसुनि भरतनयन थधाराचली अ' कहे कि राज्यामिषेक ले पिताको वचन सत्यकरहु तादीको पुष्टकीन्ही सो सुनि अयोग्यता विचारि भावजो केकेयीरृत कल्लेकहै सोई पुएदोता है पुनः गुरुननन को उत्तर भी न देतबना दोऊसंकद करुणारसपूर्णते शोकस्थायी प्रसिद्धनईं ताते भरतज्ी के 44802. जलकीधारा चली इसभॉँति दोऊ नेत्रनते जलउमड़ेउ पुनः हा मधुरबचनबोले १ दोऊ नेत्रनते जत्तउमडेउ पुनः बोले कि हेगोलाईं झआपुने तो सोकोभली सिखावन दीन तथा मातुभी जोकद्दे सोभी उत्तम उपदेश है यहकादेते कद्दे मोदिं पर दया सदाई दोऊ मोपर सदा एकरस दयाराखते हैं अर्थात् मेरे दुःखके निवारण करनदारे हैं २ सबै सदा दया राखते हैं ताते सचिव सुमंतादि मंत्री सब तथामाता कौशल्या अरु गुरु वशिष्ठ इत्यादि सबमेरे भलेहितकी बातकदते दें अरथात् पितांकी ग्ाज्ञा पुनः परिवार प्रजनको पालन ताहूमें सबको समत पुनः जबरघुनंदन आयें तब उनको सोंपिदे लेवकाई करना इसमें कछु दृषणन हीं यहं स्वा- मिद्दी को कार्यहे तातेमले उपदेशहै यही मानाचाहिये क्योंकि - उतरंदेत पातकलतहों अर्थात् सबके बचन काटि डारनेवाला जो उत्तर-देडँ तौ जननसों प्रौढ़ताईते पापलाग इसहेतु भरतके नयननते धाराबदी ३॥९६॥ मू०। पौयनपनहीनहिंधरीरामविपिनकियगौन । भूपमरेप्रणपूर करि ताकोशोचबकोन १ ताकोशोचबकीनघावयहतीक्षण लाग्यो। यहेपीरनितदहत रयनभरिशोचनजाग्यों २ शो चनजाग्योंनिशिसबे जातिसबैातीजरी । रामलषणकटि पटतजेपॉयनपनहींनहिंधरी ३॥ ९७ ॥-
टी०॥ प्रथम सबको 02 0९५० प्रण पूरकरि भूपतिमरे ताको व
सपना तक पीके
सबसमाज भरिमेरी सत्यवात सुनहुंजो मेरेमनमें है रहें तामें यहांतक निरचयहै कि चहैंवर्मज।
हों ५ नरऊहुको दुःख देहते कह 2 दोवे केसहू सकटदानि वियोग दर्द्रिता शत्रुबंधन 000 दावा नलमें देह
गज नीच सेवकों भवोत उरमंतरमें यथापे बहुत बिधिकी कुबुद्दि प्रातिद किदेड ताइपर बालक सहजदे अज्ञदोतेदें ताह पर नीचसेवक उत्तमता ऊरेलेबनि इंति बिचारि-क्षमा करिह्ें २ प्रकठेड , विधि -अवञ्ययञ् अवपाप 'अबश बिधाताने मेरेदेतु प्रसिद्ध अर्थात् लेवकके सुखद्वितु स्वामी बनकोगये इतिप्राप एज्य खवकनेलिया इति ग्यशसते
एा प्रतिद् हिया परंतु नीचदास शिशुल्लेखि बालकविवारि शरणसामुददेखिके जनकनंदनी संहित रबुनेदन सोपर ठ्वाकरि दें ३९६९ ॥ | मू०। भरतवचनलख़़िरबिजग्ररासब्रिरहलिशिपाय । भूपमरणके कबकुमतितिमिररहेउपुरछाय $ तिमिररहेउपुरछायमुर्ति सोबतनरनारी ॥ लषणसियाकोबिस्हव्याप्रटकगर्जतभा
जलगे । दु
ड कि भवेकरशब्दते गजतेदें तिनकी भयलगी है है ०:53 'गजते हैं ताते भयडरकरिके सब पुरंजन बिकलतें पुनः रात्रि में नक्षत्र रहतेदें इदां तारा नक्षत्रणण सम मुनिबशिष्र द्िजमपर ब्राह्मण लगे नक्षज्रतम लपुप्रकाशवन्त लागतेदें इसभाँति दुखद बियोग सेजपर पुरजन सोवततेरहे ते भरतके वचनरूप रविउदयदेखि जागिडठे ३३१०० ॥ मू०। सब्रकेसससबसुखभयोभरतभलोमतकीन । दुखसमुद्रबूड़ -- “ल्सेकेलज्यहिअवलंबनदीन १ ज्यहिअवलंबनदीतंसंभा सबउठिमेठाढ़े । रामचंद्रसियद्शमंत्रनरबारिधिवांढे २ बारिधिबादेलोगसबमभरतमंत्रसबहीलयों। साजिसांजिबा हनचलेसवकेमनसवस्खभयो ३।१०१॥ टी० | सब अवंधबासिनके मनमें सबर्भातिको सुखभयो काहेते भरत जी भलोसत कीन काहेते दुःखरूप अगाथ समुद्रमें पुरजन बृड़तरदें तिन सकलको ज्यहि अवल्तम्बन दीन ज्यदि भस्तने रामढिग गर्मनरूप ज- हाजते अनुकूल बचनरूप बहते पकरि सबको बचायराखं १ ज्यहि भरंतते ऐसा. अवल॒म्घन भाधारदीन जाके बलते सबसभाजन उठि ठाढ़े भय काद्लेतें राम्नचन्द्र सियदश झाशरूप मंत्र॒कोबलपाय नरबारिधि बाढ़े सनु- व्यनसें झानन्द समुद्रसमउँगा २ काहेते सबलोगनमें आनंदर्लियुवाढ़े भरतजीको मंत्र सबहित्तालियो भाव बनको.गवन सबके मनते भावा इस 5९: 20304 सबपुरबासिन के मनमें सब भाँतिको सुखभयो ताते रथ बाजिआदि . ।साजि संबैजवधवासी बनकाचले तयारीकरनेलगे ३१०१॥ मूं०। भरतसाजसाजतभयेमातुसकलपुरलोग । चलेचित्रकूट हिभरतकृशतनरामबियोग १ कृशतनरामबरियोगचलेस पाँयनप्नहींत्यागिशीशनहिभ्षणराजे २
ये ॥ रामप्रेमपूरण
भ । पॉयनप्रनहींत्यागि
गजेत्यांगिेः
'अरत्ता 'चिअंकूटको " * 2: 88 -429 रघुनस्वनके (“कुक का तनकश वेहदर्बल है रहीहे ) राम बियोगतेतनछुश झरु बादनाड़ि राजली साज सज्ञि सेवक सुभट सचिवादि सबसमाज साथ लिदे परन्तु आपु केलेवलेकि प्रॉयलते पतहीत्यागि नांगेपाँयन पैदर पुनः शीशनदिंभूषणराजे
शीज्ताजआदि-कछुभी भूषण तनमें न्ींदेखात लावेवेष २ भूंषणकी जो
साज किरीठ कुणडल माल केयूरावि सो सत्र त्यागिके कक ॥3।
तथा कोशल्यादि सबमातन को संग लिये अरु रघुनन्दनके प्रेम +
परिपृणभरे इसभाँतिते भरतजीप्रसुपासजानेदेतु लचसाजसाजे ३३३ ० २॥
मू०। तमसातीरनिबासकरिप्रातसमाजसमेत। सुरसरिदिखीजा यतबकेवटकंहतसचेत १ केवटकहतसचेतभरतसेनासँंग ल्लीन्हे ॥ समुझ्तिनिषादविचारिकपटअंतरमहँदीन्हे २ अं तरकपटविचारिकेसजगहोउसबचाठर्धारि । सम्रजानिवन' भरतसाजितमसातीरनिवासकारे ३३ १०३ ॥४
<टी०। प्रथमंदितचले तमलानंदीतीर रातिकीबांसकरि प्रांतमये सेवक सचिवादि समाज समेत चल्तेजाय सुरसस्गिंगाजीकोवेखा भाव नंगिचाने तज् सचेत सजग द्वैकै केवट आपनी समाज में कहताभय/ १ सचेत है क्या बात कैवटकहत कि भरतजी तो चतुरंगिणीसेना संगमें लीन्हें भआवते हैं तो निषादराज बिचारकरि समुक्िलीन्दे कि भन्तरमें कपठदीन्दे हें अथौत् सुनिबेपते रघुनन्वन बनवासमें दें तितके मिलत्देतु-जो-भरतजाते होते ती एकाकी उदासीन चलेजाते अरू जो राजसी' साज्ञ सेना सहित चलें तो अंतरमें कप्टलिहे हें बैरभावते जाते हें इति बिचारि समुक्ति लिया २ सो समुमि निषावराज कहत कि हैं 2 भंरतके अन्तरको कपट बिचारिके सब घाट्धारे सजग होहु भेथौत् किर 000/ ३०320: 2254 वें बिनायुद्दजीते ३ कि तमसातीर निवासर्का
पनरकए बह २१०
4 || हक अमृत -कक़रा+ ध्यक कहॉक्त
ज पतली सेनातें कदते हे सुभरहु: डांस बीरहु-रघुर &#- 2 ललकल
'असरुें र घुवीरफ़ी भावनिश्शक पन््मुख चुद्धकरिदों 4: कोनआँति >्लोहेते | ढेह्ों। सुभदव्िन: कटकतनिहारो :अर्थात् ऐला डूंढ़िढद़ि: मरिदों कि दम है खेपरि. हैं ज्् जलः अबात् तीनिझोरते गाँसि हे हा री मरेंगे पुनः हे सुभटहु पीछेपांड जनिधारों लन्सुखेयुद्धक पाँउ न धरो यासमयर्मे ज॑येपावना अथवा जूमििजाना दीऊ परसउत्तम _ हैं काहते जंबपाये लोकमें सुयज्ञः भरू स्वामीको कार्य पुनः संन्मुख जूमे सुरलोक प्राप्ती| पुन: मंगातट रामकार्स्य देतु सरणपरसात्तम ते उंत्तमता 2 | पुनः मोरानिहोर-बिचएरिके स्वामी, रघुनन्दन के-काय्वे हेतु-सुभ 2$):१9०४-॥..
७।पहिरतअग्ररीधनुधरतभईछींकगतिवाम ॥-सगुनसगुनि _ ७ थाकहिचल्योसगुनसुमंगलघाम “१ सगनसुमंगलघामभ रतनहिंकपटकुचाली॥ राममनावनजाहिंसंगलेमातुसुचा
अकिक दस किल्लीदेश बे
बियोग-ज़नित- वाद ग्नि-तापते सब आपहीतसहें 5 3 ४ र्थात् मिज्लम पदिरते दो अथवा जा चारि लिदें मिन्रकों शत्रु 5नायलेना यह सहला कीजिये भावविचारपूर्वक कार्यकरमा चंतुरजनंकीकायहैं ३। ३०५ ; मू ० । समुभिभेटेडपलेंचलेंखगम्गगधनपटमीन 80074 455 ४' बंसगलियपुरजनपरंमप्रंवीम १ ल ह अर । रामसखांसुनिभरतचलेमिलनेरथत्या गे २ रथत्यागेकेवटकहचोनासजातिपुरअनभले । भरत चल्योउमैँगतनयनसमुभिमेटिनूपलेचले ३ ।१०६॥- ठी०१ नृप समुमि मेंटलेचले भरतजी राजाहें तिनसों खालीहाब नः मिलना चाहिये यह विचारकरि मेटकी सामग्रीले निषादराज/चलेःक्याः सामग्री:खग कोकिल' मोर चकोरादि-पक्षी पुनः :हरिण परृष्कल्कपाठा' माँखादि सृगभणि स्वर्ण झादि घन दुशालावि पठ मीत संगुमहेतु:।इ+ त्यादि सब मिलनकी साज अरु विद्या बुद्धि वार्तादिमें जेः्प्रम प्रवीना ऐसे पुरवासी जननको भी संग लिये १ परम प्रवीन'पुरलननकी संगलेः निषादराज आगेजाय मुनिवर वशिष्जीकहँ मिल्यो भ्वात् आप्रना नामः कहि दूरिहीते दंड प्रणामकीन्दे तत्र वशिष्ठ जी भरतसों बताये कि रघुनेदनः को प्रिय /सखा निषाद् यहीं है इति रामसनेदी संख्बासुनि भरत रथ त्यागेः रथते उतरि निषादके मिलनहेतु चले २ जब त्यागे मिलन चक्े तब साए्टांगप्रणाम॒ करतसन्ते केवटनाम
डी७ । देश कोश पुत्र परिवार इत्यादि सबरभांतिकी कुशल भरतपूछे भाव सर्वोग ऐश्वर्य देह संबंधी कुशलपूर्वक हैं सो सुनि केवठ विनती कौन है प्रभु जब आपु आय दरशेनदीव तौ आपुझे पॉयनकोी धूरि देखि अब कुशलभई १ काहेते अब कुशलभई प्रभु वशनके लहंत हेश्व॑भ आपुके दर्शन प्रावत संन््ते लोकिक पारलोकिकादि सब प्रंकोरक्षे दुख दूरिपराने दूरिकों भागिगपरे साव कुटिल कर्म सर्वनाशद्वेगेये अब कहाँते दृभवझविगो जल-रामलेब्रक जाने तस आपने पुरदहि चलिये झ्र्थात्ः बधा रघुतंदत आप्रन्ा सेवक जानि इहाँ वास विश्वास कीन्द्दे तथा झापते सेवकको पुर आपत्ता लानि इत्नि आपने पुरददि आपहू चल्षिये ३-जब भरतजी पुरको चलना जजूरकीन्दे तब्र मात॒नि लखि कोराल्यादे स्ाततकीप्राज़की आंवत देखि जब्ै सादर सहित आदर पुकारिके क्यो कि में आपुको सेवक निप्राद प्रणास करताहों इति स॒नि जनु लपणलमज़ानि हेतु पूर्वक पशीष देके पुनः सबै विविकी कुशल पूछे ३॥३०७॥
रामसखा निषावराजने नशा अप 5 लेवाकरी हारि लीपि पोति तिनमें रानिनको वासड़ै तहाँ निषादराजकी स्त्री जने 23३०० सेवार्मेरहीं तथा बारहदरीआदियें शत्रुहनादि रंघुंबंशि १ न गुढके बात्तकादिसेयासेंरदे दरिमदिरमें वशिछ्ठभादिकों वालदिये के बंधुवर्ग सेवामेंरहे हृक्षनतर साफब्रहारि जलछिरिंकि तंहाँ पाद़िकोबासदिये तहांगुहके सविवादि सेवारमेरहे बागैसाफकरि तहां सेना को बासदिये तहां गुहके सेनप सेवामें रहे बनमें हांथी
पशुनको बासदिये तहां गुहके सेवक सेवार्मेरहे जो सभामन्दिर
भरतजी को वासंदे निपांदराज आपु सेवामें रह्यो' १ बिंधिवत योग्य सबको बासदिवाय भोजनपान अंगसेवादि सत्रभाँति लेबकाईकियो इसीभौँति तहां श्टंगबेरपुर में रयनि गवाँई राति बिताई मोरंभये चले तहाँ रातिभरे में इतनीनावे मैंगायलिये जामें. समाज सहित भरत को केवदट उतराई निषादराज ने ऐसा शीघ्रदी गंगापार उतराय दिया जो एकही खेवाते पारकिये २ इसीभाँति सत॒लेनयुत सेना सहित भरत को पार उतराई पुनःआगेचले प्रयाग मारगलियों प्रयागकीरास्तापकरे इस ख्ंगबेरपुरबासमें संबकोलुपासभया पुनः रामदश लालच हदेयरघु- : जाथ जीको देखनेकी भमिलाष सतरकेउर में हें तातेशीघ्रंचले३॥ १ ०८ हे मू०।नन्हायप्रयागप्रणामकरिदानदीनसुखपाय । भरद्ाजआश्रे मगयेमिलेपूजिवैठाय १ पाता हे बसु 2 4420543% ६७६४४०30:4%4० - । भरतप्न रेप्रा निशिऋ
पिकीनक्ष॒पाससबध्रातनहायप्रणामकारे ३३ १०६ ॥ टी०। प्रणाम करि प्रयागन्हाय सुखपाय दानदीन प्रयागम्नें पहुंचि प्रधमतों भरतंजी प्रणामकीन्दे पुनः श्रिब्रेणी जीमें पुनः हय हाथी स्वणे सणि गरादि ब्राह्मणनको दानदीस्दे पुनः भरदांज ._ मुनिके आश्रम्त को गयें प्रणाम कीन्दे मुनि मे डर
2 32222 20/ 2० ५३०० («* «8. * जातिभरि बासकीन्हे प्रातःकाल्न समांज सहित जिबणीःमें नेके प्रणामकरि भरत आगेचल्ते ३१३०९ ॥ ८ ० ८ काछ
जब इक + श्रवंणकथारघु : पतिसगुणहृद्यचरित्रअनुप३ हृदयचरित्रअनपंपरतपंग
+ ५ शिथिलसनेहगभीररामसियमुखभरिवो
4 ' मुंखभरिबोलेंरामसियपंथअपंथहुनिश्चालित। बषत ह््लाड सुरजयजयकहतरामतामरसत्नालछित ३। ११९ ॥ +>वदी७१- कैसे भस्तज्ञी - चलेजात रामनाम- ललित रखना में तथा हाल्नलियरूप ध्यान में जतलित कहे सुन्दरता सहित राम-नांसबवा ॥ शासरावसाप्रभद्ाय साम्रचन्द्राबवेधसे- रघुताथावत्ाथाय -स्लीतायाःपतये ॥ इत्यादि माधुरी खहिंत जो रामनामहै ताको-रसन्ा,जिद्ठाकरि- |: 32% करते हैं पुनः सब इन्द्री व मनादि की ृत्ति.बटोरि एकत्र करि अन्तरमे स्थिर राखना ताको ध्यान कही यथा ॥ योगशा्स््रे ॥ तत्र अत्यंयेकतानता ध्यात्त ॥ तिसध्यानमें ज्ञनकनंदनी सद्ितिरधुनंदन _. 3 अं 22टक न फट मिल क्द्दतजाते हे छुततजात: पुनः रघुपति समुण झन्नूपचरित द्ववयमेंवः ।झीज् उदारता सोज्ञश्व॒त्राढ़ि उच्तम; गुणनसद्वित डप़सा रहित च्रित करि- ऋषि
कौनकारणते गंभारे नेह बढ़ाभारी है ताते सर्वीग ढीलेपरिगये प्रेमसद्ित ऊँची इवासयुत सीताराम ऐसा नास॑ मुखभरि उच्चारणकरत ज्ञात १ प्रेमभरे आऔीरघुनंदन जनकनंदनी दोऊनाम सुखभरि बॉलतजा- त ताते पंथ जो सुंदर रास्ताहै अपंथ जहां बन नदी नारादि विषम ताते शस्ता नहीं है इत्यादि 3 उन सर्वत्र निश्चलित प्रेमकी प्रबलताते सीधीराह कहों नहीं सुपयतो प्रेमते सलिजातेंदें भरू अपय में तो रास्ते नहींचलें केसे तद्दां वेवता रास्ताबतायदेतेहं भरू फूल . बर्षि जयजय करतेदें काहेते जो रसनाकस्किभरतजी स्लतित रासनास कद्दत जातेहें ताते देवता जयजय करतेदें १॥ 9१० ४ मू०। सुन्दरबनगिरिगणमृदित मगविहेगकपिभाल । प्रमुदि .. तप्रजासमाजसब राजासुखदसुकाल सुधालस्सिसरिबार
“काल सकलतरुफलसुखदायक
कर्मअघओगणखायक २ ओगुणछलदलद्पटदु रिक
“+०००+०्क०क- । केवटभरतवताइयोसुद्रबनगि
गण मुदिति ३११११॥ टी० । गिरि जोपवैत तथा बनसुन्दरहै तहां कपि जो बानर भात्त जो
ऋक्ष दरिणादि सृग तथा विहंंग सारस हंस चक्रवाक कोकिल मोर च- कोर शुक पल कल तल ह+5& 2४4 8: स्रुग विदंगादि गण सम्रह सः [ते भानन्द सदह्दित बस
52 जब नाति धरववंत
सुकालपायके प्रजासमांज़ सब प्रमुदित रहत भथौत्
राजा भया पुत्रवत् भ्रजाको पांसन करता है ताके चैदावारी वुक्षलफल गौवनके 5 ग्ध इस्यादि तौ अवर्षण महँगी रुज़ चौर झग्नि परचक्र 70220 |;
भोगुणर ज्ञों
अबगुण इत्यादिको खापलेत भ- अधघक्म मो: इनक सतोगुणी स्वभाव
बे करनेमें मनलागत २ कैसे अधकर्म भवगुणकों खायकदें यथा .. छल कपटादि यावत् ०४० ०३४४ के दल्तसमृह सोई द्विरव हाथिन के भुंडहें ..तिनपर मंदाकिनी कैसी दैं विदित केहरिदपठ प्रसिद्ध सिंहसस दपटत भाव जाकोपावत ताको खायजात नातरू सबदेखतही भागिजातेहें इत्या* दि प्रभाव सद्दित सुन्दरबन गिरिपवत गणादि तिनकों मुद्रित आनन्द मसनते केवटने भरतसों बुक्लायो समुक्कायकह्यों ३॥११३-॥ मू०।नाथबिटपबटतरुतरेंकीनडावनीराम । सियाबंताईबेदिका - तिजकरललितललाम १ निजकरललितललामरामशुभ आश्रमनीकी । मुनिगणशकहतपुराणसुनतदिनकरकुलटी
-ावज >क८ 5८७०१५3५%-3%2873 ०-५ दिनकरकुलमंडनमहीदुखखं ॥रामसि
बटतरेः ३ । ११२ टी० । रघुनन्दनको वासस्थान केवटभरतकोदिख/वत हेनाथ पाकरि जामुन तमाल रसाक्ष बिटप देखिये तिन चारिंहुके बीच में बटतंरु बरंगदकोठक्ष है ताकेतरे राम छावनीकीन रघुनाथजी पणेशालाछाय बासकॉन्दे ताके ला न नही मन आपने दाथन ललित स्तलाम वेविका बना त्र भूषित चौतारिया बनाई १ आपनेही हाथ सुंदरि वि- चित्र का बनाई ताते राम आश्रम शुभनीकों अर्थात् 28३९ के (धंबनादै ताहीते रघुनाथजीको बासको झाश्रम शुभमंगलकारो वेखतमें | बैठे मुनिगण भन्रिआादि समूद मुनिबैठे पुराणन की कथा कुल्टीकों सुनत दिनकरे' कक कुलमें टीका वैडिसुनते दें ९ दिनकर शुलमणडन सूखे
. टी०॥ भरतजाय रखुनाथजी के पाँयनपरे दणडप्रणाम करतसंते बोले
हे भगवन्त त्रादिब्रादि भाव कैकेयी रत पापन ते 6000. मेरी रक्षा - करौ केले भगवन्त ऐंड्वर्यवन्त हो अदरणको शरण में ड़
प्रताप जगमें बिदितदे भरु झादि मध्य भन्तनहीं है भ्रधीत् जाको शरण राज़नेवाल्ा कोऊ नहीं दे ऐसे भशरण को झापु शरण में राखि पभय करतेहों ऐसा आापुका प्रत्ताप तो जग -में संबै जानते हें भाव वेद शाख्तर पुराणगावत पुनः झादिमें क्या करिभायो अथवा कबतेहडौ ९५ सध्यमें क्या करतेदौ वा केसेदो तथा अन्तमें क्याकरौंगे वा कबतक
इत्यादि कोई नहीं जानतादे १ झावि मध्य मी नहींहै परंतु
हे स्वामी प्रणतजनरक्षकद्दी भर्थात् जो भयातुर पबक शरण आवत स्पहिजनकी रक्षा करतेदौ पुनः नीव ऊंच जो कोऊ सन््मुख आवत ताही._ को झादर बड़ाईवेतेही इतिआपुको शील मयस्वभावजानिके शरणपाल बि चारिश्ननुगामी झापुको भनुवर जोमें सो आपुके पद्रज की शरणहों भाव यथा पदरज लागेते झहल्याकोकलंक नाशभया तथा पद्रजप्रभावते मेरा भी कल्तलेक दूरि कीजिये २ झनुगामी अथौत् भापुके पीछे फिरनेवाला सेवक ताहपर शिशुबालक सो झोगुणी भर्थाः (0 उपद्रवभया ताको कोरण महींहों इति अवगुणको मूल ताते भोगुणीहों ताते घाय भायके प्रभुषद धरे भाव जोबराबरी को भायद्वोय वा पद पवावामें
बाधा करै ताको उवितद्दै यथा देवासुर सदा परस्पर बिरोचै
जो सेवक झथवा बालक- (४४४: बाथकहोई सो
। देखिदशासुर शाह
मे ० उप रघुबर शिषिल भरतको कम करतेदेखि भन्तरते
गा स्यहिकरि 2 ६ ॥धजीको सबौग ढील। ताते झरीर | सुधि बिसारिडठे कौनमोति धनुष कहोंगिरा बाणकह्दों गिरे झोढ़नेको पट बह कहोंगिरा शीशर्में बँधेमुकुट ते छूटि जटा छिटकारिदिये 3 । 048 ज्टा छिठकारि दिये पुनः दोऊ नयनन ते भाँश जज की धारा बहिचली इत्यादि प्रभुको वेहकी सैभारतो नहीं है परन्तु दहुँकर लियोउठाय प्रभु दोऊहाथन गहि भरतको उठाय लिये २ वेहकी सभार को बिचार तजि कोन अंग केसाहै क्या करना चाहिये इतिबिचार स्यागि. बिकल भाई को उरमेंज्ञायलिये म्रधीत् ग्लाने भर बियोग दृःखते ब्या- कुल भाई भरतको देखि प्रभु शीघ्रही उरमें लगाय बियोग ताप बुकाय ग्लानि पै सावधानता दिये तासमय भरत के प्रेमते रघुबर शिथिज्ञ यद दशादेखि सुरगण त्रसित लौटि जानेकी भयमानि ढरे ३१११४ ॥
मू०। छोड़िनभावतशिधथिलहउभायप्रेमपरिपूरि । मनबृधिचित : हितलायकेकरिकुतकेसबदूरि १ करिकुतर्केसबदूरिरामपु - निकेवट्मेटे। लषएणमरतपुनिमिलेशचुहनउरदुखमेटे २ मे ट्डुसहउरदाहदुखभरतशीशपद्धरेहठ। सकलसभामुनि
- ग़नमगनछोड़िनभावतमगनहउ ३॥११५॥ - टी «भरत तथा रघुनंदन तेदोऊभाय प्रेमकरिपरिपूर्ण भरेहेंताते शिवि- लसवौगढीज्ते परिगये मित्ननसमय छोड़ना नहीं भावत पुनः ऐसे हित ५० बितल्लायकरेमिले जातेसबतर्क दरिकरिदिये झर्थात् भरत ०२४४ है; थ भनुकूर सरलता उबनाइी मिलिज़्ो कुतकंणारदै तित अपन पार 3 का निष न्प पुनः र | प्रणामकरतदे ट' 5232 निषाद: ' ज्ञगाब लषणको प्रणामकरतेदेखि डरमेंलगाय भरतमिले तथा रघु
वोऊजनेमिल्षि शब्बुहनको वियोगद् ६3०5० 4०6-5% ९ ज
2० ये 7207 70:22 परिपूर्णमये झरू ५ में सगन बड़ेरदें > मिलतमें छोड़िबो नहीं भावतरद्या सोदशा देखि सकल मुनिगण प्रेममें मगनभये ३३ ११५४॥ , मू०। ३० :ह३-3० 3४2०3 । धरेजायमुनिपद् है? 8222४ कै ७८३४ । र्माः लिवाई।मातनमेंटेआयमंनहुशिशुधेनुतुराई गतिमिलीसियसासुनकेचरणंगहि । रोदनकरतबिलापक रिकेवटगुरुनूपमरणकहि ३॥१३६॥ .... टी० । भरत शन्रुइन केवटये तीनिदीजने प्रथम झश्रमको भागेरदें ते सब मिल्िचुके तबकेवट गुरुभागमनकहि भर्थात् केवटने कहा हे महाराज बशिष्ठ सबमाता पुरजन सबै आये हें सो सुनि रधुमाथजाउठे तिनकेसंग सबैउठे झागेजाय मुनिपंदकमलघरें प्रणामकौन्दे तब मुनि अंगधरि भेंदे डरसेंज्गाय मिले १ भंगधरि मुनिकोर्मेटि भाश्रमको रघुनंवन भाय कौशल्यादि मातनको मेंठे प्रणामकरिसिलेकोनभांति म-. नह तुराई घेंनुको शिशु यथा शीघ्रकी बियाई गायको बछवा मिल्लत ऐसे हर्षते मिलते २ तुराई घेनुगति पृत्रनको सित्ती तथा सीयभांय सासुन के चरणगहि जानकीजी ग्राय कोशल्यादि कस के यथाधोग्य पद बंदनकारि प्राशीबौदपाये जब सब मिल्क बैठे तब केवंट भरू गुरु बशिष्ठ नृप दश रथ महाराजक मेरनेको हाल कह्दिदीन्दे ताते राम जानकी लपण तथा रानिन संद्ित सब समाज बित्ताप करि उच्चस्वर गुण बर्णत्तपूर्वक रोदन करत ३।११६॥
मू ० । भयेशुडमुनिवचनकहिमरतरामसबभायं- । 'संबसर्माजक
मम बे खेत १ मातुसचिवऋषिरायभ
० अनु करुणा भर्थात् दुःखह़े पुनः रघुनंदनके समीप प्राप्त हैं &:5७ ४ मातां सचिव ऋषिराज इत्यादि सबको सम्मतत्तेके
भरतजी रघुनवनसों बिनतीकीन्दी हेरघुबर झापु सर्वेज्ञ 72 संकल्न ज़ननके- मतिकी जो गाते बुद्धिकी अनुकूलता तथा रति
प॒ ि प्रीति है इत्यादिको चीन्दते दो भाव सबको बुद्धि भापुकी है २ सबके मंतिकी गतिमें सनेहचीन्दि भर्थात् जो सब की बुड्िमें 53% सनेह परिपृणहोइ तो सबकोजों मनोरबहै सोई झाजु ज्ञहि यहण करे काव्य वही कार्य करिये क्या ग्रहण करि कार्ये की- जिये झ्वध 2236 र24 करिय भयोध्याजी को लौटे चलिये तहाँरा- . ज्याभिषेक पुनः महाराज पद॒को जो व्यापार है सो कीजिये इत्यादे बचन दुद्ध भये परसानि बशिष्ठ भी कहे भावजो भरत कहें सो कीजिये ३॥:9१७ ॥ मू०। तर पल नुपब्रनकोदयोसोईघरिशिरआज । तुमकोपितृपर पूरणराजसंमाज | पूरणराजसमाजहमह तुमआा (2 था 8:350:0%:3 328 पालियपितुकोबैनजन्मअभिमतफललीजे २ ॥ सुजिनशिरलयो / 5 'बचननखंडितसोकरोंआयसुनूपब्रनकीदयो ३। ११८॥ टी०। भरतप्रतिं रघुनाधजी कहत नूप बनको आयसु -दयो दशरथ महाराज सोहिं बनवास करने की आाज्ञादियादै सोईझाजु शिरघरि करना (६ पिताकी श्राज्ञामानि बनेमें रहना चाहिये पुरको जानाभनु- चित है यथासोको बनकी झाज्ञादिये हे भरतजी तथा पितु पुरको राज़ &. दिये भर्थात् अवधपुरकी पिताने
बंनबासको भायसु दियों सो बचन खंडितनक पुरंकों लौटने को न कद्दौं ३ हरी का
मण०। जोश्रुतिकहतसूसत्यहै श 75 ७० 2, (सह
सेवतसोईरोगवशवचनकुयोगष्पपत्यहे । समुभिलाथंकी वतसोईरोगवशवचनकुयोगचञऋपत्यहै । समुभिनाथ जैउचितजोश्रुतिकहैसोसत्यहै ३। ११६ ॥. क्
टी०॥ स्वामी के बचनते प्रतिकूल उत्तर सेवकको भनुचित है
क्षमादेतु हाथजोरिक भरत कहदत दे नाथ जो श्रुतिकदै सो सत्यहै
प्रमाण होय सोई संत्यथम है ताते शतकोरि परस घ्म पितु'
राखिये सौ करोरि उचम, धर्म्मसम पिताकी भाज्ञाहै ताकों 222
अंगीकार कीजिये ३ पितुभाज्ञा सौ करोरि परम धम्म सम ययि हैं
तदापि जो पिता खरीके वशहोइ भाव भपनी इच्छांते नहीं केहत न वेंदधर्म
बिचारत उचित अनुचित जो स्त्री बतावत सोई पिता कहै ्रथवापिताके
सन्निप्रात भयाहोय अथवा अतिवात: भर्थात् उनमाद भग्राहयोय अथवा
सोई पितावारुणी सेवतद्दोइ अर्थात् सदिरापान तक ॥
णीलेवतहोइ भथवाकिसीरोगके वशहोड इत्यादि 22 ज्ो बचनतेकुयो-
ग प्रपत्पहैं वैबचन कुयोगंते उत्पन्न होतेदें ऐसे बचन' कहै तिनक
8०203 3093 चाहिये
ननमें ससुभि, बिचारकरि : होइ
हैजो वंचनते प्रामाणिकनहींदें तिनको न सगीक
में तुमको राज्यदेने
रुखतखि गंगतीरगये मन, प्रणाक्षियों रघुनंदन प्रभुको रे ैस् सलज को न जायेगे ताते सरत मंवाकिनी गेगाके त्ीरजाय मनमें प्रणकिये कौनभाँति जल उठाय हाथमें लै संकल्प करि हे कि जो रघुबीर न चलें $ जो रघुनाथजी अयोध्याजी को न लोटिच- तो वेंहतणसम तजिडारों पतिनुकाकी समान देहत्यागिदेडँ इतिसंकरप करि भ्रणक्रिग्र. लोतनसतमभर्पित दोखि अधोत् प्रसुकेबिनालोटे ताकेहदेतुस- ज्ञकरिके तनकोअपंणक्रियेहें भावतनत्यागकिया चाहतेहें इाति भरत जीको प्रणदेखि गंग तियवेष सुधारों मदाकिनीगंगास्त्रीवेषते मत्तिमान् प्रकट भई्ठ २ ४१४ री एकमुंख॒रगंगाजीखीको वेषकारिपुन:भरतकोमुखमापनासुख एक कौन्हे भवौत् सस्मुख बैठे ढिगठपदेश सुधारों भरत के निकट बैठि उप- देश करने त्ञगी क्या गेगा कद्दत हे 263 जे .रघुनंदन. के छोटे भाई जोतुमने प्रभुको रुखलखि सनमें प्रणकरियाहे ताको बिवेक सुनिये भर्थात् बिना बिचार प्रण॒कीन्देउ ताते बिचार सुनिये सोकीजे ३।१२० ॥
मृ०। सत्यसब्विदानंदहार्रिमसकल' 8 व । ००० -58०>: तश्नाता शनोसवौपरिजगदीश १ ं रंणकरापदपतालशिरगगनलोककरउरागिरिसिरवर ९गिरि
... सखवरधरअंगसबभरणहरणथितिपूरिभरि।हठन करीआय - . सुधरोत्रह्मसचिदानंदर्हरि ३। १२१ ॥
“टी७०॥ रामसंकल सुरईश सतबित् आनंद रूपदरिंदें भरतसों मंदाकिनी
कहत कि रघुनाधजी सबदेवन के स्वामी कैसे ईहवर दें सत्यत्रयकाल में
एक रल-चित् सदा एकरस ज्ञात भखगणड आनंवरूपहरि हें ताहिसुत
अआातानगनो हे पुत्नतरत तिनरघुनेदन को झापने भाईकरिके न गनौका-
+ कप, ईश लब सेसारभरे के ८१772 9 सर्वोपरिजगदीश सवे
088 ् (अत हर ४ 3 बिधिहरि कारणकर ब्रह्माविष्णु
(; 5० 2६७3: बके उत्पन्न करनहारे हैं पुनः ब-
। 'विराट् रूपहे कौनभाँति पाताल लिनके पवहेँ गगन
अशरवललिवाणननयो २ ५ ज]४ 4
नें जननको 2. तथा खलगेणें दृष्ट र न नॉथजी न विपिनचेले देवनकों 2.8 हो कि बनेचले टर १ 72 प् वेद धम लुप्तभया तथा नहीं करने प्रावत इत्यादिकनको पांलन देतु तपलाज तापसी वेषतेजाते हैं $ मुनिनको पालनहेतु तपसाजते पक सबंश को नाश करने दित जात लोड निजकर्म प्रमाणकरि जोकछ किय दें सो आपले कम सांचेकरि पुन 3०0५ #०05.. बुर, हि राज्यामिषेक अंगीकार करिहें. ९ तिलक राजनीति धर्म सहित उच्तम चंरित करहिंगे कौन हेतु इन ए्थ्वीक्षरेमें सुख सहित पाप
2 गत सुनतमें छठी अम्ृतंसमप्रिय सनरः ॥| धर ० काननको त 47544 गंगाजी गा ३ 93 । भ्वणनंको तंथा 306 7208 मुनिनको पालन करि वेवकाधर्म सो बचनसुनि भानन्द सहित | सिधाय उठिचले भाय श्रीरघुनाथजी' के पंदकमल्त श्रेमंघरि प्रेम सद्दित हक पक अंणामकीन्हे २ प्रमुपद कमलतमें शीश .. नोय पुनः भरत बिनतीकरी हे नाथ प्राण अवत्तम्ब्र पे पादुका खराऊं रण तित्कों पाय शीश्घरत पादुका सरत शिरपर शुभभानन लिख मंगल्कारी गंगाजीके मुखते गा र पकरि बिपिन तौरथ झटमकरत चित्रकूट बनमें यावत्त् त॑ फिरतेहें कद्दू स्तान कहूं माचसन कहूँ दर्शन करतेहें ३३ २ शा
समनसमाजसमेतसोचित्रकूटवनदेखि। सखदरामबरबदन लखिजीवनसफलबिशेखि ३ जीवनसफलबिशेषि भरतश्री हे नग्न नह थनजए ये २
अतकिमिपावदगंगनउडकरिनेमकों कंहैरामभरतकेप्रेमकी ३१२५ ॥
टी० । आीरधघुनंदेन तंया भरतजीकों प्रेम अपार समुद्रसमहै तहां को ऐसासमर्थ कवि हे जो बणैनकरतंसते पारपावंदि काहेते जो दृढ़ नेम ल्लिहे जो क्रिया पुष्ट नियप्रसंदित जो सर्तृक्रिया करतेहें तथा परमघर्मकों जो'अ्तधारण कम हे भर्थात् भहिंसा संत्य पावनतादिं पुष्ट नेमसहिं- त-जप तप पूजा पाठादि करतेंहें इति टेंढ़ नियम क्रियादे तथा परमधघर्स जो रघुनेदन में सेवक सेव्यभाव तामें भननन््यता 'अतर्में जो कमेंहें यथा अवण कीतेन स्मरण सेवन अर्चन बंदन दास्यतां सरूय आत्मनिवेदना दि इत्यादि यावत्त आचरण लोगममें हें ३! मरतादिं प्रबासिनमें परस धर्म कमोदि यावतआंचारदें तिनको बंणेनकरतमें संहंसानन इजारसुरव हैं जाक॑ ऐसे जो शेषजी तेऊहा रिगये अंतनपाये ताकों' ८:
बरंणिंसके बिचारे मसांको कहों नभ आकाझकों अंत सिलिसक्ताहै २ नेमको करिके भाव में अंतलेलेहों इते टंढ़धरि जॉमेला, गगन झाकाशको उड़ै तो किसि भंतपाइसके किसीभांति गति 3१ २3 30003202 १882
जड़मतिमहेविषयी ०
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दा एप द । ०2००२ 'पूजन' अरु राज़काजः: ने करा पुल शुभ
केबनको:भी पूज़तेंहें २ पजनकरि देवंन्सों भ्वधिद्वितमन्पवत्त-किः खम समागमकबहोई भाव-देवनसों मलाँगत कि कुशल पूर्वक कवरघुनाथ जी मिशिहें इसभाति ग्रोसाईजीकहत कि झवधपुरमें सब्रज्जोग मुनिनः सो अतक्षारण:किहे बसेदें ६। १ २६ ॥ कुंडलिया ॥ परसातमप्ररत्नह्मजों सर्वोपरिप्रर्रूपत्यहिकहिनसकतयशनाम ॥ कैडिनंस
“ टी०' दी 5॥ उरधरि औरघुवीरंपद गुरुपदरज शिरधार। तिलंकरचों
आशय को निर्मेमतिकी अनुसार 3 सुंबंरसंखद / शिलाहैं त्तापर सुघुबीरं बैठे कामंद गिरिते सील्लभरेपर - मंदे।किनी
कीाराके बींचमें धंवल्रंग पत्थरको जो फ़टिक शिलताहैःसो सुंबर-भ-
थौत् सम्थर विक्षन इवेत चमकदार इतिसवांग सुठौरबना पुनश्सुखका* यकप्मर्थात् समीपही घवल ००३2 व नग्न 5 बित्तफूलें फले वितानसे तिनपरं भनेकभाँलिकैप्क्षी भाँति भाँति बोलिरहेहें तहाँसुगझुंडः घमत्रे हें शीतलसंद सुगंध
इत्यादि सुखद है लापर जनकनंदनी सहित रघुनंवन/ बैठेहें-
फशथ कक
्य्न्त हैं जिनकी छबि लखि देखिक काम रंति लजात. भापनी शोभा तुच्छ मानत २ लखिसाजे रति कामतन अर्थात् श्रीराम जानकी नहीं हें काम रतिहटें ते नवीन रीतिते झापने तनको साजें हें इत्यावि इंद्रसुवन भरमे- जंइडरको पुंत्र जो जयंत ताके इसभाँति को श्रमभयों ताते दुखददुख॑देन:
०-26 -३.444 ९०-4४ ९२2४५७७०६४५४०३ जानकी सुखद फिक शिक्ञापर बैठे दें तबै जयेत दूखदभया सो आगे कहते ते है. ११॥
. 28+-शटलक3०००६४-७००५३४९७०८ ३ रुघिर
कीनक्रोधर्करित्या -गलोकलोकनभ्रमिआयो।मंतिगतिविह्॒लविकलमोहमाया अरमसायो २ मोहअंधनारदलसरूयो परायसीखपार्यनपरयो । >अहित्राहिरक्षाकरोसमुभिमनुजञ वगुणकरबो ३१ २+ “टीडछ॥ मनुज समुक्ति रघुनन्दनको मनुष्य विचारि जयंत्नने भवगुण अनीति करचो क्या अवगुण करघों काकतन चोंचहत्यो कौवाको त्तनघरि जानकीजाफे पांयमें तेहि जनित रुधिरदेखि क्रोधकरि सुमन को शरत्याग्रकीन जानकीजीके पांयते रक्त बहतेदेखि प्रमु जानिलिये कि जयंत इसाराबल देखने हेलु दुभोव किग्राहै यहं विचारि क्रोधकरि सुप्रन बाण तापर छांडेसांनसमें सींकबाण लिखाहे सोभी गाँडरः मम क 77 हैअभिप्राय यह।कछि कोमल बाणत्यागे 3 जब प्रभु क्रोधकरि त्याग भयतेसागइंद्रपुर;कैलास, सत्यलोक इत्यादि
बचारा न देखा न ताते भयतेमतिविकलबुद्धि
2 “2. १3 अम्रते गतिविहल झश्षीतू अत्यन्तवकिजानेतेभागनेकी
शकरि भरमावत फिरधो पअर्धात् अज्ञानते ईैश्वरमें मनुष्यभाव सानि- बिकल्लहे भागनापरा ९ सोहबशत अंधे विचोर . त नारंद लख्यो जयंत को देख्यो- तिन पुकारि क्यो कि झनेत॑
टी०। यद्यपि जयंतने बड़ाघोर कर्मकीन भाव भागवतापराध क्षमा करिबे योग्यनहीं है चाकोब्थ करनैउचितरदे परंतु अप सो बाण अमोषद हृथानहीं जाई क५४:०२०५: ३2 एकनेत्र हीने तातें रुपानिधान रघुनेदनकी कोहे जो भूंतमात्र रक्षा करिवेकी आपहीको सम मानना सोई रूपा है यथा ॥ भंगवंद्गुणदर्पणे 2/088२%:४३५७७४५६०%. १८
थ्यसंधानंक्रपासापारसेश्वरी ॥ इतिकृप्राभरे गा अजब ताथजी तिनकी समान 20200] -शरणागंतंको पलनेवालों बरजोर अरष्ठ बली
48 8 52९ कौनहें एक हैं ५ केसे बर॑जोर प्रभाकर बज सहिवर्तिमर कम
कह: ७3 अर 44002 सं द + उपपत पाक 5 हज. टी० । लष्ण जानकी सद्दित रघुनन्दनको प्रणाम करते देखि ऋषि मर: आतनन्दें दे हुंदयमें लगाये भेंटतभये पुनः मुदितंसन आनंद लहिंत ् + बैठारे अमिसत कामपूजे भर्धात् मनोवाछितफ़ल चूणे भाव जग्र योग तप साधन जिसहेतु करतेरहे सोई प्रभुके दर्शन प्रसिद्धपाये- $- यथा रघुनाथजी को पाय मुनि अभिमत-काम्रपूजे तथा मुनि पत्नी झनलया जानकी जीको बुलायलीन निकट बैठारि झादर पूवेक नितज़तन सुखदाई पटदीन जोसदा नवीनबनेरहें भरु सबंछतुनमें सुख देनहारे ऐसे दिव्य पट पहिरनेक्ी दीन २ प्रथम सुखदेन हारे झसकेउ त्त- मः्उप्रवंशदन्हे पुनः पतिब्र्त उत्तम संध्यम नीच अधमाद़ि जो धर्से है विन सबको विध्रिवत्-बिस्तार ःलहित उपक्शदये:इत्मावि ऋषि आनंद लहिताओोंदे पुनः सुनि/आमवरकरि पूजनादिकरि श्रभुकी स्तुतिकीन्दे व अंज्विमुति भादर स्तुतिकीन्दे अन्यत्छाषि भांनेदते भेंठतमये ३.।:४ ४
भूं5। बिंदांअन्रिसोप्रमुभयेसियालघणरंघुराय। चलेविपिन॒आ फ 2320 अल १ महामृदितमनपायसकेलमुं “38 निर्भेयजपतपकराहियोगमखहेमब्रिचारी २ +«- हामविचारिसभारिहर्ाशिप्रआदरसोंदयो.॥ मैगल्मय - काननभग्नोविदाअज्िसप्रज्रभयो ३ ।५४- 20% 4 भत्रिमुनिसों प्रभु बिकेनये पुनः जानकी ०३४४7 - बनमें आगेचले सुखंदपाय संब ससुश्तिमनन 72270 ह2052%] 6०६2: 2:%/8>घम॒ महँं आनंद ४ पार «८०५५-30 पसुदितमनभये मुनि: त्ता। मेंत्र जप तपस्या अष्टांगयोग मरे जोग साधारणहोम॑ इत्यादि विचार पूर्वक होमादि
प्ररमारथअरूुयोग
5, रतिऋतुपतितीनो
४६ 'कीनो:ए नरतनकीनोबीररसशान्तओरशबृंगारमनु
#75“>शेषसुरधेनुकी ज्ञानभक्तिवेराग्यजनु ३४१ ०७॥ शाँत्तरेस: असर से उपमाकड़त
“दी50 पंचक्टमें प्रभु भोस
परमंसुकु सारी राजकिशोरी ते व हब परम शत बुद्धिलगावत इसे जञानकीज्ञीको सरस्वती: .. यथा मनुमदाराज बिधिवत् धर्मको पालकरे प्रजनकोभी थर्म में अँतर्में ऐसा परमधमेगदे कि ईश्वरको स्वार्धान करिलीन्दे लकद्ष्मणजी जन्मतही रामसेवा घर्मको दृढ़ गाहे औरनको: भारुढ़
बनवासमें सेवाकरते हैं इति परमधर्म घारण
जल स्वोधीनकिहेंदें इसदेतु लक्ष्मणजीको मंनु्करि कहे
हूँ उपमा नहीं मनभाई काहेते वहा सरस्वती स्वायंस्त स्वामिकत उत्प-
ति उपदेशकर्ती हैं मिन्नवत् किसी के नहीं हें भरु रघुनंदन जीवमात्रके
सुद्ृव दें डपमसाकहत करशर चाप हाथनमें ब्राण-ध्नुष
.._ लीन्हे महादेव भ्ररु गणपति तिनके संग गिरिजाहें अर्थात् यथा ज़ेवककों
. जुध्ख महादेव नहीं सदिसक्ते हें बेलपत्र अर्क 22०८८ निदाल्लकरियेतेंदें तथा ज्ञो आरत्तज़न जो एकबार प्रणाम्र॒करि
| नर सनुष्यकोतन धारणकीनहें हें अथीत्- परमाश्र-कहीपेरलीफ: _
| साधनतामें/चारिनेद प्रथंमस्लोकते विराग़ दूसर विवेक झसार स्यागरिलारः
| ग्रहण करना तीसरे पट्संम्पत्ति यथा वासना त्यागशंमदे इन्द्रियनको रो कनादमहै धर्मानुछ्ठान तपहै दुख सुख सेम धमाका गुरु वेदातस
| विदवास अंडाहे चित्ते एकाग्रता समाधानहे पुने;चौमेरी सुक्ति निश्चय-
, होके यह: मुमुक्ष॒ताहै यथा लेत््वबोध प्रकरण बेदोंतेःसाधन चतुएयंकिम
, निश्यानित्यवस्तुविवेक/ इद्ा मुन्रार्थफलमोगविरागेःशमदखा दिषिटस पत्तिर मुमुल्लेत्वंचेतिसयथा निः्पस्त्वेक अह्मतदबतिरिक्त सर्वमत्ित्ये-अयमेवर्ति स्वाइसिसिबस्तुतिवेक: पाटिल » किए बे * 'दस्छाग किक कम
हैकि/' 5१४38 सहित ईदवरमें बिर राखनाः सो ज्लक्मणजीमें ततते भ्रभुके समीप लक्ष्मणजी केसे झोमितहहोते- मर तन' धारण किद्दे योगहै-पुमः प्रीतिमें:भी 3८.
अगये प्रेमपाशक्ति पुनि लगनलागअनुराग] के विभाग। मम तव तव मम प्रणय यह सोम्यदहिं तिहिहो- इ। प्रीति उमग सो भ्रेमहै विद्वेल दृष्टी सोइ॥ चित अलंक्ते आसक्ति स्वद बकटक दृष्ठी ताहि। बनीरदैःसुधिलगनकी उत्कंठाहगर्माहि॥ जाक्रेर्सेमें ५ नो: जासुप्रीतिमें.
हल 2 ते रंघुनाथजी केसे शोनितहें मानो हे | ॒ से कीलियेंदपरिपापके
दो०॥ हे
कप दनदें किब्रों कक्छपजाहें पुनःशेपजीऐसी दयाधसंको घारणकिदे जामें को दितहै कौनभाँति कि नीचेतों भेगवान्की उय्या।
औफो जार चांक! आर हुक हे जोक के मर न हे पल 'धर्ममें पुनः निर्दल : | ५
आारणकिदे कि एकतौ' मंभार थाने पुनः भोचार्यहै पातांजलि' भादि भंनेक
_चध बनाय ताकी द्वारा जीवनको परमार्थ मेल गावतें हें तथा 'लक्ष्मणजी
: जीजे २ राव्रणभगिनीजानिके स्मोसंगकरिकेसदन । सुख संपतिसिधिंपाइहो 24:%82% “००० ३।११४ डी% | शूर्पणखां रासलखि कर. ४५ (24-74 वचनकह्यो _३४/ खवाः ५५ ०० अल 2४ करती भर्थात् युवतिनके लज़्जा अधिक होतीहे तन' वचन कहतीस सऩ््जा तातें जो मोहितभी होती: हें तो प्रसिद्ध नहीं। कहती दें मनोरथकी चातत- देखाबंती हें भाव पृमिधूमि कटाक्ष करि देखना हँसन्रा अधवां गूढ़ो्तरदे डरकोहेतु जनावना इंत्याद़ि युवतिनक़ी रीतिहे सोतौं नहींकिया काहेंते छद्धाहै ताते लज्जाहीन है पुनेः कुरूपहै ताको कोन्रपूंछे-इस हेतु अन्तरमें बलहीनःकटाक्षादि कैसेकरे भर लक कल 2 2०928 5657 9232-4स्#22%407:33-: 'प्रतश्यास सुनहु उरमें मदनबाण ल्॒ग्यो सजल सं हे राजकुमार सुनिये मेरे उरमें कामको बाणलग़ो/ भाव आपकोः ५ मेरे -ऑसट अं ०४ रट5 हैलो 3०५७“ ०३०८७ 4 बचन सुनिये अंगीकार कीजिये $ दे घतबत् इयासकुँवर अब मोदिं दासीकीजै झाजुते मोको ग्रथर्वी बिवाहितापत्नीकरि जातिये- काहेते कुमारिहों पुनः छबिधास पुनः रावणकी सगिनी गनिल्लीजै अर्थात् एकतों कुमारीहों अब॒हीं मेरा बिवाह नहीं भया पुनः छबिभरी-मंदिरहों मेरारूप 24 कई के कट राक्षसराज , रावणकी बहिनिदों
कुमारी स्वरुपवंतः उत्तम कन्याहों (2५ ३:७५ &९४४ ने. करिके घरमें:। ०० |
साफबचन सख्ती नहीं कहतीहै तृ-ऐसी निर्लज्जहैं कि बिना चीन्हे जाने पर 2 केश म आंगतीहे तो तेरेसमांन में मनिरलज्ज-नहींहों ९ तोहि
'पकरिलेट कब बोले प्रमुकी छवि लाख स्वीग सुंदरता देखि 'प्रेथम दूत पठाथ दूत आय रघुनंदनसों यहब्रात कहे कि नोरि
5 234 हि जी ४०५ मेंट दिता नृप्राजाखरको !
अति न ख़रादि जाय राजकुमारन सों
खंरदृषण त्रिशिरादि सबज़मे परंदें भाव जिनको अकेले सबको मारिदारे इति बनुदें ३। ५
अहि जो सर्प बिलारि छल हेंतुनवै पुनः छल्यों भषौत्
तुब्नगुण बा नवत ४४४: सफलकहे तवत पुनः दुए जबं।किसीको घात
चाहत तब॑ नवत यथा अंकुश नयके द्वाथीको मान तूरि देत तथा धनुष जब नवत तब बाण प्रद्रहोत संपे जब नवत तब काटत बिलारिं जब नंवत तबे चोटकरत इत्यादि छल्लराखि नवतेदें पुनः दूसरे की छल्पो गोफिल करि घातकीन्दे उ तेसेही कंछु मात विच्ोरि छल्त राखे साथनेको प्रबोधंकरि रावण रंथपर चढ़ि मेरेडियाचल्यो दै३। ९३ ॥
ते देती, तो एक
का करता है 3-ज्ब, रावण अमिमान सस डरते हें सोसुनि मारीच समुमि मनते
मारिडारी प्ररु उद्दोगये माराजैहों
उहोकी मृत्युभली है इति मनमें बिचारकरि समुक्ति
कि यहिमारे थल नरकयहिंदण रावणक्ेमारेपर मोको
नरकस्थानसें वासकरना परी पुनः रामकर सुरपदभारी रघुनाथजीके कर माराजैहों तब-भारी-सुरपद उत्तम देवनकोपद- सल्यल्ञोक
बासपैहों २ रघुनन्दनक हाथ मरेते भारीलुरपद उत्तम देव-
यह बिचारि जाय शिर॒राम तहँचलल््यों मारीच-शीशनवाय
हैं तद्ांकों चल्यो इसभांति रावणकढे कि सोहिं क्याज्ञान
संग्रल्ते अति
हॉनदार है कक तत्ते
यह मार्रच है यंद जानि जो मायामय छाये। लक्ष्मणजी को लॉपि भाव इनको रखायो ऐसा चले २। २५॥ &
सुमिरततुम्हें ज बनुबाण॑धरि ।
३+१२६॥
टी०१ भागंत संते बनमंदूरि निकरि रासकठिन धनुषमें तानि मसरतसमय
शो कौन्यों छ्तदेंतु पुकारे ८ 3०००६ पटपव अंडे २४०९५ है।यहसंदेद हमे करतीह। सो
3४;
टी० । रेखाको नांवि जब सिय बाहर झाई: तब॒रावणपकरिक रधपर चढ़ायलई पुनः भय मगनदडररलिंधुमें बूडा गगन आकाशमार्नह्दे चल््यो भय बंश इतउंत्त संबं विशमक्षों देखतजात भावपाछे की ऊधावातो मेही ५ भव तेइतंउत्तवेखतजाते अरुजब जानकी जान्यो वे रंवेण है.
इृस्चिलेगयों' र जो भषुद्रिगयो तौं 77 तुमको रॉबण मोकोहरोलिदेजात इत्यादि रेखानांचि जा *रावणके वर्शभई देस्लिचल्यो
सुनिखगचल्यों ३। ३० ॥ मू०। अंतिरिसरांवणरएरच्योतीक्षणकाढ़िकृपान । ... महिखगमिस्योकहिमुखकृपानिधान १ कहिमुखक्रपानिधा नसाजिस्येद्नसियलीन्हीं) लेनभप्थकिरिचल्योंगीधबि झलगतिकीन्ही २ बिहलगंतिकपिसियलखे -नूपुरदेकंपि करसच्यो । तंरुअशोकतरंराखिके अतिरिसरावणफि
रिस्च्यों ३।३१॥
> ढी०॥सेभरिकेउठो भत्यंतरिसकरि सवणपुनः रणरच्यो युद्धकरनेलगे तब तीक्षण रृपाण काढ़ि पैनी तस्वारि-लिसारि: पक्ष हस्यो पखनाकादि डारेसि तब घायलडे रुपानिधान मुखकदि खग महि गिरयो छूपागुणभरे रघुनाथजीको नाम सुमिरत संते पक्षी जदायू भूमिमें गिरिप्ररो, ३ जब मुखसों रुपानिधान कहि जठायू गिरा तबरावण स्वंदनसाजि सियल्वीन्हो
| हुआ तापर जानकीजीको चढ़ाय लीन्हेसि नभप्थ झकाश सार्ग अरू गीथ-व्िहल गति कीन्हो घायल करि.जटायुको बेशक्ति
करिदीन्हेसि ३4०४9 "न रही २ रावणके लिदेजात संत्ते लिखकी कपि बिक करुणा ब्राई ताते रास राम उच्चारण
त्तापादि
जोनकी मेरे उर अंतरमे बिरहरूप अग्नि प्रचंड द॑ःखदीयक होइंग॑
२5% 2८ 2 बिरहोग्नि प्रचंडपरैगी तुमअकेले उन- आाः लष्रण प्रभुकेपंदगहि
भथीत्बरबस सहारानीजी सोको पठाये &:८०«४«५०« इसीभांति शोच
ते शनेन्न आँसुजलः 5: मद्ी खोजत-पवत बन तड़ाग सूत्ति डत्पादि-सर्वश्न जानकीजीको ढूँढलः फिरत्तेदें आगेजाय देखे रुधिर रक्त डूदा पनु परघो देखि प्रभुकदत- हेलपण यहो बात नीकी-नहींदे-भाव झमेसलीक़: बस्तु: है कछु भचाह सुनबे,वेखने भाई ३-३ २२ ॥
53 '*इ्तुतिकरत दरोलागिजीवनरहेउऊः “दशलामिजीवनरहेउ ६
उसं० जाय बीले हेसवुरय भापुके दशलगि देखनेहेतु जीवनरदेड
अबतक जीक्तरहेड आज उदयभई ऐसपात्र मेंलेहीरहों 'जिवादि जिनकी सेवॉमें लंगेरहर
बेंडीमाग्य उर्देयमई 9 सोंई' प्रभु मोकी गोद लिये को मिलिसंक्तीहे इत्यादि कोहिं पुन: रामकॉ्दि ँ रापरामकहत्गावराजप्राणत्योगिंदिया पु्तेः तुरंतदीऐसो हैंस्की दिव्यरूप 4 3्४ड+2,:० ३४५ गद्मप्रदादि अख्सुदाये| सगोमीत ९२४३० प्रकांसमान गा
बंनमें आगेचले ४०४५५ ४४३०८: घरकोगये १ बनबिषे आपने घरमें शवरी आवतदेखि प्रणामकरि भ्रध झासनादि सबउंपचार सजे अथांत् आसनदे स्वागतपूंछि अध पाद्य आचमन स्तान गंध दल फूलचढ़ाय धूप दीपादि करि मथुरफल भोजनदे पुनः रघुपतिके काजे पान (32, आचमन हेतु सुंदर जल भानिधरें ३ सब सप्रेम सद्दितप्रेम सव उपचारकरि पुनः पांयनपरि कहत दर्शपाय कोन गतिपावे कादेते राम तुम्दारो रूपलखि हेरघुनाथंजी आ्रापुको सुंदरस्वरूप देखिके गीधपाति जठाबू परमधामकोगयों मुक्तिस्था- नपायो इत्यादि स्तुतिकरी ३।३५॥. ... मू०। काठसाजिरचिकेचितासियसुधिकहीवहोरि । शवरीजारि सुरगतिगईक्रियाकरीप्रभुकारे १ क्रियाकरीप्रभुकोरिचले बनदूनोभाई । मुनिगणमिलतअनेकदर्शअभिमतफलपा ई २ पावहिआमिमतजीवजड़करहिंयोगज्यहिप्रभुनिता साजिसाजिसुरगतिलहीकाठशावरीरचिचिता ३। ३६ ॥
टी० । कांठसाजि मूरईधन एकत्रकरि ताको चितारचि बढोरि सिय सुथिकहि जांनकीजी के घ्िलतेको उपाय बताय शवरी जरि सुरगतिगई चितापर बैठि शवरीवेह भस्मकरि पुनः दिव्यवेह द्वे यधादेवनकी गति अथोत् ब्रिमारूपरचढ़ि परमधामकों गई क्रियांकरी प्रभुकोरि कोरि कहे करोरिन विधि बिधानसदित शवरीकी सृतकक्रिया रघुनाथजी किंदेउ ३ क्रोरिनभाँति प्रभुक्रियाकरि पुतः दूतीभाई बनर्मझागेकोचले मार्ग जात समय मुनिनके गणभनेकन मिलतते प्रभ॒ुके द्शते अभिमतमनोबांछित फलपावते दें २ मुनिगणतों सुझती दें तिनके. पायबेकी कोौनप्रशंसा है काहेते ज्यदिश्रधु नितजोने प्रभुकी प्रार्पाहेत योग क्रियाकारि 85236. न ० ड्करतेहेँ सदाध्यान लगावते ते जो दरशतेअभिमतपाये ताकी फौनप्रशसा 24 * के दशपायेते पशुपक्षी आदिजड़जीव अभिमतपावते हें भरुम तो योग क्रिया समाधि आदि साजिसाजि त गतिपाई बिमानपर चढ़िहरिधामको जाते हैं यथा का गई ३। ३६॥ हे के 270 8 40 मू०। रामसिः
२
- संते श्रीरवुनाथजी सुंदरे पंपालर समीपगये कैसा सुभग तंड़ागढे जामें
: हैं तथा सुंदरी बाग ल्लगीहें लहां मुनिगण सदन भझनेकन आश्चम बनाये 5 नेक
+ | प झ क्ष क्र _. दी० । सिय खोजत रामसुभग पंपा तदागगयें जानकी जीको देढ़ेत . स्वादिष्ट असल शीतल इति सुन्दर जलभरा हैं ताक चहुंदिशे तरू आ-
ज्रादि अनेक दक्ष खगेहें तिनपर ब्रिहंग गुकलारिकादि पक्षी बैठे हें अथवा चक्रवाक सारस हसादि जल सम्तीप बेठेहें तथा सुगसम॒द जलपानकरते
समूह मुनि बास किहहें $ जो बागनमें सदन बनायें मुनिगणः जपंतप मतलाई शुद्धंसत लगे सत्र जप-योग क्रिया तपर हैं ऐसा सरोवर उत्तम तालदेख़ि रघुराई मुदित मज्जनकीन लपणलातल सहित श्रीरघुताथजी झानन्द सन्र संद्वित स्नान कीन्दे २ जब श्रीरघुनाथ जी मज्जनकरि बैठे ताहीसमय प्रभुके ढिग नारंदमुनि आवैत भये इत्यी- दि रघुनाथजी जानकी जीको ढूंढत सेते गोताईजी कहत सुर सुभग सर देवनकों निमोण किया हुआ सुन्दर जो पंपासर तहांकों गये ३॥ ३७॥ कुगदलियां .॥ पाछेनेतिपुकारिश्रुति नितगावतगुणगाथ । बिधिंहरि मा ॥ नितनावतपदमाथबीरगिज्यदिध्यानले
& आर; वपतमलफििफास किक कला छ 82 कप ४ & 2520: ५7%. 5.
पपडतनपकतमसतवना 3 अत ९०० १ कोतुमकहोबुझायबिपि
का भोने २ तजेउमवनआयेबिपिलनारिगईशोधनलहत । _. खोजतेहमडिजकंबनतुम चलेबिपिनलक्ष्मणसंहित३॥१॥
दो० । सियरघुबर पद उरधरे गुरुपद्शीश नवाय दा किप्किधा शुभ कांडको टीकारचों बनाय १ टी०॥ पंपालरते उठि लंक्ष्मणं सहित बिपिन बनमें झागे चल्ने तहाँ सुग्रीव के पठायेहये प्रवनसुवेन हनुमानजी आयमिले कौनभ।ति विश्र रूपधरि पूछत भयों 28: बुकायके कहौ भाव कौन बर्णाअम हो कहांते आवतेहौ कहोंको जाहुगे इत्यावि सबद्दाल समुस्कायकेः काहेलेंबुकायकही कि सलोन सुन्दर सुकुमार शरीर बिनपनहीं' विपिन बनमें फिरतेही जहांपाषाणमय-कठोर भूमि कांटा.कंकर प्रहारत्रहांफिर ते हो इसद्देतु पूछतेदें मापुको कद्दों इद्धां बनमें क्याकाम दे इत्यादि सुनि रघुनाथजी बीले कि रामलद्ष्मण 0 लि महाराज दशरथके पत्रहें तासु आयसु भोनेतजि ताही धरत्यागे इह्दां झायेदें २ पिताकी आज्ञाते भवनतजे बिपिन आय धेचबढी में बास कीन्हे तहां हमारी नारिं हरिगई चाहते हें इत्यादि हमतो
॥ ण मनअनुमानिले सुग्रीव मिलाइयो अद्भुतस्वरूपता ते-
ि सुलभ सुभाव इत्यादि गुणदेखि झनुमानकरि जानिलीन्दे . कि भूभारहरणहेतु परब्रह्म अवर्तोर्णमये सोई रघुवेशनाथहें ऐलाबिचारि प्रभुकोक्षेके पवेतपर जाय स॒ग्रीवसों मिलाये कौनभांति मिलाये परस्पर कथाकद्दी जब हनुमानजी दोऊ विशिको हेतुकाहि दृढप्रोत्ति कराये तब दोऊजन आपुसमे झपनी आपनी कथाकहे कोनभांति नूपुरदये बखानि जाभांति जानकीजीको ध्ाकाशमाममें देखेरदें सो सबद्वांल -कहि सुमीव प्रमुको नपरदीन््दें भाव में रामराम किहेडँ तब ये झाभूषण डारिगई १ परबशता बिलापादि सबहाल बखाने जब नूपुरदये तिनको चीन्हि झ- घिक करुणाभई ताते रामलोचन रघुनाथजी के नेत्र आंसुजलते भरि . आये इंतिबिरह करिके प्रभुक्ोविकलदेखि कीश सुय्रीव बहुत विधि बचन कहदि समुक्काये २ समुक्काये हे प्रम्न॒ धीर्यराखिये सबभाँति उपाय
करि जानकी जीको मिलावत्र इत्यादि जब सुग्रीव अत्यंत करि समुकाये तब लषण सद्वित रघुनाथजी सुखपायो मनमें संतोष कीन्दे इस भाँति जब स्वाप्तीको चीन्हो हनुमेत प्रणाम कीन्दे तब प्रभु उरमें लगाय मेंटे तब हनुप्तान् ले सुश्नीवको मिलाये ३॥२॥
। मू०। प्रभवेलेकारणकवनवसतबिपिनकपिराज । कथाकही ४ सबबालिकीकोपिकहारघुराज_ + कोषिकहारघुराजबालि एकहिशरमारों । संपतिऋधितियसहिततोहिंकपितिलक
बारों २
00532 में सामग्री पुनः तांकीतिय सहित हे सुय्रीव तोदिंक रे
अन्नादि यावत् परमें सामग्री पुनः ताकीतिय से
तिलक सँवारों बानरनकी सारी तिलकतोकोदेहों २ झरू जो किरष्कि- था भवनमें नूपता तिल क काल्दिन सैंवारों किप्किधापुरमें राजमंदिर बिपे राज्याभिषेक जो तोको काल्हिन सँवारोंतोः :3०क:घ बाणहाथर्में न धारण राखों काहेते जो संकटमें सहायतों न
कवन कारण मित्र करिये भाव मित्रकी अवदय सहायंकीजै ३$॥ ३॥ +_
मु० 700 (& न्योसबहिचल्योक्रोधिरएणंधीर १
5:88 +3055533 शरणागतप्रणसमुभिबाएमारबोरघुराई २ मार शिग्रियोअवनिमुर काइयो । रामरूप- लोचनपुलकितबसुग्रीवदिखाइयो ३ 8 ॥ 5 ह7० ० 7० ० टी०। जब रघुनाथजी निश्चय मारनेकों कहा तब प्रभुको ४० महाबली बीर जो बालिताकों दिखायो कौनभौति गजिनगर सब प्रभुको दूरि ठाढुकरि सुर्रीव किर्ष्किघाके निकंटजायमर्जे सो सुनि नगरबासीजन सबहिन जान्यो कि सग्रीवहें तब रणधीर क्रोधिचल्यो रण में धीर्यमान बालि सुग्रीवपर क्रोधकरि सन््मुख चल्यो १ सुग्रौवतों खडेन रहें जबरणधीर बालि क्रोधकरि चल्यो तब दूनौभाई लरे महयुद्ध होने लगा तब शरणागत रक्षक आपने प्रणसमुम्ति सुयीवकों विकल देखि रघुनाथंजी बालिक उरमें बाणमार्थो २ केसा प्रभु बाणमारे सत्यसत्य प्राणघातक तिसबाणतेब्यथितबालि मुरमायकैअवर्नि है भ्रमिषै गिरयो पुनः रामरुष ल्लोचन पुलकि भूमि गिरा परन्तु भीरघुनाथजीकों श्यामसुन्दर स्वरूप'
देखि बालिके उरते जो प्रेम उमगा ताले आंसुभरि आये इसभाँति प्रभुकोसंगले सुभ्रीवने
जाकर -# हीं हड्यामसुंदर स्वरूप राम छबि उरधरी प्रीति पूर्वक उर अंतर ध्यान थ्िरिराखि पुनः बालि मुखते कठोर बाणी कहत हेप्रप्ु नरगति धारण क़रि क्या हरिसति तजिंदई अथात् दे परब्रह्म श्री- 8 वह ,नश्गति जो! यह राजकुमार रूप धारंगकरि क्या आपुने:हरि भ्राप्रने ऐड्वर्य रूपकी रीति त्याग करिदिया जो सनुष्यवत् सुथ्रीव मित्रता"करि ताके सहायक बनि बिनागुनाह मोको मारा यहँतों तुच्छ रीतिहे-भरू आपुकीरीति तो वेद इसभॉतिकदतत कि समरप्रकाश 'संब ठौर यथा यंजुर्वेदेअध्याय ४० मंत्र ८ सपर्यगाच्छुक्रमकॉयमवृणम अनाविरं६ शुद्धमपापंविद्म कविमनीषीपरिभःस्वयम्भयौधातथ्यतोथीन वेयंद्रधांब्छाश्वर्तीम्यःलमाम्यः ॥ भर्थात् सर्वत्र झखंड सदा एकरस ब्या- पक प्रकाशमानहें कम ज्यादह किसी ठोर नहीं हैं ३ चधा सब ठौर सम 42273 तथा ज़गत्में झप्रिय कछुनाहीं जगत्रमें यावत्-चराचरहें तिन है-कोऊजीव ईइवरको अप्रियनहीं है:सब एकरसप्रियहें- अर्थात् भूतमातर प्र रृप़ाइप्विहे सबकी रक्षा राखते हैं पुतः-जो तव तुमको संसार अप्रिय होये रक्षा न करो तो सक़ज्ञ ब्रह्माणड इक॒रंग बिलाई प्रल्य काल हे ज्ञाई ३ काहेते कछु अप्रिय नहीं है विधि पिपील रचना करी विधि जो ब्रह्मा इत्यादि बड़े तथा पिपीलिका जो चींटी इत्यादि छोटे इत्यादि या- ख़तुजीवें इनसबुको रचनाकरी ताको संगरंगनचाहिये झथीत् जिन प्रभु खराचरको उत्पन्नकिया ताक़ो यह न चाहिये कि काहूकों संगकरि मित्र ०52 मिन्रके प्रीति रंगमेंरंगेरदि वाकेशत्रु मित्रवकों आपने शन्नु मित्र ईइ्वरकीरीति नहीं है मनुष्यनकीरी तिहे जो आपु मोपरकिया व्ीरेघुनाथजीक ईयामस्वरूपकी छबि उरमें ध्यानधरे पुन
६८
.. 'जग्रलिहरे भ्रीरासकदि हे हरि श्रीसम झापुकी ज़यदोय ऐसा कहि तन त्यागकियां सो झागेकहत.३। ५॥..:
चदूषणहरीप्राणगयेश्रीरामकहि ३।
टी० । श्रीराम ऐसा कहि बालिके प्राण निसरिगये: बॉलिकी नारि तारा तथा पुरके लोग इत्यादि सब शोकते वि रघुनांधजी सुंथीव: (68 ४88 यो कि सृंतककरयोंग. बालिको: दाह तिंलांजलि पिं: करो योंगकों भाव सर्पिडी 007, ग्रीव॑ते कहें सृतकक्रियां करी तथा लंक्ष्मणंजी यावत् पुरवॉसी र सबको समुभाये जब सुतकक्रियाकरि सावकांशपाये देनेदवेतु अनुज ल्क्ष्मणजीकी संगकरि प्रभुसबंकों कि| ये २ नगरम जायके लक्ष्मणजी द्विजसकल यावत् ब्रा 3४४ बुलाये पुनः अंगंद आदि कपि बानर मुखिया यावत्रहे तिनकों समुझाय सबको संम्मतलैंके अधीरतामें धीरयदिये कौनमाति संमभार्य ओऔरामकरदि प्राणगये तति बालि शोचदृषणहरी रघुनोपैजाकि हा हल भई दृषण पाप नाशभये रामनामकहि प्राणनिसरे ताते परधामें ताको कौनझो चहै ३। ६ 0
सू० । रामनामकहिनृपकरोतिलकसारिशिरताज निधिजगतमेंबिरद्गरीबनिवाज १ कियोसुग्रीवसखारी .। गिरिव तभारी २ कंपितडरनिरमयनहींजातदुसहज्वस्डरज़स्यो धामबामनृपग्रामकोरामनामकहिनूपकरथो के ॥ ७ फएे
टी०। रामनासकददि लक्ष्मण सदहितःसब समाज रामनाम णं करत संते तिलकसारिं शिरताज तृपकरबो लिंहालनपर! बैठारि त्रंयंस लक्ष्मणजी तित्तककीन्हे पाछे सब तिलककीन्न्हे इसभाँतिःतारा समेत सुधीवको बानरनंको शिरभोर लबते श्रेष्ठ नूपराजा बनाये: फऐसे/गरीब निवाज विरदवाले ज़गतूमें रामरुपानिषि दें तहाँ कृपागुणको लक्षण यहहै कि भूतसात्रको रक्षाकरिवेकोदमहींसमर्थहें यथा सवक्ष सबने लि लामर्थ्य॑सः पुनः केसहू गरीब शरण आवै ताको निवा।
इति गरीबनिवाज़ीको विरद व
भया ताको क्ल्5४४ बवरयवै झापनेधामको पठाये पुतः अंगदकी बाँद पक- 37722 [ ताहीः . युवराजञपुददिये तारा आर तद्गैशर णुभई ताको विधवा"
शवुनेहेतु सुम्रीवकीपल्ली करे तादूपर राज्यातिषेकसमय इसी की ग हठिजोराय बड़ी मद्ारानी पदका ऐश्वर्यदिये पुनः जो कहिये कि अपराध बालिको.प्रभुसारे सोभी ब्यर्थ है काइते वाकीखी समुभा- इति सो न मानिसि प्रभु फूलम्ालदे पठाये सोभी न मानिसि इत्यादि आपत़ो बल बीरता इंद्रक आशीवीवको अभिमानीरदा ताको मिठावने बाणमारे परंतु जबशुद्द्े शरणभया तब प्रसिद्धकहेयथा। अचल | >> फ68 । तबसारना कहाँरहा परंतु उत्तम मृत्युज़ानि बालि आपकी नहीं ग्रंगीकारकिया तथा जो सानत्यागि पृवदीशरण भावता तो क्यों स्ारते ताते बालि आपनेदाये बाण चोटसहे पीछे आपनी खुंशीते देहत्यागा तो बालिको नदींसारे संदेदह थादी करनादे इति गरीबनिवाजी को ब्रात्ावाला रपातिधि जगतें रघुतावेजी एकद़ें दूसरा कोऊनहीं है १ केले विरद गरीब निवाजहें कियो सुप्रीव सुखारी सुग्रीब ऐले गरीबको प्ररिपूर्ण सुखीकील्हे केसा सुझ्री व गरीबरदा बालिके ढरकरिक भारीकपित अंथवा भारी डर बालिकोरह तातें कंवितंतन विकल्न विहाल गिरि पवतन में बनमें भाग भाग फिरतरहा २ बाजिके डस्ते ऐसकपितरहै जो किसी समय निर्भयनहीं डरबनेरहै ताते दुसह जो संदिनजाड ऐसे मानसीज्वर करिके उरजरंघो छाती सद्ाजरें करतीरदे तको थाम थाम नूप बराम स- दितराम॑नामा कहिनूपकरधो ग्रासजोकिकिंधापुरता में घास ज्ञो राजमंदिर में लिंहासनरद्दा तापर बैठारि पुनः नृप्तराम जो राज़पल्ली:तारा त्यदि सहित केले राजाबनाथे तहें। झापु नहींगये लक्ष्मणको प्रठाये तेरघुनाथ ज़ीको ज़ामकहिं प्रभुकीझाज्ञा सब॒कोसुनायराज्यामिषेक करिदीन्दे ३। ७॥ म॒०। राजनीतिकहिप्रभुरहेशेलप्रवर्षणझाय। वनुजसहितसुद॒| : + 'शसदनराखेदेवबनाय १ राखेदेवबना 2 अलअा<-० तप त्ग््ह ड्ढ भघोरः
(०8 2१-
त्यावि राजनीति कहिं पुनः
तहाँ देव इंद्रादि सुंदर सदन -
संदेहहै कि न चित्रकूटमें बनायराखेन पंचवटीमें बनाय
कारण पूर्वही सदन बनायराखे तहाँ चित्रकूठमें आये |
है अना०बहभक०4क् बे तन 9न ज 5०० 35 बनिगया भ्ररुयासमय में धर्षा ऋतुआई ता
करि देखे कि दक्षतरनहीं निर्वाह द्वैसक्ता है इसहेतु प्रथमद्दी गिरिमें गुद्दा -
बनायराखे तामें प्रभुवास करिवर्षो- की सामग्री बणैन करत किहेःलपण
देखिये वर्षीऋतुभाये ते घपनघर्मद नभधोरमेघ घसंद्रि आकाश में भये
कर शब्दते गजते हैं अध्यारी छायरही लो केसे ४०4 %८ -०- न
पर निशिरात्रीधाई २ केसे निशिधाई नीरबुंद बाणनिगढे अथोत् प्रापना
शब्ुजानि रातिसुर्यनपरधाई कोनभाँते जलबुंद रूपबाणन को गहे भांव
जलबपंनेके बुदनहींहें मनहुरात्री सूर्ननपरबाण प्रहारकरती है ताकीभय
मानिरबिभजिगये अर्थात् बादरमें नहींढके जनुरातिकी भयते सूे भागि
गये पुनः तड़ित रुपाण बिजुली चमकत सोई जनुतरवारि है पुत्र: इंद्रथ
नु उदय सोई जनु धनुष हैं इत्यादि अख्रधारण-वीस्ताकरि रात्रीजूर्य
को परास्त किया इत्यादि राजनीती बातो प्रभुररिरदे दें लक्ष्मणजी
भाव शजञ्ञुपै ऐलेही चाहिये ३। ८ ॥ प्जज
मू०। करिमनोजडेराजगतसजिआयोकरिंसेन । असितंपीतसि
है| तड़ितध्वजसुंद्रराजे ।
२ देरी मिवाजेओोप नमक आलम २ रन निरवनपलबपतमनह २ जगत ३३ शक
हे हैं इंत्यावि बिरह वंतनके दुःख देलेकारण लाते स- .._ नोज कामजगत् में डेराकरिरहे हैं $३। ९॥ )
मू०। 3 ललन कल पमंसन्लन 3४-05 ०३०० ।
.. ज्रशरघनगजशीशचढाय १ लपुरंआंये।बाजेनोबतिजीतिकोकिलासुयशसुनाये २ सुय शजनावबितानत॑निबेलिबिटपगहगिरिबसे। मुद्रितकरिपा
- पषाएणजड्सुरपातिकेंगिरिगणग्रसे ३१ १०॥
टी० । बर्षाऋतुदे के सुरपति इंद्रगिरिगणयसे समूह परवतनकों गाँसि
सब पवेतनको पक्षददीनकरिबे हेतु गाँलिलियो है तहाँवर्ष जलके बुदनहीं हैं जनु बाणनकी भरिलगायेहें पुनः घनगज शीशचढ़ाय कहूँ कहूँ सारत बज़्शर जहाँ तहाँ गाजागिरती है ताकी उत्प्रेज्ञा करत घनगज मेघसोई हाथी ऐरावत हैं ताके शीशपरचढ़ेआय इंद्रकहूँकहूँ बज़ंबाणमारते हें १ यथा घनगज शिरचढ़िइंद्रभाये तथामोर हरवलपुरभाये पुरमंदिरनपरजो मयूर बैठे बोलि रहेहें सो यथाइंद्र के हरवल अ्ग्रणीय 8 को आये भावज्ञामें कोऊ पर्वतनकों सहायक न होनेपावितथामेघजो गनिरहे हैं सो सानों जीते परनौबति झानंदबधाई बाजिरही है तहाँ ज्ोकोकिल बोलि रहीहें सोईवंदीजनहें सुयश सुनाय रहे हैं २ यथाकोकिल सुयश जनावत तथातमाल आमादि विटपनपर जो बेलि पल््लबिंत फेलिरही हैं सोयधा शहबंसे बरबल घरबसिलियेतहाँ सांमियानादि
. जानो २ दिग्गलरकंपहिघनसदलनादबाददशदिशिवढ़यो।.. . कपमानमहिगहिधरीकैसमुद्रमहिपरचढ्यों ३ । गे टी । बर्षाऋतु आई केंधों समुद्रकोपकरि सहि एथ्वीपर चढ़धोताते महि मुद्वितकीन प्थ्वीको जलते बोरिम्ंदि दिया काहेते है... भरि नहींहे शर पंजरमहिकीन बाणन के समृह प्रहारें पं भूमि को ताके घंतरमें करि जिया पुनः सरजो तड़ाग सरिता जोनदी इत्यादि में जो सम्द-जलभरा है सो यथा समुद्रको दत्त परा है १ यथाबुंद सोई' एथ्वी को शरपंजरकीन तथा तड़ित बडवागिनि मानों बिजुल्ञी जो चम- कि रही सो मानों समुद्रमें की बडवानलदे पुनः समुद्रमेष रुपते नभ आकाशमें चढ़ि बारिजल बर्षत ताको वेखि गिरिदिग्गज त्रसित गिरिजञों पर्बत सो प्षमि थॉभनेवाले दिशा गजहें ते असित नाम डराते हैं अथीत समुद्रको झाकाशचढ़ि बर्षतेदेसि प्तरूप दिग्गज ढरतेंहें भाव अबहसा- रि बाँसीमासि न यैँंभी इति जनुडरते हें २ प्बतनपर पवनलागे जोदक्ष हालत सातो मानों दिग्गज कांपते दें पुनः घनसद॒त्तनाद अथोत् घन जो मेघ ग्रजत लिनकोनाद आकाशते होत_तथापवन ल्ागे क्क्षनके दलपत्ता ख़रखसाते, दें सो दुल्ननकों नाव भमिपरते होत इत्यादि यथा ढोऊ दिशि के बौरनको बाद बिवाद दरशहूं दिशिमें बढ़घोसर्वन्न अधिकबाद बढ़तजात पुनः किसीसमय जो भ्रप्ति ह्ाजि उठतीहै ताकीउत्प्रेक्षाकरत जनुमहिगढि_ धरी सो कंपित है भथोत् महि जो एथ्वी ताको समुद्रनेगढि पकरिकेघरी रच बैँंधुवा करि राखीदे सो डरतेकॉपि उठतीहै इत्यादि कैषों पर कॉपकरि चढ़चों ३।११ ॥
कुगडलियारामायण लिशेफ ' पावसदीन्होतिलकजगशरदराजराजत॑थलन । परवेसग 7 कर ा४८2६ श्रणामकरि शरदभप्आयोमिलन ३।१२॥ . ही०। वषों पथ्वीपर साँलति करत ताते दुःखदकद्दे भरु शरद सुखद . कहत 7८४4 बीति गये शरद ऋतु केसा शोमिंत होत यथा धवजय॒ुति रूप . साजि ३ पं सिजननझआयो घवलनाम उज्ज्वलबुति नामंप्रकाश भरथात् उल्ज्वल्ली प्रकाशते आापनारुंप लानि सपेदे भूषण पोशाक पदिरि प्प राजा ज़ो श्रदलो प्रीतिपूर्वक एथ्वीके मिलने हेतुआयो ताते तडागनमें - जो कमलफूले तथाकोक जो चक्रवाक ठौरठौर उड़ि रहेहें तथाखंजन - आयगंये ते केले शोमित होतेहें यथा शरदराजके चतुर दूतहें ते। जगंत् में बाजि उठे/बोलि उठे भावजगत् भरेमें आपने राजाको हुक्म सुनायरहे हैं १ यधादूत बाजिउठे तथा चंद्रजनु छत्न॑सुहायो जो पूर्णप्रकाश मान चन्द्रमा भाकाश :में उददित है सोई जनुशरद राजके शीशपर इंवेतछत्र शोभित है पुनः सरिसर निर्मल बारिनदी तड़ागनमें जो-जलग्ममल है गया सो केला शोमित होताहै यथा पांवड़े पावसनायो ब्रिछायों अथीत् शरद संहाराजको आवतजानि पावस बर्षाने राहमें सफेंद बसनके पांवड़े बिछाये दिये इसीपर पांवधरि चलें २ काशांदि फूलिरहे ते केले शोमित होते यथा जगतिल्क जगतुभरे को राज्याभिषेक पावसने शरदकों दिये 'ताहीते लबथलन भृतल भरेमें शरदराज राजतगरद ऋतुकी राज्यसर्चत्र दैगई इत्यादि जबशरदभूप प्रथ्वीकों मिलनहेतु आयो ताकों प्रणामकुरि पोवसगयो बिदाभयों ३३१२॥ ह “मृ० । सीयशोधअबलीजियेजाहुजहाँकपिराज़ । खबरिबिसारी : ४: अऑलअम की पायनारिधनराजवालिथलतु लपमक समाप्त मलएकीजिय। नह २ मन सः पु ।बानरभालुपठा ३। १३ ॥ टी० । शरदऋतुआया सुग्रीव अबतक सुधि न लिंये ताते रघुनाथजी ले दे लपण जहाँ कपिराज सुओऔवहें तदाँको तुमजाड़ कोनहेतु सीय नकीजीकी खबरि अत्र लौजिये पतालगाइये काहेतेजाउ सुधीष इत्यादि ये आपने भोगमेंपरा भरू हमारे बिते ऐलाकहिदेनां कि नारिं घन राज्य
ऊं भाव बालिवत् तुँमको भी मारिहों यह यद्यपि स्कोर तम्ेपलर है कक बॉदपकरि -सखाकीन्देउ. ताको सारनो उचित नहीं है इत्यादि ज्ञानदे.. सनको समुभावतहों ताते-सुय्रीव बचाहै २ ताते हेल्तपण आपु पुरगमन कौजिये किप्किधानगरको जाइये सन - समेत -कपि अथोत् जो सुग्रीवको मन: विषयमें परा विमुखददे 3८-५०: सन शुद्धकरि तब कपि सुग्रीव समेत तुम एकसतिद्वे वानर भालु सब॒दिशि पठाय अब सीय शोध जानकी ज़ीकी ख़बरि लाजिये कहदाँपरदें ३। १३ ॥ ५;
मू०। लक्ष्मएचलेलिवायके प्रीतिप्रबोधरिसाय । बानरभालुबु लायके: गयेजहांरघुराय.. १ गयेजहांरघुराय' मिलेपाँयन कपिनाये। रंघुपतिहँसिसदुप्रक्रतिपुलकिगहिकंठलगाये २ केठलगायबुकायकपिबिनयकरीचितलायके । वानरभालु बिशालभट लक्ष्मणंचलेलिवायके ३॥ १४॥
टी ०। लंक्ष्मंणजी किष्किधाकोगंये प्रथमरिसाय सानुकूलकीन्हे पुनः प्रीतिपूर्वक प्रबोधकरिें संमुझाय धीयदे सनथिरकॉन्दे पुनः सुग्रीवकों संगततेक लक्ष्मणजी चले कोौनभाँति सुथीवचले वानर भालु बुलाय तिन को संगलेके चले जहाँ रघुनाथजीरहदें तहाँगयें ९ जब उहाँगये तब कपि सुधीव प्रभुके पाँयलको शीश नाये तब रघुनाथजी मिले कौनसाँति सरद॒ प्रकृति को स्वभावते दि पुनः प्रेमते पुल्नकि सुय्रीवकोर्गाहि रघुनाथ जी कठमें लगाये २ कंठलगाय मिलिके पुनः कपि बुझाय वित्त लगाय विनयकीन भर्यात् सुग्रीव भापनी भूलको दाल प्रसिद्ध कहिदिये भावमें पशुइतो हों पुनः पॉयनमें चित्तलगाय स्तुतिकीन्ददे तब वानर भालु वि- शांत भट वानर ऋश्ष जे बडेंभारी योधाहें तिन्दें जिवाथ निकटबुलायके लक्ष्मणजीकदहें कि संस सिय पलक हे संबद्शनकोजाउ ३। श्शाः ०8४ 3 न- य्।
कपि सुझ्रीव सब वानर ऋशक्षनसोंकदे $ ज्ञानकीजीकी खबरे पाइबेहेतु सर्वत्र नमक ३. सर्वत्र ढूंढे हे “ह मर जो झायहु तो खशरेलेके आयह पुनः बिना है पंद्रह दिनके बादि जनि आय हमको मिलयो १ प्राणघात देडंजानिं हमें जनि भायमिल्यों बहुरिअंगददिबुलायो तिनसोंकदे कि तुम भरु मारुतसुतदनु- मानजी दोऊ भन्य सुभटनको संगले दक्षिणदिशिको ज्ञाउ सो सुनि भं- गद शिरनाये तय्यारभये २ जब तस्यारभये तंब सिखांवनदेत हे सुभटहु दक्षिणदिशिमें जाय सियशोधहु जानकीजीको ढूंढ॒हु इति सुनि भालु जॉमवंत नील नंज्ञादि वानर सुखलह्यों सुख॒पाये अद्दोभाग्य माने जब कपि सुग्रीव भरु लक्ष्मण सबहाल कदियुके चलैपर तत्परभये तंब प्रभु हनुमानजीको मुँदरी दीन्दे हात्त कहें ३ :9४ ॥ मृ० । चलेसुमटव्यंकटबिकट खोजतमिरिसरखोह । रामकाज लवलीनमन बिसरधोतनकरछोह १ बिसरयोतनकरछोह संघनबन्जायभुलाने । रुषावन््तभेबिकल बिनाजलसब आअकुलाने २ अकुलानेहनुमंतलखि चल्योंविवरपैठ्योस॒ भटठ। क्ंधासुनाईशशिप्रभा चलेसुभटव्यंकटबिकट ३॥१ ६॥ टी०। व्येकट भयंकर विकट टेढ़े सुभट भालु वानरचले गिरि जो पर्वतनके खोह तथा सर जो तड़ाग इत्यादि सर्वत्र खोजत जानकीजीको डूंढ़त फिरतेदें रचुनाथजीको काजजानि लवलीनमन अथीत् मनको जो ज्ञव सो रामकान्में लीन अर्थात् चाद सद्वित लाग हैं ताते तनकर छोह जग मया बिसरिगई भाव भूख प्यास नहींगनते हैं ) तनकर छोह बि. तरघों ताते ढूंढ़त सन््ते जाय. सघन बनमें भुलायगये सीधीराद न मिल रत प्यास लागनेते विकलभये काहेते बिनाजलपाये सब
रहिसकेंगे ल्< सबकों अकुलाने ४५००५ चम
| कॉपिमाचरा ४ ट चिं टी ! ३0% शक सम्पातीलखिकहतर्डारे । धन्यज .. टायूसुभटको जलफलखायत्रणामकारे ३।१७॥ ,
« टी० | तांको प्रणामकरि झआाज्ञाते उपबनमें फेलखाय जलपानकरि सबकपि पुनः स्वयंत्रभा ढिगभाये त्यदहि आँखी मुँदाय समुद्र जलके त्तीर सबको पठायदिया सो सप्रेमसों स्वयंप्रभा प्रेमसद्ित तहाँ पहुँची जदोँ ज्षषण सहित रघुनाथजीरदें तहाँ जञाइ प्रणाम श्रार्थ्राकरि भक्तिवर पाया $ पुनः रघुकुलमाणि रघुबीर स्वयंप्रभाको बदरीबनकों पटेदीस्दी इदाँ कपिभरगदादिं सब सागर समुव्रतीर लीयदित जानकौजीकी खुबरि पावनेहित मनमें चिताकीन्ही भावअवधिबीतिंगई खबरिन पाया तो झब क्यांकरें इत्यावि शोच वात्तो करतेरदें २ सबकपि चेंताकरतदीरहे ताही समय गिरि गुदातें निसरि संपाति असहन वचन कद्दा भाव आजुमोको विधाताने आहारादिया सबको खाइ जा इ हों ताकोलखि देखिक्कै डरसहित अंगद वचन कहत कि जठायू सुभठको धन्यहै जाने जानकीजीके छुडाव ने देतु रावणसों युद्धकरि प्राण त्यागि राम रुपातें दिव्यरूप विमानचढ़ि परधामगया ताते वह धन्यंहे अरू एक यह पक्षी ऐलादएहै कि रामदूतन को खाइलीन चाइत इति जल फलखाय स्वयंप्रभाक प्रणामकरि चलते सिंघुसमीप संपातिते इत्यादि वात्तौभई ३॥ १७॥ ६
मू०। कक कल गयोः .। भयेपक्ष
वर्शनपाय पक्षजामिआये तव शुचिजलदीन जटायू को के पक शुदभचो ' शुद्धभयो पुनः कही पक्ष गति भाँति भाव सूयलमीष कि पक्षजरिगये गिरिपरथों सो चंत्रमामुनि ज्ञान दे ४:४८ को बह पखजानिंहें सो झाजु लत्यभवा इतिजाभत्तिपक्ष- तन सो सब हालकद्दे 9 पक्षगति भाँति-कहिं समुककायो भाव प पक 55% बन स्वार्माकों भसेसाराखि हेभाई ४३४४६ तुम्हारा कार्यहोई परंतु तुममें जबकोऊ सागर समुद्र के पार जाइदि तबहीं श्रीजानंकी जी कोपैही २ जो प्रबंलभक्प करिके बेत्तीबीर शंतयोजन सागर उलंधि पारजाइ॒हि अर्थात् जो ऐसाबली बीरहोड जो सडयोजन समुद्रफाँदि पारजाइ सोलंकाबिबे जांनकीजी को पावहि इति सत्यसब कथासुनि कपिलब विचार करनेलगे अरुगीध अ्रणामकरि ३ै। 3&॥
मू०।गयोकहतयहंगीधंपंतिकेपिसवकरतबिचार। बहुरतसंशय जियक्हेंअंगदजातोपार १ अंगदजातोपारकहत ऋक्षेशब॒ ढ़ाई।नलऑनीलसकोचजानकीकोनदिखाई २ कौनदिखाई जानककीपुनिप्रचारिकहऋ्षणति । कहासमुद्हनुमंतत्वहिं गयोकहतयहगीधपति ३ । १८ ए
इतिश्रीमोसाईतुलसीदासकूतेकुंडलिया रामायणेकिष्किंधाकाण्डंसमाप्तम् ॥
टी०। जो सिंधुपारज़ाई सोजानकीजी के खबरिलावै यहकद्वत गीध पत्िसंपातिगयों तबकापे अंगदादि सबबिचार करत पारकोन जाइसकत | तहाँ भापना बल संबहिन कहा परंतु पारजाने को किलीनेन कहा तदाँ : अंगदतों सिंधुपारजातों परंतु बहुरत संशय जियकहै अर्थात् ल्लौटतसमय की संशय आवत भावन कज कल कछु कहे ५७७० का २42००
23० 30400530::4:35%45 $ ताहीसंशयते-न जाइसके
बिरंविनहिं परन्नह्म मिरुपाथिं। शिवध्यावत प्ः समाधि ॥ योगिन अगम समाधि निगम ज्यहिअंत न प' कक हे
ठावहिं । बैज़न
४2 2 हि ४8% /. पे कंपिशेषशिरनसिगयोकूदिचल्याबलवंत >> रू शशि सि जलप्तालकोकदयोशेपक ये रे + प व बदं त - फिरि।मारिदुष्टगिरिपरसिपगभयोहेमर्गिरिकोशिखिरि ३१ _ दो०. । सिय रघुबरपद उर परे गुरुपद शीशनवाय॥ - ... बुधिबल सुन्दर काणडको टीका रचोंबनाय १.
-टी० । ऋक्षपति बैन सुनत हेमगिरि शिखर सम भयो ऋश्षेनकैपति
- ज्ञामवेत तिनके बचनसुनतही आपने बलकी सुधि है भाई तातेकेरुणा स़बमें देखिं बीररस उदय भयो ताते हनुमानजी केसेभारी ऊँचे प्रकाश- मानहैगये यथा सुमेरु गिरिको शिखरउँचा कँगूरा पुनः तमकि भूथर चढ़धो बलकरि उचकि एकऊँचे पहाड़पर चढ़िगये पुनःअधरओप् फरक्ि डठे नयन अरुणकरि प्रथम पिंगलनेत्र रहें ते लालकरिल़िये ये रौद्ररस के अनुभाव हैं भाव क्रोध द्व्मावा अधीत् सब कपिन में करुणा देखे ता समय जामवंतके बचन प्रचारकबि भावपाय शीघ्रकाज करिबेकी उत्साह स्थायीभई ताते बीर रसके झनुभाव ते देह विकासमान भई पुनः कार्य्य करिबे में राक्षसबिध्नकारी हें तिनकी सुधि बिभाव पाय क्रोध स्थायी | गीद्ररस के अनुभावते ओछ फरकिउटठे नेत्रत्ताल भये ५ अरुणनयन |. करि भुजदेंड मसकि जवभूधर चप्यो भर्थात् भारी गरीर महाबलल के भरे पुष्रभुजनसों तथा पांयनसों घरि दवायके जब फांदे तब भ्ूधर जो 2720: फादि गयो अरू चप्यों एथ्वीमें समाय गयो
+$< गरम २ न्नाः धर -पंटकिलंकिनीबांसको ३॥-२३
टी ०। लंकिनी बामको पटकि सिय हित ४3००६ ैटबों पुरमें पैंठती लंझापुरती के रोका ताको मुिरमारि एवेगिराय धुन महाबीर जीनकीजी के ढूंढ़वे हेतु लका पुरामें पैठे घरघरन खोंजि रणधीर श्रमित भये पुरमें लियन स़स्वी यद्यपि हनुमानजी रणमें धीयेवान हें ४004-24 ५ एक घर ढढ़तसंते भ्रमित अथीव मनते हारिगये कादेते « में. जानकीजी कहों न देखिपरी १ जब पुरमें हूंढ़िधंक तत्र बिभीषण भेद बताये अर्थात् रामनामांकित द्वार तुलसीफे ढुंदहरि. मंद्रिर इत्यादि देखि पे पढ़िचान् करि पूछे तब बिभीषण भेद बताये अ्यात् पुर में . ६ भश्ोक बाटिकाको जाउ जहां ओऔज्ञान्कीजी रहें त्यहि भझशोक- - बाटिकाको गयो तदांकछु बातो न करनेपाये ताही समय रावण जबरावणभायो ताको दखि कपि हनुसानजी विश्राम अल जाकेतरे जञानकीजीको विश्रामरहे त्यदिद्वक्षपरवैठेपल्ल वर्मे: पक इत्यादि लेकिनी बासको पटकि पुर्तेंजाय
३॥२॥
सर ५०४ ५४ ४४०2४ जबअत्पतः दुखते अशोक मवमॉत्रिका की भु गुण सुनाय बुलायेपर 52 कहे हेमातु में रोमदूतहों इतिमुर्रिकादे य देखी $ मारुतनंद निकठते बिवर्ण द्ाभी देखीपुनः ०077 व सुनाई भावहमक्रो 3040 कक
पाप जी निजे आपने मुखते क्यो है के बोर रघुनाथजी शीघपूहीःइहाँ आवन चाहत पुनः कीश कटके बानरन 7220 बल्तभय्ने युडढेतु सहायकभये तिनसद्दित झायदें को -छोटारूप देखिसदेह भई-भाव ऐसे ः से युद्धकरिसकिट़ें इसहेतु जानकी जी पूछरताभई 4४ , टक़तेरिही समान हैं इत्यादिता दनुमानको जानकी उत्तर दियो भर्थात्
' समानछोटे एजछोटे तनवाले बानरनकी सेन्ध है ३॥ ३॥ ध
सू०।साक्षप्रताप्सँभारिके मयोहेमगिरिछूपत रंघुबरकपाविचारू
हेण होयबंजअनुरूप १ होयबजअनुरूप सर्पशिशुगरु
डहिसारे। तिमिरखायशशिरविहि मशकमिस्टिंमउखारे ९
मशकसुमेरु उखारही समुद्रपिप्रीलनिवारिकि। जरोजगत खद्योत॒तव रामप्रतांपसँभारिके ३ ॥५४॥
222 किशोरीजीके बचन सुनि ताको निव। ८
त्री को प्रताष ३रमें सँमारि हेससिरि
[४ रामबॉल गम 2 /5603/4006%267: £ है 4. त। “कक
ढी 8 पुनः: भजो- ऋषिषदे मौके झुस्सें बृढिजायें पुलः जेसद्रा भूत को- * 22 सखते दे ते शेषचदें महिभूमिको इक की बी रक सदाज्ज्ञ को भस्म करत ताको बारिजल अथीत् बुकाय / ज्ञाकों सद्ाधारण किहेहें तिसचंत्रमाको अंमुचदें शीश्ते उत्तारि.. म्सिपरदारिवेज़ें 4 यथाशंभु श्षिरते चंद्रढारि देंवें ५०४५४४ ४०३० को उ- पजावनेवाले चारिमुखजो ब्रह्मातेचहेंसृष्टिकानशादें- चुनापीये- का देवी. 9 पर हे अतिकूल- 70048 5 को ड्।
>ही०। हनुमानजी बोले कि हेमातु मेरे भूखलगी है ताते मुदित
जाय बॉटिका लखों आनंदमनते भाज्ञादीजियें तो जाय कोनभांति देखों विटप्क्षनमें सुंदर फललगे हैं पर अधायके भोजनकरों १ जब हनुमानजी कहे कि बागमें जाय मेंभधायके भोज्ञनक़रों तापर जॉनकीजी उत्तर जवाबदीन््दों सुत रखवारे प्रंबत्त हे कप क़रिके बलीबीर रखा वने वाले हें जिनकी भयते अन्य ज़ामें पवन परवेश न कीन्दो पेठि न सक्यो वेगते बयारि नहीं जाइसक्ती है २ जिसबागमें-पवन ऐसे बली शूरबीरकी प्रवेश नहीं . तथा रविजो सूर्य शशिजो चन्द्रमा येभी उदितभये पर लखिनसकहिं परि: पूर्ण दृछ्विते देखिनहीं सक्तेहें भर्यात् दलफल गिरिजानेंकी भयते पवन नहीं पैठत तथा पल्लव मुझ्तीय ज्ञानेकी भयतेसय झधिक तापनहाकरते हैं तथापालाते मारिजानेकी भयते चन्द्रमा अधिक शीतनहीं करिसक्तेहें तिसवागमे तुम अकेलेजाय फजखाय पुनः कैसे कुशल सहित बचिसक- हुंगे सो सुनि कपिहंनुमान् कद्दे कि देमातु 4: मुदित आनन्द सनते 0५५ हुँ तो यहराक्षस्रोंकी भय मोकी तनको नहीं है सेरा क््याकरि
३ । ६ ॥
०२3१8728/ 780 लग्योफूलफलखाय । मुलचलावैस रक्षकप्रहुँचेजाय मर्दिमहिगर्द
। पुरीपरचोअतिशोर आक्षरावशपठवाये २ अक्ष कक्षलेकपिहन्यो मेघनादआयोबिकट । भिरेप्रवलरघुपति सुमिरि करिप्रणामकृयोसुमट ३१७॥
गोेदेखि नेक सुमिरि ज़ानकीजीको,: ह4८<६८८०:५०७४०:अ ताक ना रि. ज़ान सुर अपर हाल कद्यों तबः प्रब॑ल्वभिरे प्रकृर्ष युद्धकरने किलीको जीति न सक्रा-३३७:॥४ 5 मृ० । ब्रह्मबाणकपिसाधिके धरिलेगयेबहोरि । रावशआंगेकरि दियो कहिंकदुबंचनकरोरि १ कहिकटुवचनकरोरिकहीरो वंणतबबानी। कोमकंटइतकहां काहिबवलफलकरहानी २ फलदलंमूलविध्वंसिकरि रणकीन्होअवराधिके | कहकपि ५: तवंसुतलकरथो ब्रह्मवाणकरसाधिके ३।८॥ टी०. ब्रह्मब्राण साथिके बहोरि ऊपि घरिलेग्रयो जब किसीभांति त जीतिपाया तब मेघनादने ब्रह्म/ख्र॒ संधनाकियो ताकी महिमा विज्ञारि हनुमानजी ताकी चोठ अंग्रीकारकरि मूर्चिछित द्वैगिरे बढोरि कपिको-घरि वुमन नागफॉ्समें बांधि लक्काको लेंगयो कसे कह्तत संते लैके रावणके आगेकरिदियों ३ तडों करोरिन प्रकारक्षे आता:
दर गारी निंदादि कठु बचन कद सन्मुख बेठारि तब पुनः रावण
५ कही कोमेर्कट बुला तू ३ कर- नामकहां अ+ 5 ड्डत कहां इढ्ांकान द्वेतु आया है पुन फुलकर हानि भाव बत्तते त् अभय दै फल हक्षावि तोरि-हसारी हाने करि. २ किस इणवेव को झवराधि पूजा जप तपादि काना द् ; किस देवतासों पाय तासों अभ्यहै फल दल मल सहित
सब तथा व्यात्त यंथां शेष अनन्त बासुकि कर्कोटकादि मांकःपाताल के ००० पुनः पक्ष कुंवेर की जाति गंधव तुंब्रादि पित्त क़श्यपादि प्रेत रम्पुरमें यावत् हें पशु कामबेनु- आदि यावत् चतुप्पद दें सतुज मतलर्मे यावत था यावत् चर अचरहें पुतः सुर देवता सर्व चर सर तथा गयन जो झाकाश घरणीं-जो भूमि हब चत पर्वत हैं तिनको बेरे जो सांतो समुत्रहें इत्यादि याबत | 55 इत्यादि जांकीमांयाको स्थुलतरूपहैतथासूक्ष्मरूए यथा मैमेरा जो पुर आमादि परिवार बन्धु पौत्रादि धाम घरकी यावत-लाभभीः घन “मणि सोनी चांदी भादि तिया खी पत्र इत्पादि याव॑त् तेरेहें र बजा तेरे तिया खुत अर्थात स्त्री पुत्र धनादि को यथा ते आंपना सानेहे ्तथा सेब क्लोकक्े सी पत्रादिभये रहे पूर्व पुनि भविष्यमें दोहिंगे तथा भवदें इत्यादि -विधिहरि हर दिग्पाल सबचराचरादिज्यादिं जंग सज्योउत्पन्न कीन्हेंड ताखु . #तमें अधौत् ब्रह्मा विष्णु शिवादि सब ब्रह्मांड जिनकी उपजावा है ऐसे परंत्रह्न साकेतबिदांरी सी रंघुबंश में भ्रवर्तीण हैं पिता भाज्ञा' ते बन- वास कोन्हें जिनकी खीत्तुम हरि लॉपी तिन रघुनाधजी को में दूत हों ख़ंबरि इहां ग्रायो हों: हत# की कह
प 6... 0572220 20 मर्कट्सभट यूथयूथंबलबंत १ यूथयूथबलबंत अंतकोप । ००० कं खा । रामकटककोविभव रूपजानहिजिनदेखा 2594 देखा ' : जिनदेखातेजानहीं नमअहिपुरभृतलहल्यो। समुद्तीरडे - . रापरे रामबचलसुनिदलचल्यो ३। १२,॥ टी० । रघुनाथजीके बचन सुनतही कपि बानरतको समूहदंत्त चल्यो जिनके भारते दिग्गज भद्ठि सकुचंत भूमिकों थाँभनेवाल दिशा गज्ञः हाथी तथा अदि शेषज्ञी इत्यादि सकोचकरतेहें भाव यह भार न थैंमि सकेगो काहेते भालु जे ऋक्ष ते महाबत्ती तथा मर्कट जें बानर ते सुभठ बढ़ेसुंदर बली योधाते यूथ यूथ सब बलवंतदें $ एकजातिके असंर्यतत एकत्र तिनको यूथकहदी ते यूथ यूथ बलवंत ऐसे समूहहें जिनको लेखा गनतीकरि को अंतपावे भाव संख्या कोऊ नहीं पायसक्ताहै ताक़ो अब कोऊ केसेकहै काहेते रामकटककों विभवरुूप रघुनाथजी की सेनाकों ऐडवर्यरूप सो जाने जो वासमयमें झापनी आँखिनते देखाहोय सो चहै किसीभाँति कहिसके अब नहीं कहतेबनत २ जिन आाँखिन देखाहोय ते वाको विभव जाने परंतु अब इतनी जानिये कि नभ स्वगेलोक अद्विपुर पाताल भृतल सृत्युलोकते सब हास्यो अर्थात् सेनाके वेग तथा भारते तीनिहूंलोक द्वालिउठे इत्यादि श्रीरघुनाथजीके बचनसुनि बानरन को दत्त चल्यो जाय समुद्रकेतीर डेरापरे ३११३२ ॥. +
सेना निकट तासों क्या करना उचितहैं सो र मेत्र कहो इत्यादि सवहिनसों पूछतैरहे ताही समयमें विभीषण आय
विभीषण भायक्याक्यों मंत्र सणिमानिय मेरो हेमदाराज सबमंत्रन को. शिरोमणि मेरावचन मानिये क्या मानिये कि रघुनाथकों कमल जाय सीतहि सोंपहु अर्थीत् झबहीं सबेरदै बिय्ह राजी परिपूर्ण नहींभ ताते 308५९ जाइ रघुनाथजीको मिलहु अरू बिय्रहकी मूल जान- कीजी के सोंपिदेहु तो तुम्हारा सचरभाँति कल्याणदै २ विभीषण के बचन सुनि 5 की । नः गुल उठि लातनहत्यों अरु कहयो कि त॑
जाय ३:२४ की मिलहि अथीत् रावंणको सिद्धांत हे कि में तामसीहों भजन तो दै नहीं सक्ता है ताते प्रभु के हाथन प्राणतञ्ञि मुक्त हों इससिद्धांतके प्रतिकूल शुद्ध शरणागती उपदेश कियाइसद्देतु विभीषणके बचन सुनतही रावणको हृदय क्रोधाग्निते जरिउठा भावपात्र देखिताकी योग्य बस्तु धरना चाहिये मेरातामसी तनतामें शुद्धभक्ति केले दैसक्ती
ताते उपदेश उत्तम मंहींहे इसकारण क्रोधकिया पुनः सबबात मनसें पं नि अथात् बुद्ध शरणागती योग्य बिभीषण है सो अयशडरते सहज जायगो नहीं तातेमें अनादरकरि इसको खेदिपठावों तो भल्लीबातहै इति गुनि रावण उठि बिभीषणकों लातनमारि पुनः कह्मो किशन्नुकों तू
जाई भावप्रीतिभाव तेरा है तृजातेरी लोकहृपरलोकमें कुशल
असरुमें बैरभावतेंहों मेराकल्याण मरेपरहै इत्यादि बचनजब रावण कहो तांकों सुनत विभीषण हूदयमें झअनुमान करि भावप्रेभुकी शरणेमें भल्तादै इति बिचारि चलयों ३।१३॥ के हे 50780
जिनके मः के -मोीत् ने बने ५-३ ज ०42० 0०० आपने स बुलोयलीन्द्े 9 त्तुरतही:
० यमें ल्गाय:मिल्लि कुशल: पूछिसममीप बैंठारे
3423: तिल्लकसारधो संमुद्रंते जलम्ेंगाये रघुनाथजी आपने हाथ
... सो बि्साष्णक शीश्र्में रानसी तिलकेकरि दीर्हे पुनः रोवण़पुर सबवियो
+. सोपुरशावंणकीकबमिल्योरदे जबशीशडतारदोशीशका ठिकाटिफे के नवौर
शिवक्रेआय हवनकरिदिये २ इसीभाँति अनेकनवार जब राजीगंशीशउ तारे
तापर शित्रद्ियों तबल्ंकाभवनकों वविभव लक़ापुरकी-सबे ऐंश्वर्य रावण
पायोरदे सो पुरक्वत प्रॉयत्परत खोई लंकापुरकी राज्यलंकापुरक्ी सर्वेस
धन प्रणाम करत सात्रमें रघुनाथजी विभीषणको देदीस्दे इत्यादि प्रभुको
उदार स्वभाव विश्वीषण पूकहीं बिचारि: लिया कि ब्रिनाररधुत्ताथजी मेरे सनकी स्लानिको हरिहे-३। १४॥
मू०+ सखानिकटबेठारिकि पूठीसागरपाय | केहिविधिउत्तरैकपि
- कंटकतेहिंबघिकरियउपाय १ तेहिबिधिकरियउ पायें मंत्र
करिब्रतंतंटकीन्हों । क्षुद्रनद्रवाहिविशेषि तबहिंप्रभधनुः हो २ धनुशरउरमास्योबिकल मि कै पंथदेहिकपिकटककहूँ सखानिकटबेठायके ३:9४ 0:
। क्लंकाजानेकी राहकेबीचसें समुद्र सिल्यो-बिनायोको उत्रेकेसे
आगे जायसक्ते हैं इाति सागरपाय विभीषज़ सुप्रीवःजामवंतादि सखामा-
का बैठारि प्रभुपछी हे सखा कपिकटकः बानरीसेना बिधि
द्रके पार 3तरे 50805 जैसामेंत्र कहो तेहिबिधिडपाय ० १जो
'बिधिकी उपायकरी इत्यादि जबप्रभु पछे तवमंअकरि सबकी
(02000 मा मु ०। नाथ इंजसिखबत से । विटपशेलस रजड़्रचे इनकोसिखवतकोन ये 7 कर हुश्रभुएकउठपाई। गिरिगणबॉँधहिंसेतु नीलनलदूनहुँभाई २ दूनहँभाईबांधिहें शेलसकलमकैटसच्यो । आपृप्नताप सहायमम नाथसुगममारगरच्यो ३॥१६॥ _ टी०। समुद्र बोला हे नाथ सुगम मार्ग आंपही रचों हैं भ्ोतु सुलभ सृष्टि उपजावने हेतु मार्ग शा कारण पंचतत्त्व जड़करि मर मे बनायाहैं कोन प्रॉचतंत्त्व केसे जड़हें यथा जल पावक जो अग्नि: जो एथ्वी पवन भाकाश इत्यादि कारणते बिंटप जो दक्ष शेल जो पवेत 2 सर तड़ाग समुद्रादि सब जड़रचे कौनभाति जड़ यथा जल्तको जिसना: में ले चंलो. तहोँ ती न जायः झरु स्वइडच्छित पर्वत फोरिजात तथा एथवी जहाँपरि खादि खोदौ सो तोपिजाइ स्वइाब्छितः गुम्भज्ञ भीदखुदि- जातिहेँ. भग्नि बारेते सूखे ईधनमें नहींबरत स्वड्ठाब्छित- भोदा बन खर - . देत प्रवेन जहाँ चाही तदाँ नहीं आवत भनचांइत मंदिस्सें ४: ; जाते इत्यादि संब्मे ज़ंडता आपदोकी बनाई हैं तिनकी चह्दौ सिखावों भौर कौन सिखाय सक्ता $ इंनकों कोन लिया भाव ओर के योग्य.यहकाम नहींरहैं आपुने मोकी सिखावन दियो सोतो उचि हें प्रभु अब मेरे कहते एक उपायकरहू कोनभाँति नील 22205 दोनों भे ल्॒रिकाईमें सुनिते भाशिषपायादे इनके करंपरते शिला जलमें न हें ताते दीऊनाई गिरिगण पहाड़ समूह लेले लेतु बाँवईहि ९ नत्त दोनोंभाई सेतु बाँविदें तथा सकल मर्कठ शेल्सचौ भपर सबबान
वंत लेले झाय ढेर लगायें 27725 | प्रतापते झरू सस् मी वशमगाल | £ यहिभाँति सुगम्त मागे रचों सहजही कपिसेन पारउतरि
मार्ग रास्ता बनाय लीजिये यही मृ०। सुनिर्सोंचेसागरबचन
टी०। सागर समुद्रके कहेहुये साँचेबचन सुनि प्रभुकी झाज्ञाते कपि- पति जो सुग्रीवत्ते सब कीश बानरंनको निकट .बुलाय ऐसा कहते भये - कि मूंतलपर सबदिशिको धावहु गिरि जो पवत तरु जो भारीदक्ष इत्यादि
जहाँ पावहु तहाँते उखारि भा नके सुखपाय आनंद सहित ने है| तुम संब भानंद सहित भानि. नलकोदहु पुनः नल नीज़ वोऊभाई सागर माही घरहिं सेतुरचना हेतु गिरि जो. पवत तिनकोलेले समुद्र जोरते चंलेजाहि इत्यादि सुग्रीवको ग्रायसु भाज्ञा सुनि कपितृंद बानर समूह चारिदट दिशिको निशंकचले राक्षसनकी कछुश्नमनहीं मनमेंकरते हूँ भ्रथवा भारी पवेत उठावतमम गुरुताकी श्रमनहीं करतेढें २ नेकहू भ्रम : नहीं करतेंदें किसी पवेतको शिरपर धरिलेतेदें किंसीकोचंगुलकरहि दाय् हौसे गहिलितेदें इसीभाँति रचना तमासामात्रमें कोटिकोटिगिरिकरोरिन पर्वत बानरलोग आनिके नल नीलकहँदेहिं इसभाँति सागरकेसांचेबचन सुनिलेतु बाँधते हैं ३। १७ ॥ कुंडलिया ॥ पाहि कद्तत संकट दरत जासु नाम भवलेत। भथ धमे क्रामादिजग मुक्ति सुगम यशदेत ॥ मुक्ति सुगस यशदेत धाम्रत्रंयतापनशावत । रूप सुगुण अवगाह॒थाह विधि शेभुनपाव- त ॥ पावत पारन शास्त्र नेतिनितनिगमकहाहीं । बैजनाथ स्वइराहमाँगि
प्रंसु सागर पाही ३ ॥ हे ४ ०९-३५ साकाकापे- 3 सियबल््लभपदशरणागतबैजनाथबिर : वितिकुण्डलिकारामायणअ्रदीपकादीकारयासुन्दरकाएडसमाप्स् ॥॒_
मु है है 55720 $; (58
भालुलब अ्रायरेजिवनयन न ५५०७ ४५८५०: ५ बहुलम भावी। मतकनरावणसने
पाल बॉक्स प दपु शुभउपदेशनकोगयो' चेतुचेतु रह | ; ] । करिहेतुनिज ज बाँघिसेंतुमारंग भयों ३।१॥ 2
टी०। समृद्रमें सेतुवैधि सुन्दर मागे रास्ताभयो तापर बिपुल बड़ीभारी/ कप बानरन की सेन चल्ली तामें सर्कठ ज्ञो बानर भालु जोऋक्ष इत्यादि संगमें गर्जत संते राजिवं कमल नयन श्री रघुनाथ जी समुद्रपार आये सुबेल पर ढेरा कीन्हे ५ जब सुन्यो कि राजिवनयन इस-पार झाइगये तब मन््दोदरी आपने पति को बहुत भांति ते समुझायो कि तुम रघुनाथ जी सों न जीति सकोने ताते कछु बिगरा नहीं है जानकी जी को लैके जाये मिलौ इत्यादि बहुत कहे परंतु सृंतक मौत बशते रावण कछ न सुना काहेते कॉल कैहिकी मति न प्रमायोजब मृतक कास्त आवता तब किसकी बुरद्दि नहीं श्रमित करि देता है भाव हितमें भनहित अहित में दितमानि लेता है २ इहां मतिले भंगद पुरचल्यो सबकी सलाहले प्रमु भाज्ञा दिये ताते अंगद लकापुरको चल्यों,शुभ संगलकारी उपदेश देने को रावण के 5४४ गयो पुनः के हेतु ५ तक तिस आपने प्र- योजन साधने हेतु रावण प्राति भेंगद रहे ल् सेतुबांधिं मयो अंथोत् तेरा बड़ा रक्षक समुद्र रहे तामें लेतु वि गम रा हेगवां भाजु सेना उतरि भाई ताते बेत रु भापना दित संमुकति.. जानकी जी को दै प्रंभु को मिलो तो कुशल नातों संब मारि ढारे 54 ताते चेतु ३११ ॥ छ् 7;%- एफ ३ 50879 45% मू० ध हे का ह
220#:% 52 ४४७४६
प् िकशमतित्रकायसे टी०। पुनः अंगद बोल्ले जो,न 3553-54 नाक: ।यजीकरेब्राण
अंगद जो,न जिनकंलांगते रुण्डते भि डड़िके : तेजवन्तहें 'जिनव 7 ४५ 25 नव तने मुगड
। ०2755 82285 80 लायर सडरित॒भ्नयो- जिंनके-
समुद्र डरायउठो बिंप्ररूपते झाइमिल्यो पुनः जांकों बक
मोराचकों देख कहाहे भाव चौकी एकेही बांणतें मारे अब तेरे हेतु प्रशुकेःतरकसमें कहां कहां परधादें अधोत' रावण कहाँ है कहाँ हैः इत्यादि शब्द वारंबारं तरकसमें' दाण उच्चारकरि उठते हैं'माव अब तेरे शोणित केष्यासते'बाण हत्मलाते हें ताते| जानकी जीको' संगलेक जाय प्रभुछो मिलो नाहींतों रुंड्तेकटिक तुम्हारे मुंढ सांग्रमें उड़िक् परेंगेःह । ३ पा
० (मरघुबर को तहौं-तनिशि्र कुलराय-। सेनसहितलागी- ्ँ 7 सुभढसकलडुठावोपांयः 4 सकलउठावोंफंप-बचनहारेत्र 'णशोेप्यो ।/शेषशीशमेंचोटभई अंगंदजबकोप्यो एअंगद पांवउखारियों कहरसंवंणमट्युथहों १ हारेमंटरावणउठ्यों
कट 47644 + भनेकप्रति उत्तरहोत संते जब्र सवण प्रसुकी निद्ाक्रिया तब 702 तब क्षमिद्ाले: ते: सवण़के सुकुठगिरे सो चारि राबणसक्रोधित बोज़ा हेसुमदी
इ तापर झंगढ़ बोलते कि मेंतो “३४-३५. इुतहों* है रावण तू निशाचर कुलभरेको राजा है भाव मेरोतेरी समता नही हे
क्रोध सहित पॉवरोप्यों तबभूमि - शीश में भारभायो ताते चोटभई शिर पिराय उठ्यो २ ब सनि बह _हत भापनी समाज में भटयूबहीं भत्बंत
ऑंडन ताते अंगदकी पाँव उखारिये भाव पाँवपकरि उठाय याको पटकिडारी मेघनादादि बलीबीर उठाव॑नेलगे किसीको उठावा न डठिसका भटबली योधाहारे छोड़ि छोड़े अलग बैठे तबरावणडउठा जब पॉवपकरनेंलगा तब अगदबोले कि में रघुबरंकों दूतहों भावसेरे पद गहें तेरा बचाव नहीं है इसाभाति रघुनाथजाके पदगहु तो तेरे अपराध क्षमाकरेंगे बचिज्ाइ है ३ ।३॥
मू०।मेरुहस्योपगनहिंहल्योअस्तहल्योगिरिशंग । उद्यशैल क्रंपितभयोमद्रहरागिरिसंग १ मंदरहरमिरिभगसप्तपाता लबिहाले | सप्तसमुद्रउच्छलतकमठदिग्गजद्विशिचाले २ चालेदशकंधरबंदनलंकसदनठहिदहिचल्यो + थक्रेजके
_ 5 सबंदनुजमट्मेरुहल्योपगनहिंहल्यों ३।४ ॥ टी०। मेरुदल्यी पगनहिंहल्यों अर्थात् इंधर अंगद पार्वंधरि दबाये डधर महाबली मेघनादादि उठावनेलगे दोऊ दिशिक जोरते भ््त तकदहालि उठयों झरू अगदको पाँव न हाल्यो क्याक्या हाल्य शक अस्तहोतेहें त्यद्दिगिरि पबेतके शृंगहाल्यों तथा जहाँ उदय होतेहें पे शैज्ञ परत काँपि उठघो तथा मंदराचल झरु हर गिरि कैलास सो भी भंग टूटे फूठिगयों १ यथा मदर हरागिरि भंगभयो तथा सप्तपाताल बिहाले पातालादि नी वेके सातौल्ञोक बिशेषिहाले अथवा तहाँके बासीबिकल बिहालभये तथा साती समुद्रनकोजल ऊपरको उछरत तथा कमठ कच्छप अरु भ्रमिपॉभनेवाले- दिशायज सोभीचाल़े हाक्तिश्ेलिगये २-दरशकंधर ब्दनचाले रावणके वा शिक तथा लड सदन ढहिढदिचल्यो स्का .
. >भावलंका जीतिबेकों चिह्न स॒च्ितकारि रावणके सुकुद प्रभुकेआगे-
प्रणामकीन्दे तब हर्षसद्दितरघुनाथजी उठिके अंग्रदको उरमें लगायमिले 3 हर्षिमिल्ते पुनः रघुनाथजी निकट बैठारि हालपँछे तब्रबालिखुत्ंगद बिग्रहको कारणभाष्यो भावविना सारिडारे जीवतरावण जानकाजी को नंदेइगो इत्यादिसुनि मंत्रकरि विभीषेण जामवेतादि बिचारप्पेक बात्ताकरि चारिअनीकपिलेना हे एक ऐक मुखिया अमर णीयकरि लका 'गढ़घेरधों पुनः जो जिसद्वारपर युद्धकरिवेलायकरहै ताकों तहें राखे २ इत्यादि दवारनपर बारतको. राखि पुरभयदयोलेकां पुरपर भय दायक आचरण करतेभये अथांत् पर्बतावि चलावनेलगे तिनकोदेखि स्लंकमें प्र-
ब॒ल्ज्वरक्षयों पुरबासी डरायउठे ताते सबके. उरमें अत्यंत दाहभई तब॑ रावणकी झ्ञाज्ञाते राक्षसीसेना अखधारण करि सन्मुखजुटे कऋुंद्धितयुद्धभयों दोऊ दिशिके बीरक्रोधभरें युद्धकरतेरहे परेतु समरभूमित्रिषे असुरराक्षसी दल बल्तकरि हारिगये भागनेलगे ३३५॥ - -
लक्ष्मएहन्योबिचारि । भट्मरठाप्रभ
कल हुमतलीन घर ६ कब पहरटाए
लशीशदेंखतभरत तानिमारिशायकबिकट। रामकहतमें
29274: पहार समुद्रादि मारग अगस
£ भरुबणपर बैंठुतो प्रमाण संत्यसत्य जानु है १4
क 'आवतसेरें बिलंबनलागी १ | किन *
टी०॥ औषधीपाय वैद्य सुषेणने उपाय कीन्ही तवलध््मणंजी चेतन्य है उठिठाढ़े भये सो हालसुनि रावण के मनमें सेशंयभंधो भावमेरीलेना तो आधीनाश हैगईं उह्ाँ लक्ष्मण घायलोभयेपर पुनः निरुजद्गैगयें यही झोचमें जायश्ांता आपने भाई कुम्भकणकी सोवतसंते जंगायो 3 जाये भाई कुंभकर्ण को जगाय पुनः रावण जेते कारणभये रहें ते संबकहे भ- थाँत् अवधेश पुत्र रामलक्ष्मणस्त्री सहित वनकोझयें शृपंणरवाकों कुंरूप किया खंरादि को मारे तिनंकी ख्री मेंहरिततायें। तेबानरी सेनाले सिंधुमें सेतु बाँधिआयपुर थेरेहें बहुत राक्षस मारेगये इत्यादि सुने तबत्यहि कुं- भकर्ण ने कहघों न मनुज रघुनेदन प्रभुमनुष्य नहीं हें परतह्ल भवतीणभ- येद्दें तथाकंपि सुरतेते जेतेबानर हें तेते सबदेवता हैँ बानर तनधारण कीन््दे हैं २ हे रावण कपिसुर हें र कि त्यद्विसों बिरोधकरि को नहिंगेयों अथीत् ताड़का सुबाह कप खरदृषण कंबंध बालि इत्यादि विरोध करिको नहीं नाहंभया तले: सुमहू जाउये झसकहि कुंभकृणी रण संडल समस्भूमिको गयो ताको देखि युद्धदेत लक्ष्मणजी उठिके- ठाढ़े भये ३॥ ८
'मू० मारिदुष्टरणदलिमलेसुरदुंदुभीबजाय । लक्ष्मणकाआयसु दियोतातलंकपुरजाय १ ० ४४७०४] माहिंहतहुरावणसु तजाईं। आयसुशिरधरि ल' श्द्ख दायीमारेसकलरावशमनशोचतचले। ज॑यजयजयरघुबंश
मणिमरिदुष्टरणदुलमले ३। «.॥॥ न् टी०,। कुंभकर्ण संग्राममें बहुते बानरनको मूहिछित करि विया दब रघुनाथजी सन्मुखचाय म्रारिबाणन दृष्टको दल्तिमले कुंकर्णक्रे-झंगभंग काटिढारे ताको मरणदेखि सुर बेर हल आदि अज़ाये पुनः
प १773 गीषणते हाल्पाये कि मेघनाद यज्ञ 7020 कैमारनेहेत प्र (23 नेक वन ८-33 ये इेतात' लकी सगल्ले
शिरधरि लक्ष्मणजी उहाँजाय युद्धकरि देवन दुखदायी तीकेशेापय ब दुखदेनहारा जो मेघताव ताको रणमें मारे ९ दुखदायी मारे के 2ड ईभकर्ण मेंवनाव महोदर प्रहस्त इत्यादि हद किन रे ते मे लिनकोबेखि बेब सब शा दृष्टनको सारि रणमें दुत्तसले सबको नाशकौन्दे ऐसे
8 री, 2
होय जयहाय जयहाय तथा सेनंप सुभट ब॑
शोच दुख पूर्वक बिचार करत रावणः समर भूमिकों
मूड 5 22:22 रत डरतघरतशरासनहाथ १ बलतमहिदि स्गजडोलें। क्षुमितउदीघज हेधर्बोले २ 'महिघरब्रोलेआअतिसभयरबिमुद्रितसबथलहल्यो ३ भुजप्न- चंडरणमंडियों रवणरणआतुरचल्यों ३३१० 8-८ 0
डी०॥ असर राक्षसनकी सेना सब ४३8०5 : दलसानि अर्थात् हांथी छोड़े रथ पेद्सविको- व्यूहबाँधि:ताको ४०-०५ रावण 32 भातुर वेगसद्दित चल्यो केसाहै रावण धरत शरासनहाथ वेवनडरत जा समय क्धमें धनुष धारणकिया तासमय किसीदेव॒तनको, ढरनहींसानता. सब॒सों अभग्न युद्धकरत सब्रको परास्त करिदिया 3 पुत्र: दरासन- दाथमें घारणकरि-चलत-समय महिविग्गजः ढोखें भथौत् 22. ः प्रायगयो परंतु तेज श्रत्राप पर्ववत् बचाहै ताते हायसें ला ष बाणल्े ज्ञा सस्॒य सेसर भूमिको चल्यो ताससय महि जो ए्थ्वी -तथा 'दिः स्यादि सब हालिउठे ताते उद्घिजल क्षुमित समुद्रको जलन उछरने तथा शैल संस ख़सिपरे सहिधर बोलें भरधात् जब पे
थात् बेदकों अवतार वाल्मीकि भगवत्को ञवेशावततार व्यास इत्यॉविकन को परिपूणी कदनेकी गति नहीं है $ केसे गति नहाँदे जो शंकराढ़ि दे वता
हा इत्यादि कल्य कोटिन करोरिनकल्पतक कहतसंते हारिजायूँ
न पावहिं तौंनेचरितमें जेसासमृद दोऊंदिंशिंदलरेदी दी ऊदिशि जैसाबलरदो तंथा जैसे प्रचंड लमरंभई ताकी जेंकेहनीबिचारें
| 2.8. पारहायँगे इंत्यादि जेंबिचारेते मतिमवहेयथा ससाग्राकाश की थहि लीनचाहें यया खंद्योत लोकको तमनांश कीनचहि तेलेही नि -
र्य 7706) रावण
१०४०१ ते जॉनते हें बलकों गये १ कहते रविशॉरें पवन जानतेहेँ कि रावण सबसों बंडोरणकॉन्हों अथवो सर्बको तो स्वाभाविकही जीतिस्वाधीन किहिरद्ों ताते संबेजोनर ते हैं रघुनाथजोके सन्सुख रावण बड़ोरणकषियां ताहि रावणको प्रभुनिज दल्लसमगाति पावनपरमपददीन्दों अथोतृजोयुद्धकरै ताकों आम गतिदेना उचित असरुयुद्ध समय जो आपनी- मल ४ मा सुदगति देना उचित सो नहीं जो युद्करि शत्रुरहै
8454 ५2% 4 5 2200022 प्रावतवानरऋक्षसे:
सहित रावण को इंसी समय पावन परंघांमकोप डे| हैं रपावन पदलाखे रावणको परमपंद प्रावत देखि वेवता' ०8.26: फूल्तनकी बर्षाकरि नगारा आदि
_मसनागभूतलसुखीसियसंकटदूराकरयो 45% है ॥
टी३१ सकुल रावणकोमारि जानकीजीको जो संकटरहासोतो दूरीकरधो पिठाइ त॒ ड्रीन्दे पुनः विर्भाषण दीनहे शरणझायो ताको प्रभु लंकाकी राज्यदीन तथा कप्रिको सत्य सुयद्यकदृधों आपने सुख़ते प्रशेंसाकरि सुग्रीवादि बात़रनको सुवरयत्झापने चरितकेसाथ सत्यकरिदौन्दे सीयशुविकीन भथीत लकामेंरहेकोक्षोभरहा सो भग्निमेंप्रवेशक- राग्रज़ानकीजी को पावनकीन्दे ३ शपथले जासकीजीको पावनकरिरघु: ज्ञाथजी पुष्पक बिमानपर चढ़े कोनभाँति कप्रिसिय जपणसमेत सुग्रीव हनुमान अंगदाद़ि यावत् मुखियाबानर विभीषण जामवंत जानकी जी ज्ञक्ष्मणजी इत्पाद़ि समेत भयोध्याजीको चले तासमय सुरंजयतिसुनाइ इंद्राद़ि देवताप्रभुकी जयजयकार सुनापरहेंढें * केसे सुनावते हैं कि जिन स़वण ऐसे खलको दलदल्यों सबका नाशकरि देवता मुनि ज्राह्मण भूमि इल्यादि सब्ंको इखबहरयों ताते असर लोक स्वर्ग नागलोक पाताल मूतलत ख्रत्युलोक इल्यादि सबसुर्खी भये भ्रूजानकौजी को संकटतो दूरि.न क- रघो सबको सुखभयो $।१३॥
म०। पूजाशंकरकीकरीसेतुसियादरशाय । पंचबटीकुंभजहिमि हक ॥०५3/५५५५-१०४६०४ १ अत्रिआदिऋषिरायामिलेअ सही 3 ७3० -72७2४4%22 ०४ ० षआयसुपायचलेआगेरघुराई २ रघु पल /* चित्नकूठमंसलथरी। ने : 5 पूजाशंकरकीकरी ३११४३ लंक्रातेचलिआ। सेतु बँधायेरहें १९५४५ कक व आर पक कप रणण
पुनः झ्ागेचलि पंचबटीको आये तहाँ कुंभज अगस्त्य । मिः पेराय ऋषिनमें उत्तम अन्रिको मिले 3 यथापत्रि तथा
/0%00220300% 87% 2340४ ;५ ४ +ल्टी.११ सतिफलबीमी को दियो पुस्ममनको आयसुपायो ताते र्पिके आय
्रीरघुनाथजी यमुनाजी को प्रेससह्वित . पूजाकीन्दे पुत्त: प्रेम- मय अ्रमुदित मनते प्रेसानंद समेत प्रणामकरि चंत्ते 3 झ्ाय प्रयाग को प्रणामंकीनद पुने प्रभुजाब भरद्वाज्ञादि मुनि गणनकोसिले पुनः जासकी जी सहित प्रभु त्रिवेणीजी में मज्जनकॉन्हे पुनः विप्रमान्यता ब्राह्मणन को मान नश्रतापूर्वक दानदीन्दे पुनः रुप्ाकरि बाई ऊँचापदकरिदीन्हे र प्रयाग वारन को सानबड़ाईदे पूजिके पुनः आतुर शीपृह्दी बिंसान गंग
जऔगवेरपुरको गधों तद्ां निषादराजकों जाइ' मिले इत्यादि मुचि के दिये झायलुपराई श्ेगबेर पुरतक झायें ३ १५-॥
मू० । कपिहनुमंतपठाइयो 82% “32% 30 खे। आवतसियल
(42553 पावाधिकी 5 40425 । पुरवा . बारों २ शोचनिवारोंअवधकोसबप्रकारसमु फाइयो। भरत भ्रंवोधनहेंतप्रभ कपिहनुमंतपठाइयो ३।१६॥ टी अब रस प्रभु आकर. पठोयो +3०५०७०“ तुमजाउ प्रथम भरतकी कुशलता श्र सनज्नतादेखि पुतरः तु मबहचात विशेषिकररिके ]
ज्गायो इत्यादि भेंदि- न निवास कोपरमसुद्रम' लिशाय सुंदर गंगाजलले प्रभुके पदकमल थोये १ सुजल' हे रद बिर सुंदरे आलनपर बैठारे धूप दीपादि पृजनकर नेवेद्यदित लुंबर स्वा- दिए फूल फल अंकुरादि प्रमुके झागे धस्धो २ अंकुरफलादिं अमर्साहित * * +33० > के. 3332४: 0०% ४००८ १६८९ + तपुनः को ड़ हर एय॒:बिदाभयेः ल्म्मांजस्िते:विम्नानपर चढ़ि प्रभु भयो- ध्याजीको ज़ज़ते: भय ३॥ ३:७॥70 ५ ८ /))6 फर्क: ।
मिल न लिदनुतकजवाहरराशरीस्तुख वीके जटाशीशसमुनि
मन लगाये हैं $ यथा अंतरको प्रेम प्रमुकी पॉवरीमें: लीन
'पांवनकीराति' 3-८ -क तक ४ सुनि . शभुआंदि देवता शुकदेवा इस्यादि हैं: इत्यादिकही .. पुनः हनुसंत कदत हे भरंत सुनिये सोई रघुनाथजी अयोध्योजी आते हैं ३। १९॥ ;
224 उस पप कर दर मरालत 3 राज नए व
पुनिहनुमतकहरामअवधआयेसखभारे २ सुखभारेउठिभरतक़रहियेमेटिआनैंदगहयो। अश्रुप्रातगा : त्रनपुलकिसुततभरतआरनेदलहबो ३। २० ॥
टी ०] पूबे बियोगद््खते दुखीरहें जब हनुमानजी के बंचनसुने तंबमरते आनंद लहयो आनंदपायों कहेते फमभावती बात भत्यंत मनेभाई ..बॉलंसुने तहाँ पूर्व थाकित रहें जब मनभाई बांतसुने तब चकितभंये अधीत अत्यंत आरतरदें जब अत्येत सुखकी बातसुने तबग्ादचर्य लिहें आनंदभभया इसदेतु विचारकरत कि यह सुख सपनेभया है कियों कोई साक्षात॒कह्त पूर्बमहादख़ंते नेत्रमंवेरदे जब निश्चयजाने कि: कोऊ साक्षात्र कद्ठत है.तबपुनतः जब भरत नयनउघारे तब हनुमतपुनः कहे कि भारी सुख सद्वित रघुनाथजी अयोध्याजी को आये इत्यादि प्रसिद्ध बॉधकरि हनुमानजी प्रणामकीन्हे २ जब निश्चय प्रभुकोआवनजाने तब भारीसुखर्साहत भरतडठिकरहिंयेमेंटि आनैदगहधो करहाथनसों हनु मान् को उठाय हियेमें लगाये भेंटे रापटूत चीन्हि सत्यप्रभुकों झ्रावनंजाने ताते प्वकोी दुखत्यागि आनन्द को पुष्टपकरे केसे भानदगहंथों गातन पुलकि अश्रपातप्रेम उमोंगि संत्रोंग पुलकितंभये भथौतू रोमांच कैठाव- राधे तथा नेत्रंनते आंसुरगिरिनेलगें इसभाँति हनुमांनके बचनसुनतें भरत आनेद लह्यों पायो ३। २० पं
गले 8३ २१ के 77 + क्या
रूप भध्म्रत श्रवण दाराउरमें ३ कस 8 कक 2०7 हविप | यहि संदेशके योगवेनेवाली बस्तुं 8 कैसी भमृततम बातकदी अ्रिपुनंदन जनकनंदिनी को बिशेवि कुशल पुनः लक्ष्मण सुक्षेम सहित भवधकहँ भावत १७-९१. देखिके झाय क्यो इहाँ द्रोणागिरि लैजात समय हनुमानजी कहिगयेरहेँ कि जानकी हरिलिंगयां रावणताके युद्धमें लक्ष्मण घायलहें येदोऊ शैकारदें सॉमिटि गई इंसहेत कंहत कि प्रभ॒कों झागसन केहेंउ सो सुखद पुन: जानकी कुशल सहित संगहें यह विशेषि सुखदतादू में लक्ष्मणजी सुदरी क्षेमस- हिलआंवत तिनको देखिभांइ आमंसनशुभसुनाय अपूवभानन्द दीन््हेंडे २.7 केसा भानंद दीन््देउ हे हनुमंते इहाँ को विशेषि करि श्रभुभावते देंसों देखि तुमआययद संदेश केसाकहा यथा उत्तम प्रदेश लेके मोकी दियात्र- देश कही भेंठ सामग्री को जो राजादि को दीन््ही जांत ह। २१ ३४३ मू० अवधआयंप्रकेटीसवेगुरुपुरजनसमुमांय । मांतुकुशल अआयेलषणसीयसहितरघुराय १ सीयसहितरघुरायसजहु मंगलपुरनारी । बेदनवारपताकचमचामरगजभारा २ गे जभारीरथतुरंगसंगसाजिमंरतमंगलतबे। चलेनगरबाहि रमिलन्पुरशोभापरकटीसबे ३ २२॥ ; टी० ॥ हनुमान् जी सो सबहांल सुनि भरत अवंधमें झायसबै प्रकटी सबहाल प्रसिद्धकहे कौनभाँतिगुरु पुरजनसमुभाय प्रवमगुरुबशिप्तजीसों कहे पुनः पुरजञननसों कुशल प्रसन्नतापूर्वक भावनेको सबहाल समुक्ताय क्ैंकहे पुन पेन के 3:9१ कि हेमातु लपण जानकी सहित अप * कुशल पूर्वक आये: _रघुसायपुर को आये ताते . पुरकी नारी बुलोय हक तन नम ४ ि कह पर मकर बाँधों मंविरनपर पत्ताका रचौ एकत्रक' 2-43;
हक
| देनुमानज़ीको सेगत्ते आगे जायभरत्तजी गगत आकार ले ममुकी बिम्रान देखते हैं पुरतमीप आय विमान-सुमिपर उतस्घो-तथौलमर के सारिनर'ठाड़े वेखिके रघुनाथजी विसानःपरते, उत्तरे कादेते कपालिधान हैं अरषातू श्ृतमात्र के रक्षाकरिवे को आपही-को समर्थ सानना-सोईकूपा गुणा है प्रथा भगवदग॒ुणदर्पणे ॥ रक्षणेसरवप्रतानामदमेवपरोब्रिभु४व. इतति सामर्व्यसेश्नात रृपासाफास्सेश्वरसी ॥ इति रूपागुण के भरे-स्थाक्तरें सो ता वि मिलता ख़्ते हैँ ताते उतरिकेभृप्तिप्रस्तत्ते-3फवां
डतरे पुनः गोसाईं सबको पालनद्दारे सवा की प्रणाम करें मिले तबमुनिराय भा शीवाददे पु.
'सौदित ज्लितप्रीति समेत रेघुनंदनते कुशल पुछे प्रभुबोले झापु इंयाहमारी कुशल है २ मुनिराय बशिप्ठ को पे पुनः भगबेतऐश्व- द्नेत् औरघुनाथजी प्रणाम करते देखि भरत को उठायलेके हें कय में ल- गाय लिये तासमय ग्ृति:सनेहते दोऊपूरेभरे तामें मगस अधाक्षे प्रेमानेद
तन +3००44+44/#%% 5 25%» पढ़ि इतुमानकोसंग जे भरत प्रभुकोमिलनेहेत झागेगये श३ ३॥
मुक्तकत सुग्रीवहु जि राज्य बिभीषण देय यानचढ़ि भवन सिधाये ॥
£ जे करिलफकेह कि ० + फिकरऋ मेड पड कक
मृ०। रामअवधआयेकुशल घरघरमंगलसाज । पुरीमईअमरा
- बती रामेराज्यकेकाज 9 रामराज़ष्यकेकाज़ भरतसबसाज़ # सजाई + सुरगंधवेमुनीश सकलच्यायेसरसांई २ सुरसाई « मंगलसजे बजेअंवधदुंदु्िविमल । वर्षिसुमनजयजयक * -हंत रामअवधआयेकुशल ३॥१॥ ४ हक
टी5 । आऔीरघुनाथजी कुशलपूर्वक अयोध्याजीको आये तेही झानंद ते घुरजन घरघरमें संगलसाज यथा चित्राम्र बेदनवार पताका कलश इत्या- दि साजिरदें हैं तासमय कैसी दिव्यश्ोभा देखाती है जेसे रघुनंदन के. राज्याभिषेकके का्जदेत अयोध्यापुरी अमरावती भई अथीत् मनुष्य सब देव देवी सम अरु पुरी इंद्रपुरीसम शोभितभई इहोँ साधुर्यल्लीलामें पुरी को अमरावती कहे 3 काहेते पुरी अमरावतीभई राम राज्यामिषेक के काज द्वेत पुरीमें भरतजी ध्वजा पताकादि सबसंगलकेसाज सजाये ताते दिव्यपुरी देखातीदै सुर देवता गंधव तुंबुरादि मुनीश कश्यप अगस्त्य . नारदादि पुनः सुरसाई देवतनमें स्वामी यथा ब्रह्मा शिव इंद्र वरुण कु. बेर सूर्य चंद्र भग्नि पवन यम इत्यादि सकलआाये .२ सुरसाई जेआये ते - भी मंगलसाजसजे संगमें लेआये ताते अवध विमत्न दृदुभि बजे झयो- मेक आनंद रे प& उत्तमशब्दते अनेक नगारादि बाजा बाजिरहे + सुमनफूल बर्षिके जय जय कह्दत काहेते कुशलपूर्वक रघुनाथज्ञी |
$ ीध्याजी को आये इति पुरी अमरावती भई ३। ३ ॥ का "|
| 23320 5३ ये रघुपतिबैठेआप । नल
नप्रत!
| रे ५ |
. दी९)
24555 रे
बसन तथा किरीट छुंडल माला कंठा कैयूर पहुँची
जो भूषण धारणकिद्दे तिनमें मणिगण हीरा पन्ना 5४४ | मरकत इत्यादि समूह सणि जगमगत प्रस्वंगदात्ि हे रहीहे लिन करिए कोटिन भानुप्रताप करोरिन सूर्यन केसो प्रताप देखिपरत॑ १ अंगमें कोटिन भानु कैसो प्रताप -देखात अरू विप्र वेदधुत्नि उच्चरें ब्ाह्मंणे लोग , मांगलिक वेद ऋचा पढ़िरहेंदें पुनः-छत्र चमर व्यज़न भरतादि अनुज धारण किदेंहें तथा धनुषत्राण - देडादि जो प्रमुके भें तेविभीषण सुझीवा- दि सखा घारणकिहह.९ पुनः भरतादिक सब समाज सुखमय सर्वाग में आलंद परिपूर्ण तामें.सगन बूढ़ेढें तासमय सिय आई भूषण बन्यो बहुत भूषण स्वांगमें घारणकिददे जानकीजी आईं तब राम सिया शोमितभये मंगज्षमय पावन जो राजसिंहासन तापर जनकनंदिनी सहिल रघुनंदस शोमित्तभये सिंहासन सद्वित तनकी झोभा प्रकाहमानहै ३-६ २ #-. -
मू०+प्रथमतिलकगरुउचचस्थो विप्रनआयसदीन। देवमनिनज
३४-३6 ६ ५८ अक पलक कल सबहिवरथ स्ततिठानी । ता आर ;
मर रइबवीसुरधुनिसके मुनिसवे ज़यतिरामजयजयकर्चों । बंदिवेद /# बिरद्रावल्ली प्रधमतिलकगुरुउच्चरघों ३। ३ ४... 'ही०। जब सिंहासनपर प्रभु आसीने भये तंब ०४ :38०००.० अभिषेक ऋचा उच्चारणकरि प्रभुके माथमें तिलक प 2५ ब्राह्मणनको' तिलक करनेलगें तब देवता न
भयेद्शर
थकेबारे | निगमसेतुश्नतिपालि सुयशजग्रमहँविस्तारें २ -. विस्तारेअद्भतच॑रित पालंयलयकृतपुनिरचन ।जयजय : नरअवधेशसुत कहवशिष्ठप्रथमिवचन ३॥४॥ ०४ * टी०। बशिए्ठजी भ्रथमै क्या स्तुति बंचनकदे हे महारोज वथाएंड्वर्य पान प्रकारते संसर्थही अं्थात् शक्तिबेल तेजवीय
अतापादि है किसीमें नहाँहें कैले सम ही मार्ुर्यमें सुरपाले कल खद जोरावण ताको दलराक्षत्री सेनातेंहिदल सहित खलरावणकोनाशंकरिदेवतनकी रक्षाकीन्द्रेअभयकरि स्ववेशबसाये सो केवल देवतने के हेत्तनहीं दिजमहिं सज्जन भये खेलदल विशेषिदेलते
* द्विज ब्राह्मणन के हेतयथा विश्वामित्रके हेत ताढ़का सुबांहु को मारधों महिभूमिपर अत्यंतपाप को भाररहै सो उतास्थो तथा सज्जन यथा , सु्रीव विभीषण तथाअनेकत: साधुप्तुनिनको सेकट रहै तिनके सुखके अर्थ $ द्विजमही सज्जननको सुखी करनेगर्थ दद्॒रथ के बारेभये जगत के पिता सदास््वार्धान ते महाराज के पुत्र है पसाधीन भंवे पुनः निगस तेपालिं निगमजो वेद्ताको सेतुजो लोकमें धर्मकी मयोदाहै ताको -पालन-कीन्दे-यथामाता पिताकी आज्ञाते हि सहित राजस्यागि
ज्लीन्हे पुनः घ्म के बिरोवी-यावत्:
रघुनाथजीको चरित्र अपार समुद्रवत्दे! काहे ते निगसादि यावत् सिद्धांत ग्रेथहेंशेषादियावत् कबीडवरदें शेकरादियावत्सम्दें इत्यादि सकलकहने वलिनमेंको जञाननहार भाव रामचरितःपरिपृण कोऊनहींजानिसक्ताहे '
जगतूमें सेगल प्रसिदः खत्लव ... ताको कार्रण-ज़ो चेद' धर्म ताके करन हारः-वेदे धर्मके स्थापित करनेवाले « दो इल्पादिःब्रचन-संबकोःसुनाय ऐक्वर्य दर्शाय के ब्रह्माकहदे-३। ५ ॥। मूं०। डठिशंकरजयजयकहत शमस्वरूपतुम्हार । मंगलमय इंकार! [ 'तसवदातारं १ समिरतसंबदांतार लहत सुख । गुणंगणपावनगायतरतंभवनिधिसुखपा थे २ सुखपाग्नेमानिगएणमंन्रहिं. ज्ञानध्यानसोज्यहिचहत -। “ सविकुलकमलदिनेशभप्रभुठठिशंकरजपजयकहत ३ । ६॥ टी०। जय ब्रह्मा स्तुंतिः करिमये त्बंशेकर उठिःकहत किःमंहाराज की जवंहोय/जेयदोय' दे भीरघुनाथजी आपुको स्वरूष केसा है संगलमय संगलानंद समृठ-तनमें परिषणे भरंहें काइते मथुर मरते सुमिरत संब दातार मधुर मूराति जो सुंदर राजकुमार स्वरूप सो केसा सुलभ उदारहै किजाकी सुमिरत मात्रही सबफल को देनहांरा है भावजा मततोरथकरे सोई देतेही $ सुमिरतमात्र संब मनोरथ के देनहारहौ तथाध्याये सुंदर संखलहत पावतअथोत् जोलेवन पूजन दोस्यतादिकरताहै सो सुंदर उत्तम प्ररलोकमें सब-अकार को:सुखपावताहै भाव किसीःभाँतिकोदुःख की अभधनहीं रहिजात- २-पुनः सुस्॒पाये: आनंद सहित मुनिगण मनसें/ज्ञात ध्यानकरि ज्यहि. चहत अथोत् देह व्यवहार त्यागि शुद्धघा- न कक की हट +. साई प्रम॒ रविकुलकमल' रबिसूर्य कुल्ते यावत् सूर्यबंश्ी हैं ते कमत्त . कोबन हैं'तिमको प्रफुछित कर्ता दिनेश सूर्यहो ऐसे रघुनदन:प्रभुकी जयदहोय जयहोंय इत्यादि उठिके शंकर कहते भये ३॥&-॥॥ : 526 )0% ४३३६६ प्रतिअवतार
बेबरश पुरपातिकहतप्र यम है: ॥/७,॥६ #७७४ ७:
"८-५ “8: 28९ ५-२०+ त् माधुर्य पलक अरे कुक आलकेते तेसे
ओर किसी रूपमें,नहीं हैं; ९: भापुको झनूप रूपकहि बेद बंणैतः पुनः व एंजन-खंबनहारेहो दैत्य रीक्षत वा कोंऊ अंधर्म भनीति पर'चत्तता ऐले देछजननको नाहकरनहारेहों तथा सुजननंको पालन करतेदो पुनः हे राम जो सनगोतनक़ो त्रेसित ताहें तुमंप्यारेहों भर्थात् अंतरमें मनको ऋरसंदंढ देते हैं भावजें समकरि सनादिकी बासनारोंकि शुद्धकर तेहें तथा मत़को चेचत्त करनेंवाली-गोनामइंद्री यथा श्रवण जेन्नरसना नालिका त्वचा: ल्लिंग्राविःतिनेको-आासवेते हें अथोत् दमंकरिके इंद्विनकी तृत्तिबिषंय ते सोक्नि देतेढें पुनम लबतनको त्ालवेतेहें अ्रधोत्ःतपस्याकरि-पाप नझाग्र वेहौको शुद्धकर तह्ने इत्याविं तनइन््द्रीमनक रिके जेशद्धहें ऐसेजननको झा पुप्रियहो:भावजे-योयज्ञानादिते शुद्धदें तिस्दें प्रियददों ६ भथवा जे आपुके नाम्रके भवल्लंबकरिके मोह सदादि विकारनते बचतेदें ऐसे भक्तजनजे हें क्तावितुस भरियलागतेही ये ढ़ोऊ झाचरण हमेमें नर्ींदें काहेते हमानेशि दिन-बिप्रयाः हु श्र भावहमारा मनतन इन्द्रिय बिशेषि बिप्यकेबझहें ताते सतिउद्विन देहे सुखभोगमें परेढें तो हम्न किलीभोति-आपुके सन्मुखहोने योग्यनहींदें इत्यादि अ्रणामकरि इंदकहत भावझापुकी झरणयोग्ययद्यपि हमनहीदें के न नटी कक आपुको. बचनहैं यथा ॥ सरूदेवप्रपन्नायत- वास्मीतिचयाचते।अभर्य॑सवैभूतेभ्यो ददाम्येत्द्नतंमस॥ भर्थीतजो एकडू बार. प्रणासकरि कहे कि में शरणहों ताको सब॒भूलनले अभयकरि देत हो इसबचनके/ भरोसे मेंभी प्रणाम करुंताहों ३॥9॥ ८ फफफ 7
मूछ। चरण निशिदिनशजिमनन दी र
[2
काहेते मेरे कुलमें रावरे आपुजन्मले अवतीर्णमये' तबतेहमारे -हूदयमें बड़ातोब संतोष है पट बेढते प्रमाण है कि जोने कुलमें/कोऊउत्तमजीव जन्म 'सो-पिठृनको नरकते निकारि सुगाते करिदेता है भरुमेरेः कुलमेंती आपु परब्ंह्म- जाते सोकों बड़ा: सेतोपरंही आजुरॉजसिंहा- संनपरतें मेरांसनोरथ सफलकीजिये र कहिते आज संफलकीजिये कि
यश! बिस्तरथो दृष्टनंको मारिं उत्तम घर्मः स्थापित 725 लनेन70३७०७४०५०५००५४५ $ 'जाविरइत्तः ् जआावयदबरदानमॉसितोनहींसक्ताहों परंत्उरकीअभिलायंप्रंकटकर ताहौ कि रानसिंहालनासीसग्रहजो श्रीरघुनवन जनकने दिनीकी जोरीहैसोचिरजीव बंहुत:काललक: ऐसही बनीरहत ऐसे: रविकुलकमल प्रकाशक अमलरबिं अरिधुनाधजीकी 'जयहोयजयहोय इत्यादि हाथजोरे सूयकहते हैं ३। ८.॥ मूं5+अनिलअनंलथरविनयकरि खलखंडनतमराम । राजआ ४78५० सर १ रॉजहिजंगअमि
3 ठी७॥पनिल्लेजो:प्रव्॒त घंतरल्लजों मग्तिघर जो एथ्वी येत्तीनिहृबिंनय करि कद्दत खल'बड़ततुस्र साप्नहे रघुनाथजी आपु दुष्टनको नाश करन
नहिंपावतयोगीश ८-00 गीगीश 5 हर 4 विधिसनकादिकनेस - प्रतंनकरिकहें ३-६ १० ॥
छी०+निगम वेंदे विप्र॒तनकरि कहत्त ब्रह्मावि सुरनके ईइ्वर हेश्घुनाथ' जी/सुन्रिये आपुकी प्राप्ती ऐसी अगमहे जाकेदेतु योगीश योगिनमें जेउत्तम'
तेयम नियम आसन प्रत्याहार प्राणायाम धारणा ध्यान समाधि इत्यादि! कोटिन कोटि करी रिन यल्लेनकरि ढूँढतेदें ताहूपर भापुको नहींपावतेंदें क , पुनः योगीश शंकर पचिहारे भनेकन युक्तिते अमकरि थक्रिगये सो हर दय ध्यानमें नहीं पावत ताते सुलभ प्राप्तीहेत प्रेमसहिता'
ज़पत मुख़सों सदा गुणगानकरत अरू ेजनसे लीलाकूपके दशेनः री
ः 3 0 समनाही । तणसमतनतजिदीनसंयशजाकी जंगमाहीं 72022: को जे गमाह : २ सयशकियोज्यहिजन्मभरि गयोबिरिहलेअमरघर।| गीध क्रियातिजकरकहें शारदनारदजोरिकर ,३ ।.३१.॥ टी०। शारदा तथा नारदते दोऊकरहाथजोरि दीनतादशीय पुनः चित्त लाय भंतस्थिरकरि विनयकरत हे भ्रीरघुनाथ जी प्रभु सुनिये आपुको च- भंडुतदे झाइचर्यमयी हे ) क्या अद्भुत. चरितदे दे भीरघुताथजी य यथा आपुके पिता श्रीदशरथ महाराज जेंसेहें तेसा दूसरा किसी पिता नहींदे कादेते जे भाषुके वियोगते ठृणसम तिनुकां समान तन त्जि प्राण निसारिदिये भाव आपुके दरशम्रात्रते जीवन आधार राखेरदें पुनः सुयश जाको जगमाही जिनकों सुयश जगमें सब गंवेतेहें २ क्या सब गावतेहें ज्यृहिं: दशरथ महाराज जन्मभरि सुशक्रियो यावत् जीवत रहे तावत उत्तम उदार केसेकरि उत्तम यश बिस्तारे पुनः विरहे अमर घरंगद्यों आपुके वियोगभयेपर समूह विरद् ग्रहणकरि तनत्यागि देवलोक , को शैये ऐसे पितुते अधिक माने गीध जटाय॒की क्रिया निजकर आपने ही
७०। अस्तुतिकरिमुनिसुरुमयेरामभरतबुलवाया। कषिपतिऋक्ष
विभीषणे नलनीलहिअन्हंवाय ३ नलनीलहिअन्हंबाय भरतभूषणपहिराये। कवि
... लाये २ रामनिकट्वैठारिके मधरवचनबोलतभये।
/ कीरतिप्रभुउच्चरत अस्तुतिकरिमुनिसुरुमये ३। १२ ॥ टी० ॥ राज्याभिषेकभये पीछे सुर अह्ादि मुनि नारदादि प्रभुकी स्तु- ति करिके बिदाहे चल्लेगये तब रा अत दुबे इ के ड्हां जाप लिया रेप (“व सबसखनः कपिपतिवानरन
कम नेतंब॒जमुन्िनायकयेनीलनल- ३७) 4 ३६४८ ८ 2 ॥ वशिष्ठ अति: रघुनाथजी कद: हे सुतित्तग्रक-येदोऊमाई नील नल भछुत/आश्चर्यमय-कमेकीन्दे केसा घहुतकर् गुरूखर्स उपलगरोंद - ज्ाको पन्ने ऐसे उपल: ज़ो पत्थर:तिव्रकरिक इनकेहा धःशतयोजन सागर प्रें:सेतु ब्राध्यो अर्थात् जिनपत्वरनमें- ऐसीगरोईहोत्त जे आपुघूदें औौरहुको
बोरिडारें तिन पत्थरनते जलयानकी नाई इनके-चाथनंक प्रंभावतेसो ओज़न-चाहिसि.कोग्रतक समुद्रमें लेतुडरँघिगयो ताहीपर संत्र सेना उतरि लंकावेरी १. युरुतादे ज्ञाकों धर्म, तित उपल -पत्थरलते पुनः बीर ताके शी फारिढारे तथा ल॑: के रहें तहाँ सहिधर पर्वत बदुत ढारे भाव | द्वारिके मर सारिढारे २ तेसेही मह्परपवैत हारि अरि संबारि शत्रुन को नाश करिद्रीन्दे भाव इनके चलाये पर्वत जहांगिरे तहां शजुबहत दबि -सरिय॒त्रे पु्त रफ़्मंडल जहाँ सन््मुख जुठिके चुद
६ ज्ञानकीजीके खोज करे.
“सब विश्वनकों खोज हेतु कोटिंन बानर
ओोधमँगाय लीन््हे 3 यथा सिय शोधन में
रणमंडख भारी बानरऋश्चनकी समृह सेनाजैके रि बड़ाभारी संग्रामरचे 5 संत्र तंत्रनकी जो युक्तीदे लो
2; सुंदरी प्रकार पुष्रकरि जानतेः ना बलीहे अथवा अबल बे दमा बिचारी बिचारने वाले युद्ध ज्वोतिपमें भी प्रवीणदें २ केले जाना कि बल अबलंके बिचारीदें कि जहां ठौर भ्बल' बिचारी तहां ये संमाजकों बलठौर बतायदिये यथा ब्रह्मयामले | मूम्यक्षरचतुगुणबंतियि बारेणसंयुताः । त्रिभिडचैवहरे हरगंजेपंमियुभाशुमम्। एके चली वत्तामूमि:
॥वत्र्तायेचसुताभामिः इत्युक्तत्रह्मयांमंले ॥ इस्यादि विधि ते जहाँ अबल भृमिकामें सेनाठाड़ि देखे तहाँते हटाय जहां बली भूमिदेखते रहें तहाँ सेना ठाह़िकरि युद्धकरावते रहें ऐसे बुधिवंत पुनः महाजल्ली हैं हे मुनिनायक भत्यंत चतुर महाबलवेत ऐसे ये घानरनके राजा सुग्रीव हैं ३॥ १४ ॥ म्5। सुनहृत्रिभीषणवहुकियोमिल्योमोहिंतजिभाय । रावेशअं
.. रूघेननॉदकीदईमीचुदशोय १ देंईमीचुदर्शायगदापुनिरा वणमास्यों। लक्ष्मणघायलभयेत्रद्यकानामउचास्थो २ ना मजचास्थोशत्रुदलकरिडपायलक्ष्मए़जियो.॥ राम्रकहतमु
निराजसोंसुनहुबिभीषणवहुकियों ३॥ १४३ ८ ४ 5:
टी७। हैः मुनिनावक सुनिये ये संकेश विभीषण हमारे बहुत कार्य
- कियो काहेते भावतजि बड़ेभाई रावणंको त्यागि भायमोहिं मिल्यो पुनः झुद्धसमय रावण को तथा मेबनाव की सीचु दर्शीयेदई अथीत् रावण की
में सुधाकुंड है. ताके शोषिलीन्दे शावणमरी इति रावण की सझृत्यु ः है ताको बिश्वेलि शीघ्रही मारौ इंति मेघ॑नाद की सृत्यु बतायदिये 9 दोडन रावण ऐसेसबलबीर
कलायकसबैऋणय्षनाथवलदलमहा ३। १६॥ टी०। ये ऋष्षन के नाथ जासवंत हैं बलदल महा इनमें सहाबल तथा दल महासेनाभी बहुत है. ये प्रचारि रावण ह॒त्यो सन््मुख लत्तकारि रावणकी छातीमें स्ातमारे सो म्छित द्वैगया ऐसेबर्लाहिं पुनः पाँउधारि मेघनाद को फटकारि दिये सो लंकागयो भथीत् पदगहि पटके जब मरते न देखे तबफेंकिदिये सो जायलेकामें गिरा ! यथामेघनादकों फठकारिदविये सो लंकागया तथा असुर दल समाजनदले भुंडके मुंड. राक्षतनकी सेना को नाशकरि दीन््हे पुनः यूथ इनको सम्रह ढल सो गिरिराजन बड़े बड़े परवेतन को हाथन पर तथा सिरपर धरिलाये तिनते सेतुबॉबिलीन्डे शिरघारि गिरि रावणदले शीशपर भारी पर्वत धरिले भाय राबणपै ढारि. रथादि दलिढारे शत्रु लभय रणनहिं रहा शत्रुरावण सडरदै भागिगया इ- नके सन्मुख भ्रमिने ठाढ़न रहा इत्यादि हे सुनिनायक ये ऋश्ष जांसवेत को दलभारी झ्रू आपु महावली ताते सब कार्य करिबेलायक हें प्रशंसा कहाँ तक करों ३३ १६ ॥ मू०।येअंगदमुनिय्नतिबलीजिनरावणपुरजाय । मानज्ञानअ
" रिदिलदल्थोरोंपिसभाधरिषाँय समाधरिषोंयकेश
रावणवज्ञ त्यांगि उठा जनको देखते डरायके
. मली युद्ध समय दे ._ रण में विजयी बिशेषि जय पावनेवाले पुनः शुः देनहारहें हे मुनिय अंगद अतिवली हैं ३१७॥ फी सर ०० मंतविचारिभुनिप्रथममिलायिमीहि। कपिपतिपुनिद
केलेमुद्रिककरजोहि ९ लेमृद्रिककरजोहिदीरलेस टसिधायो ।-हेषितलगेसब्मरणजायत्यहिस ज़लप्रिझा
" सुजलपिआयोसबहिकोसमृद्गतीररचिमंत्रपुनि 4हघ क्षत्रक्षसपातिदेयेहनुमंतविचारिमुनि ३३१ %६॥
.. प्रथम: मिलाशो | पुनिदानरनकों दलतजोरि बठोरिक सिवशोध लेनेहेतु जब ठदार दे मेरेसन्मुरर भाये तिनको जोहि देखि कार्ये करिवेश्रोग्यड- 'बिचारि स॒हिदाजी देतुमें सुद्रिका दीन्देंउ ताकों करलेहांधमेंलेके १ सबमें जोडि इसको [मुद्रिका दीन्हेंउ ताको येबीर हाथमेंलेके अन्य सुभ- मल सवा सिय शोधहतु चलेकहों विषमबनंमें न सब मरनेलगे ब॒को लेजाय सुंदर
फल खंबराय सब
परस्पर:
सुमठ हनुमान फ़ॉदिके उदाये समेद्रके परिगयो जीको देखि भोठ ब्रार्ताकरि -तिनते 85% हाषमें,
पुरमें जाये उपाय! करि चस्सि प्रचंड दोक़ि कूंड़ि झठारिता:परचढ़े घरघर प्रत्ति आगि.त्वगाय पुरभरि जराय- दीन्दे ९ पुरको ज्ञारि बारि पुन/बारि - वि सप्तदू में कृदि क्लगूरकी झरिन बुक्काय- पु 4024 जिकटडेढ़े प्रथात् ताद्ण कफ प ५5 | गजतअत्यत बेंगते खुभठ पुत्र: -उद्धि पारेगयो, ५3 आनंद: सेग्रले मेरेपास आय खबरिं खुनाये ३।१९ ॥. की
मू०।सियमणिदेदललेचस्वोविश्गजद्रकतअंग-।- पारेजायथे._ खोअरिहिदुर्गकियों डर्मेकियोपुरमंगसमरल
चले “०-र ॥००- २० ' | समय शरबाण करयो नम ते भरतकोपि उरघल दल्पो राक्षस जानिके क्रोध सहित भरतछाती में बाणमंपरि दिये ताहू व्यथामें लपण शोचउरमानि भाव रातिनभरेमें भौषधमिलेतो' प्राणयर्चें नातरु भोरभवै प्रणेनरहेंगे इतिलदटतणजी को शोच उर अतर लें आति पुनः बिता लक्ष्रणजीके निरूजभये प्रभु युद्ध केसे करेंगे तब . ज्ञानकीजीकी विपति केसे निवारण होइगी इति लिबहितःद्रोणागिरि शिरपर धरिलेके पुनः बेग सहित चल्यो तुरतंदी लंकामेंपहुँचे ३। २०॥
मू०। कहँलोंगुएमनिर्मेकहोंकपिसमाजकेकाज । भरतलपणते प्रियलदाकपिनायकशिरताज ३ कपिनायकशिरताजमि , लेउठिसबहिबहोरी । बिदाकियेसन्मानिपरस्परप्रीतिनथों री २-प्रीतिनधोरीप्रभुकरीसबश्रणामकरिसुखलहो ॥ बार बारयशज्रभ॒कहैंकहँलोंगुएमुनिमकहों ३। २१ ॥ टी७। पुत्रः प्रभु बोले हे सुति वश्चिज्ी सुमीवादि कपिनकीसमाज के कीन्दे यावत् उत्तम काजदें तिनके गुणमें कदाँलोकों भाव असेख्यन हें परतु इतनी मुख्यवात कद तदों कि कपिनायक बानरनमें यावत् स्वामी कहावत पुनः सबमें शिरताज जो-सुय्रीवर्दें इस्यादि सब भरत लषणते अधिक मोको सदा प्रियहें ) अंगद नील नलःडि यावत् कपिनायकहें तिनमें शिस्ताज जो सुग्रव जामवंत विभीषण इस्याविकनको विदाररने हेतु अभु उठिके पुतः संवाहिनकों मिले सन््मानि भादर स॒द्वित बिदाकीन्हे पुनः परस्पर प्रति न थोरी लेबकलेब्यभावकी दो ऊंदिश्िकीअति झविक है * प्रभुभोरी प्रीति नहींकरी अथीत् सेवक सखन के विशिकीप्रीति तौ * स्वाभाविकही है परंतु रघुनाथोजी बहुत प्रीतिकीन्दे तब सुम्रीवादि सब समाज प्रभुको प्रणामंकरि सुखलहौ भाव आनंदपाय बिदादैवसे तबहूँ बार बार सबको यश कहते दें पुनः प्रभु कह त दे सुनिनायक कपिन के गुणमें कहाँलोंकहों यामें प्रीतिपालता रुतज्ञता गुणप्रभुको है ३ २१ ॥ रामराजराजतमयेगयोसकलदुखभागि । रोगशोकब्मप
एत्यागि
कौन. दुःख ,ज़्वरातीसार शूल कुछ्ठावि सबप्रकार के रोग ी यथा हानि वियोग संकट बध बन्धनादि. दुख पुनः भपसति यथा थो' ज्नीचयोत्रितको जाना प्रेत होना नरक जाना तथा ' [; जैसा कालझावत तेसी जीवकीबुद्धी द्ेजात तथा कालपा 2 हे झापनाफल भोगकरावतेहें तथा रज तंम इत्यावि जो गुण-भअधिक + ताहीं झनुझूल जीवकों स्वभावहोत: स्वभाव अनुकूल कभे कस्त इत्यादि. सब लौोकत्यागि गये शुद्ध सतोगुणी जीव पर्मवंत्त हरिसनेही भये 9 काल यथा युग संवत् ग्रयन ऋतु मासपक्ष तिथिवार सक्षत्र योग करण लग्न मुहूर्त दंड. पल्ादि जेसा कालद्दोत तेसादीकार्यद्वोत कर्म दो एकशुभ यथा यज्ञ दान तप तार्थि बत मंत्र जप पूजा प्राठ संध्या तर्पण प्रोपकाराबि दूसरे झणुभ बथा हिंसा चोरी परखीरत जुआ परआपवाद परदानि इत्यादि था रजोगुगते कामी स्वभावतम्तोगुणते क्रोधस्विभाव इत्यादि सबत्याग्रि शुद्ध सतोगुणी निर्वासिक धर्मचेत रामसनेही सब जीवभये तातेलोक _ बिपे सतयुगकी करणीभई कोनभाँति बारिद मेघमन गति है$ ३०88: कूल बारि जलवेतहें भर्थात् जब रूपीकार इच्छाकरतेदेंतवे सेघ 2:96 देतेदें तथा धरणी ए्थ्वी सुर तुर॒ भी कामथेनु भई प्रजनके मनोरथ अनुकूल अव्नादि सब पदायनकों देती है २ धरणी सुर सुरंभी भई पुनः कफ्ट छल चातुरी ते कोय्ये लाथन तथा दम्भ भ्लूठही बेब हट मद पुजावना तथा पराखंड बेंदप्रातिकूल आचरण फरना इस्यादिं ये: पुन; धर्मम यथा धम्मेशाखे ॥ इज्याध्ययनदानानि तपः्लत्यंधृतिक्षमा , भक्षो मइ तिमागोय॑ घम्मेश्चाएविधःस्सृतः ॥ पुनर्यथा ॥ प्राज्रेदानंमती
दिंवास्वप्तश्परिब्राद:
२०२०९४६ ३३ शा चुनक्रोधगणयया॥ पैशू
स्ियायदृपण। वार्देगब्त्चपारुष्येक्रो पज्मोप्िंगणोएकेः
अधदिंसांदि कावत पापकर्म रोग कुछादि संबमान अपना को मे
| मंदेधन विद्याराज्य पाइ हैं पे बढ़ावना ग़वेऐद्वर्य
इूलरेकों कछु न गंन मा दीप अनुचित हिं सायथाःगों:आ-
रन व रॉजदेड प्रियवियोंग दौनिताडन ज्वर उंदेशादि पीरखल हथादख देनेवाले रोक्षसादि'
संकतापं तथा परंस्पर बैर तथा 5 222-4%2:23 7 5 लहज
स्वेमावतें संवजनके छटिंगयें तेंथापर अपकारी पसरीहानि ःकत्ती: सति
गई जिकार' शुद्ध स्वनषावते ब्लोग पर उंपंकारी पर स्वारध
[ख भोग योगमाहि एथ्वीमें प्रकटमयो अर्थीत्॒सबर प्रकार
५३० बिक लोगनको प्राप्रतत काहेते कोमेक्रो पे अपरोग मंगल" छृतकरने “वाले सब मिटिगये- लातेः ह।
ह्प्छ्
तरिये ऐसोदुस्तर सयदइर इत्यादि सब॒दुरि होतहीनहींहे श्यहकाहतेभई सो कहत रामतेज, राबेजगस्रगतत गा /) तेजरूप सूध सदाएकरस प्रकाशमान रहत सो दुस्तरभय वर्कर दुध्खां क़रिजो न तरिजाफ़ ऐसीवुस्तर सयरूप राज्ीको माशकरिदीन्दे भात्र रघु- नंदन की प्रताप्ररूप सूर्य -उदयभयेंते अप्ष्म अनीतिरूप राजी मिद्दी नीति धर्म रूप दित॒भया ताते वर उत्तम धमे सब कमललम अफुछितभये तथा कोक चक्रवाक सम त्ेम प्रेस ज्ञगमें प्रकटे एकन्नभये ३। २४ ॥
मू०। एकरामगुणसायबोयंहकलिकर्मनओर । -तालेतुलसीदास केमंत्रयहेशिरमौर १ मंत्रयहेशिरमोररामशुचिकीरतिगा 'ऊँप साधनउत्तमजानिसुमतिनिजमनहिटंढाऊँ २ मंनहि इढ़ाऊँमंत्रयहजिहिप्रसादसुखपायबों । शुकनारदकीसी खयहएकरामगुणगायबो रू 7 3 सच शम्मगुण यहूएककम्त क। अधौत् और- ० 22] सढ्ागाबना कलियुग सुगमज के कल्याण
मंत्र मनमें हृहोवत परलोकादिकों सुखपा- .
02“
7 (णानुबादको गायबो शुकदेंव तथा नारदकी
भाव पराभक्तिके अधिकारी शुकदेव तथा प्रेमा भक्ति
7-8» 22% दोउनके बचन भागवत्तमें प्रसिद्ध पक >
चाक्य। मत्वैस्तयांननुसमेधितयामुकुंद भीमत्कथाश्रवणकीत्ते
. तद्घधामदस्त्यजरुतांतजवापवर्ग ग्रामाइनंक्षितिभुजोपिययुयेद्था: ॥ सप्तमे नारदवाक्यं॥अवणणकी तैनचास्य स्मरणंमहतांगते:लेवेज्यावंद नंदास्यंसरूय मात्मनिधेदन ॥ इत्यादि दोऊ महात्मनको सिखावनमानि भरीरामगुण गान में पु्करि पकरंथों ३। २५॥
मू०। एकराममखनामधुतेध्यानरामकोरूप । रामचरितगांवतप
रमधर्मपवित्रअनूप १ धर्मपवित्रअनूपकरियजवलॉजग
|... जीजै | रसनारसकरिचरितसरितनिशिबासरपीजे २ नि
। शिवासरश्रमतजिभजेतुलसिदासयहशुमसुकृत । कामधे नुकलिकल्पतरुएकराममुखनामधृत ३। २६॥
इतिश्रीगोसाइतुलसीदासक्ृतेकुंडलियारामायऐउत्तर काण्डंसमाप्तम् ॥
टी० । कौनभाँति. चरित गानकरियें सो कदत मुखएक रामनाम धृत _ धारणकरि अथात् मुखमें कंठाबिप एकछोटी जिह्वाहे त्यहिकरिके सदाएक 'रामनास उच्चारण करतरहिये पुनः ध्यान रासकीरूप नाभंस्थानकर्मल “बंप श्रीरघुनाधज़ी मल के रूपको ध्यानराखियें अर्थात् 24१४६ प 'हूप झवस्तोकनमें सदा लगायेरहियरे ताक थिर राखनें
8 ६ ने सिसेकी: ४ प्रियलागत तब काम क्रोध लोभ मर्द सास्सर्ये प्रचंडपरि म रे . स्वाधीनकरि वेद सुखक ब्यापारमें लगायेरहत तब जो जीव परमारथों
पर आरुढ़होत तो इंद्री विषयवशते ध्यान भजनमें मन एकरंस विरनहीं: शहत सोई जोसनेन्द्रिनमें विकारभावत यदी अपावनताहे यह बिचारि जब श्रीरामचरित ग्रानमें लगारहैं त॒ब्॒ सब इंद्री मनकी द्वत्ति बटुरि उसी में लगीरहत पुनः प्रभुके गुण बिचारि प्रेम झावत तब मनादि थिरदे जात इत्यादि सहायताते नाम स्मरणरूपकों ध्यान थिररहत॑ इ ति पावनता है पुनः यह जो दास्यताधमहे ताकौसमान उत्तम दूसरा धर्म नहींदे बथा हारीते।दास्यमेवपरंधर्मदास्यसेवपरंदित मादास्येनेवभवेन्सुक्तिर्यथानिर- यंभवेत्॥ तस्मादास्येपरांभक्तिमालंव्यन्॒पसत्तमा नित्यनेमित्तिकंसवैकुय्यी - ह्पीस्येहरेःसदा॥तस्यस्वरूपरूप>चगुणांदहचापिविभूतय:।ज्ञात्वासमचैयेदि घ्पॉयावज्जीवमतन्द्रितं॥तमेवमनसाध्यायेद्दाचासंकीत्तंयर्प्रभुम । जपेच्च जु हुयाद्धक्तोतद्वानेकविज्कक्षण/॥पुन+शिवसेहि तायां॥सर्वेश्यो विष्णु भक्तेम्योरा मभक्तोविशिष्यते। रामादन्यःपरोध्येयोनास््तीतिजगतांप्रमुः ॥ तस्माद्राम स्पयेभक्तास्तेनमस्याः शुभािभिः ॥ इति सर्वोपरिउत्तम रामदास्यताधर्म जाकी उपमा योग्य दूसरा नहीं तौतें अनूपहै इंति पवित्र अनृप धर्म दै ताको तबलों कीजिये जबलों जगम जाजें भर्थात् जगमें यावत् जीवन रहै तबतक यही झाचरणमें लगेरहिये कौनभाँति रामचरित रूप सरित जो नदी ताको रस प्रेमरूप जल ताकों रसना जिद्दा करिके निशिवासर पीजे रातिउ दिन गानकीजिये भर्थात् प्रेमसद्वित जिद्वाकरिके रामचरित गान कीनकरिये २ तुलसिदास यह शुभ सुरत श्रमतजि निशिवासरभजे अथोत् मुखते रामचरितको गान कंठमें नामस्मरण हूदयमें ध्यान यहजो | शुभ मंगत्तकारी सुझतिहे ताही रीतिपर आरूढ़ डै झरू योग तपस्यादि | परिश्रम त्यागि रातिउदिन रघुनाथजीकों भजतहों काहेते एक रामनास मुखमें धारण करना यह कलियुग विषे कामधेनु कल्पतक्ष समान सन *.ओंछित फल देनहाराहै यहलोक शीक्षात्मक ग्रापनासिद्धांतकद्दे ३३२६॥ _. कुं०। कीन्हे गुरुननको स्ववश् करि अस्तुति सन््मान । बाणन सो जीते बली दीनन देदे दान ॥ दीनन दैंदे दान सत्य सों धर्मिन जीते । पावन तप ब्रत धारि सान मुनि सनझत रीते ॥ रीते रत जग दृष्ट नाग । शक सुखदीन्दे । बैजनाथ रघुनंदलोक पावन यश कीन्दे ५ भूख न ४ क्ठजानही नहीं जक्तकर मान। मानरद्दित सन्मानऊ सानव वेव _